दान के दो हेतु हैं-श्रद्धा और शक्ति। यदि श्रद्धा न हो, तो बड़े से बड़ा दान व्यर्थ है, और श्रद्धा हो तो छोटा-सा दान भी अमूल्य होता है। शरीर को कष्ट देने या धन खर्च करने से धर्म की सिद्धि नहीं होती। सच्चा धर्म, श्रद्धा से होता है। श्रद्धा ही तप, स्वर्ग, मोक्ष और संपूर्ण जगत का आधार है। श्रद्धा भी तीन प्रकार की है-सात्विकी, राजसी और तामसी। सात्विकी श्रद्धावाले देवताओं की, राजसी श्रद्धावाले यक्ष और राक्षसों की, और तामसी श्रद्धावाले प्रेत-पिशाचों की पूजा करते हैं। दान करते समय शक्ति का भी विचार करना चाहिए। जो धन कुटुंब-पालन से अधिक हो, वही दान के योग्य है। किसी को कष्ट देकर दिया दान, विष के समान होता है। ऐसा दान, धर्म नहीं, अधर्म है। दान के लिए आठ प्रकार की वस्तुएं वर्जित हैं-सामान्य (तुच्छ वस्तु), याचित (मांगी हुई), न्यास (धरोहर), आधि (बंधक), दान में मिली वस्तु, अन्वाहित (व्यक्ति अपने पास रखी धरोहर यदि किसी और के पास रख दे), निक्षिप्त (विश्वास पर रखा गया धन), और सान्वय सर्वस्व दान (वंशज रहते हुए सर्वस्व दान कर देना)।
दान के छह अधिष्ठान कहे गए हैं-धर्म, अर्थ, काम, लज्जा, हर्ष और भय। धर्मबुद्धि से सुपात्र को दिया गया दान, धर्म-दान होता है। किसी प्रयोजन हेतु दिया दान, अर्थ-दान कहलाता है।
स्त्री, मदिरा, शिकार या जुए जैसी प्रवृत्तियों के लिए दिया दान, काम-दान है। सभा में संकोचवश दिए गए दान को लज्जा-दान कहते हैं। शुभ समाचार पाकर दिया गया दान, हर्ष-दान होता है। किसी हानि को टालने के किया दान, भय-दान कहलाता है। दान के छह अंग हैं-दाता, प्रतिग्रहीता, शुद्धि, धर्मयुक्त देय वस्तु, देश और काल। दाता, नीरोग, धर्मात्मा, दान की इच्छा रखने वाला हो, व्यसनरहित होना चाहिए। उसकी आजीविका अनिंदनीय व धर्मसंगत होनी चाहिए। श्रद्धा रहित, दुष्टात्मा, झूठे या आलसी व्यक्ति द्वारा किया गया दान तमोगुणी कहलाता है। दान का महत्व तभी है, जब दान लेनेवाला उसके योग्य हो। जिसका कुल, विद्या, आचार शुद्ध व सात्विक हो, जो दयालु और जितेंद्रिय हो, वही दान का अधिकारी है। जो धन या वस्तु अधर्म से अर्जित की हो, वह दान-योग्य नहीं है। दान के लिए देश भी महत्वपूर्ण है। जहां कोई वस्तु दुर्लभ हो, वहां वही वस्तु का दान योग्य है। दान में काल का भी महत्व है। उदाहरण के लिए, दुर्भिक्ष के समय अन्नदान सर्वोत्तम है, ठंड के मौसम में वस्त्रदान श्रेष्ठ है।
दान के दो फल हैं-इहलोक और परलोक। सुपात्र को दिया गया दान परलोक में फल देता है, और अपात्र को दिया दान यहीं भोगा जाता है। दान के चार प्रकार हैं-ध्रुव (कुआं, बगीचा, तालाब आदि का निर्माण), त्रिक (प्रतिदिन किया जाने वाला दान), काम्य (पुत्र, विजय, ऐश्वर्य आदि इच्छाओं के लिए किया गया दान) और नैमित्तिक भी तीन प्रकार का है-जब दान ग्रहण, संक्रांति, पूर्णिमा, अमावस्या या अन्य पवित्र समयों की अपेक्षा से दिया जाता है, तो उसे ‘कालापेक्ष’ नैमित्तिक दान कहते हैं। जब दान श्राद्ध, विवाह, यज्ञ, पर्व या अन्य धार्मिक क्रियाओं की अपेक्षा से किया जाता है, तब वह ‘क्रियापेक्ष’ कहलाता है। संस्कार, विद्या-अध्ययन, तप या विशेष गुणों की अपेक्षा से दिया जाने वाला दान ‘गुणापेक्ष’ कहलाता है। दान की तीन श्रेणियां हैं-उत्तम (घर, भूमि, गौ, विद्या, प्राण और सुवर्ण), मध्यम (अन्न, वस्त्र, बगीचा, वाहन आदि) और कनिष्ठ (जूता, छाता, बर्तन, दही, दीपक, लकड़ी-पत्थर आदि)।
दान का तीन कारणों से नाश हो जाता है-पश्चात्ताप, अपात्र को देना और अश्रद्धा। पश्चात्ताप से किया दान आसुर-दान कहलाता है। श्रद्धा रहित दान राक्षस-दान है। अपमान के साथ दिया दान पैशाच-दान कहलाता है। ये तीनों ही दान व्यर्थ और निष्फल माने गए हैं। इस प्रकार नारद ने राजा धर्मवर्मा को दान तत्व का माहात्म्य बताया।