अपार्टमेंट कल्चर तेजी से फैलने लगा है। सेंसेक्स की भांति रियल एस्टेट का कारोबार सर्वाधिक उछाल पर है। शहर के इर्द-गिर्द खेती का रकबा तेजी से घट रहा है। पहले इस शहर में एक विश्वविद्यालय था, पर जिन आधुनिकतम कॉलेजों ने धन-बल पर यूनिवर्सिटी का दर्जा हासिल कर लिया, वे फिल्मी नायक-नायिकाओं को डॉक्टरेट की मानद उपाधियां देकर खुद गौरवान्वित होने के साथ अपनी शैक्षणिक और बौद्धिक ऊंचाई का परिचय देने लगे हैं। शहर अब मेडिकल हब के रूप में ख्यात हो चुका है, जिसका यह सूत्र वाक्य, 'चिकित्सा उनके लिए व्यवसाय नहीं, सेवा है', जानकर हंसना भी मना है।
कॉन्वेंट स्कूलों की ऊंची अट्टालिकाएं मजदूर बनाते हैं, जिनमें उनके बच्चे नहीं पढ़ते। शहर में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए विगत दो दशकों से जिस तरह का प्रेम देखा जा रहा है, वैसा पहले किसी युग में नहीं था। हर सड़क पर पूजा स्थलों की बाढ़ आ गई है। विडंबना यह है कि शहर धार्मिक होने के साथ कट्टर भी हो रहा है। पूरी आबादी को धर्म के नाम पर विभाजित कर दिया गया है। लोग इतने डरे और सहमे हुए हैं कि कॉलोनी की भीतरी गलियां तक लोहे से सींखचों में कैद कर दी गई हैं।
पर्यावरण की रक्षा के नाम पर घरों की बालकनी में कैक्टस उगाई जा रही है और गौरैया को मारने के बाद उसके लिए कृत्रिम घोंसले बनाकर टांगे जा रहे हैं। घनी आबादी के बीच एक अदद ‘गांधी उद्यान’ है, जिसमें सेल्फी पॉइंट और चाट सरोवर जैसी सुविधाएं उपस्थित करने के बाद हरियाली को गायब किया जा रहा है। पूरे परिसर को खूबसूरत टाइल्स से सजाया जा रहा है। इस उद्यान में अगर कुछ नहीं है, तो वह हैं गांधी। कौन जाने कि इस उद्यान का गांधी-विचार या गांधी-दर्शन से कोई संबंध नहीं।
शहर में एक बड़ा मुहल्ला है, जिसे हम ‘बाग’ कहा करते थे, जो पता नहीं, कब अपनी पुरानी स्मृतियों और इतिहास से जुदा होकर आधुनिकता और विकास की उड़ान में 'गार्डन’ में तब्दील हो चुका है। हम नहीं जानते कि यह अंग्रेजी नामकरण सचमुच हमारी भाषायी गुलामी का प्रबलतम साक्ष्य है। शहर के जल स्तर के नीचे पहुंचने की सूचनाएं अब किसी को चिंतित नहीं करतीं। सड़कों के किनारे कच्ची मिट्टी और घास के जो पैदल रास्ते थे, वे पक्के किए जा रहे हैं। वकौल कवि नागार्जुन, पैदल चलने वालों की तो शामत आई या राजेश जोशी अपनी कविता में पहले ही लिख गए कि पैदल चलता आदमी अब सम्मानजनक दृश्य नहीं रहा। सो उस निम्न नागरिकों के कदमताल करने की जगहों को भी खुर्द-बुर्द किया जा रहा है।
शहर के दोनों छोरों पर बहने वाली सदानीराएं बेरहमी से गंदे नालों में तब्दील कर मौत के घाट उतार दी गई हैं। उनके मर्सिया पढ़ने की भी हमें फुर्सत नहीं। इन नदियों का रुदन हमारे कानों को भेदता नहीं। एक पुराने स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर जमाने भर पहले बने पार्क पर एक क्लब के बेशर्मी से कब्जा करने पर सब तरफ चुप्पी बनी रही। शहर की छाती पर हर रोज नकली इतिहास-पुरुषों के बुत खड़े किए जा रहे हैं। पुरानी स्मृतियां मिटाकर चौराहों पर नए नामों की पट्टियां चिपकाई जा रही हैं, जिन्हें लोग नहीं पढ़ते। सरकारी इमारतों की दीवारों पर अब एक खास रंग पोत दिया गया है। शहर की सांस्कृतिक और साहित्यिक पहचान को निरर्थक मानकर नोचकर फेंका जा रहा है। यह सब नए समाज के विकास में बाधा हैं। शहर में बच्चों को अब आम, जामुन और नीम के पेड़ दिखाई नहीं देते। उन्हें नहीं पता कि वृक्ष के किस हिस्से पर फल उगता है और फूल के खिलने की जगह कौन-सी है। शहर में एक पागलखाना है। खतरे की बात यह है कि उसकी जद में अब पूरा शहर है।