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परिदृश्य: पाकिस्तान में चुनावों पर टिकीं उम्मीदें, अस्थिरता खत्म करने का यही बचा है रास्ता

केएस तोमर
Updated Sat, 29 Jul 2023 08:00 AM IST

सार

राजनीतिक अस्थिरता खत्म करने के लिए वहां आम चुनाव अनिवार्य हो गए हैं। शहबाज शरीफ सरकार उन लोगों की रक्षा करने में बुरी तरह विफल रही है, जो अभूतपूर्व महंगाई, बेरोजगारी और ऋण जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Social Media


गौरतलब है कि वर्तमान संसद का कार्यकाल आगामी 12 अगस्त को समाप्त हो रहा है। संसदीय चुनावों की तारीख जल्द ही पाकिस्तान चुनाव आयोग द्वारा घोषित की जाएगी। राष्ट्रपति आरिफ अल्वी द्वारा एक कार्यवाहक सरकार नियुक्त की जाएगी, जो चुनाव कराने के लिए जिम्मेदार होगी। हालांकि इन चुनावों के 'स्वतंत्र और निष्पक्ष' होने में संदेह है, क्योंकि इन पर सेना और बाहरी ताकतों का असर होना निश्चित है।


विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) द्वारा पाकिस्तान को एक अरब डॉलर का ऋण स्वीकृत करने का फैसला व्यापक उथल-पुथल वाले इस देश को आर्थिक आपदा से बाहर निकाल सकता है। अगर यह कर्ज न मिलता, तो भारी वित्तीय संकट के बीच चुनाव के बारे में सोचना नामुमकिन होता। इससे पहले शर्तों का पालन करने में इस्लामाबाद की असमर्थता की वजह से आईएमएफ ने बेलआउट पैकेज रोक दिया था। गौरतलब है कि यह 2019 में पाकिस्तान को मिले छह अरब डॉलर (5.34 अरब यूरो) के विशाल बेलआउट पैकेज का हिस्सा है, जिसके साथ आईएमएफ की काफी जटिल शर्तें जुड़ी हुई हैं।


स्थापित मानदंडों और पाकिस्तान के घरेलू मामलों में सेना के प्रभुत्व की दशकों पुरानी प्रथा के मुताबिक ही प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ संसदीय चुनाव जीतने के लिए सेना प्रमुख असीम मुनीर पर निर्भर रहेंगे। इससे पहले भी ऐसा देखा गया था, जब पूर्व सैन्य प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने 2018 में अपने पसंदीदा इमरान खान को पाकिस्तान के 22वें प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन बाद में उनका अलग होना ही इमरान खान के पतन की वजह बना। हालांकि फिलहाल युद्ध की रेखाएं खींच दी गई हैं और इमरान खान को सत्ता से बाहर रखने की पटकथा भी स्पष्ट है।


नौ मई को पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के समर्थकों द्वारा सेना मुख्यालय पर किए गए हमले के आरोप के बाद उनसे छुटकारा पाने में कोई मुश्किल नहीं आने वाली है। इसे शक्तिशाली पाकिस्तानी सेना के इतिहास में काला दिन बताया गया था। किसी अन्य मामले के आधार पर भी इमरान को अयोग्य ठहराया जा सकता है और इसमें चुनाव आयोग की बड़ी भूमिका होगी।


दूसरी ओर, इससे जनरल मुनीर आहत-अपमानित महसूस कर रहे हैं, क्योंकि पाकिस्तान के गठन के बाद से किसी भी राजनेता ने सेना पर हमला करने की हिम्मत नहीं की है। सेना को अपना वर्चस्व फिर से स्थापित करने के लिए एक और 'कठपुतली' सरकार की जरूरत है और इमरान की लोकप्रियता इसमें आड़े आ सकती है।


वर्तमान प्रधानमंत्री के बड़े भाई और तीन बार प्रधानमंत्री, मुस्लिम लीग (एन) के नेता नवाज शरीफ का पाकिस्तान के भावी राजनीतिक खेल का हिस्सा बनने के लिए लंदन से लौटना तय है। शरीफ बंधुओं द्वारा इमरान खान की पार्टी के खिलाफ भारत विरोधी कार्ड खेलने की भी आशंका है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने इमरान की विगत नौ मई की कार्रवाई को भारत को खुश करने की सुनियोजित साजिश के तौर पर पेश करने की कोशिश भी की है।
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वर्तमान राजनीतिक अस्थिरता खत्म करने और लोगों की प्रगति सुनिश्चित करने के लिए वहां आम चुनाव अनिवार्य हो गए हैं। शरीफ सरकार उन लोगों की रक्षा करने में बुरी तरह विफल रही है, जो अभूतपूर्व महंगाई, बेरोजगारी और ऋण जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। ऐसे में, नई सरकार उन्हें बचाने के लिए कुछ कदम उठा सकती है।


राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि पाकिस्तान में उथल-पुथल भारत समेत पूरे क्षेत्र के हित में नहीं है, क्योंकि इससे हमेशा सेना द्वारा तख्तापलट की आशंकाएं बढ़ती हैं। समय पर होने वाले चुनाव ही इन आशंकाओं पर विराम लगा सकते हैं। हालांकि पाकिस्तान में इस वक्त लोकतंत्र की हालत नाजुक लग रही है। ऐसे हालात, पाकिस्तान को चीन की तानाशाही के मॉडल के करीब ला सकते हैं, जो भारत के हितों के प्रतिकूल होंगे। पाकिस्तान में अस्थिरता आतंकवादी समूहों को कश्मीर में अपनी सक्रियता बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है, क्योंकि ऐसा हिंसक माहौल सेना के लिए अपने इरादों को अंजाम देने के लिए बिल्कुल मुफीद होता है।


पाकिस्तान को आईएमएफ ऋण की मंजूरी में अमेरिका की अप्रत्यक्ष भूमिका यह साबित करती है कि वह चाहता है कि इसकी आर्थिक हालत सुधरे, ताकि कुछ हद तक क्षेत्र में चीनी हस्तक्षेप पर अंकुश लगाया जा सके। यही वजह है कि अमेरिका इन चुनावों का स्वागत करेगा। इमरान खान ने अपने निष्कासन के लिए पहले अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया था, लेकिन बाद में कोई सकारात्मक नतीजा न निकलने की वजह से 'यू टर्न' ले लिया। अमेरिका ने पाकिस्तानी सेना के शीर्ष अधिकारियों को अपने प्रभाव में रखा हुआ था। इसी वजह से पूर्व सेना प्रमुख बाजवा ने आईएमएफ से बेलआउट पैकेज मंजूर कराने के लिए अमेरिकी प्रशासन से सहायता भी मांगी थी।


कुछ पाकिस्तानी नेताओं ने स्वीकार किया था कि भारत के साथ युद्ध में लगे रहना गलत था, क्योंकि इससे उसे कुछ हासिल नहीं हुआ। हालांकि सत्तारूढ़ राजनेताओं ने कश्मीर मुद्दे पर अपना राग अलापना जारी रखा। जनरल बाजवा ने भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ मतभेद तोड़ने की कोशिश की थी। उन्होंने आगे बढ़ने के लिए एक व्यापार मॉडल का सुझाव भी दिया था। लेकिन उनका कार्यकाल समाप्त हो गया और उनका वह विचार कागज पर सिमट कर रह गया, जो दोनों देशों के बीच संबंधों में बड़े बदलाव ला सकता था। विश्लेषकों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय और घरेलू दबाव के कारण, पाकिस्तान में तीन महीने बाद होने वाले संसदीय चुनाव वहां पहले से ही लोकतंत्र पर मंडराते खतरे को देखते हुए स्वागतयोग्य हैं। 

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