भारत में बेरोजगारी एक पुरानी समस्या है, लेकिन इधर इसका नया ही रूप देखने को मिल रहा है। पहले समझा जाता था कि यदि आप पूरी तरह फिट हों और काम करना चाहते हों, तो आपको कोई न कोई काम मिल ही जाएगा। इसके साथ अगर आप पढ़े-लिखे हों, तो काम मिलने की उम्मीद और बढ़ जाती है। लेकिन अफसोस है कि यह आम समझ इधर पुरानी पड़ने लगी है। सरकारी नौकरियों के लिए आ रहे आवेदनों की संख्या इसकी गवाही दे रही है। समस्या सिर्फ आवेदनों की संख्या की नहीं है, उन्हें भरकर भेजने वाले बेरोजगारों के आर्थिक शोषण की भी है, क्योंकि एक-एक आवेदन भेजने पर उन्हें हजार-पांच सौ से कम की चपत नहीं लगती है।
मौजूदा वित्त वर्ष में कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) की छह परीक्षाओं में शामिल होने के लिए आवेदकों की संख्या एक करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी है। कार्मिक मंत्री वी. नारायणसामी के अनुसार, पिछले चार वर्ष में एसएससी की परीक्षाओं में भाग लेने वाले उम्मीदवारों की संख्या में 10 गुना का इजाफा हुआ है। ऐसी ही कुछ और मिसालें हैं।
जैसे, उत्तर प्रदेश में प्राइमरी शिक्षकों के 72 हजार पदों के लिए 58 लाख आवेदन आए, तो पश्चिम बंगाल में भी 35 हजार प्राइमरी अध्यापकों के पदों पर दिसंबर, 2012 में 54.5 लाख उम्मीदवारों ने आवेदन किया। इन दोनों राज्यों में प्राइमरी शिक्षकों के लिए जितने बेरोजगारों ने आवेदन किया है, केवल वही संख्या सिंगापुर की कुल आबादी से दोगुना है। साफ है कि लाखों आवेदक इन भर्तियों के बावजूद बेरोजगार रह जाएंगे और यदि आयु सीमा पार नहीं की, तो ऐसी नौकरियों के अगले आवेदनों पर इसी तरह नए सिरे से हजारों रुपये खर्च करने की हिम्मत दिखाएंगे।
युवाओं द्वारा भेजे जाने वाले लाखों आवेदनों के कई संकेत है। पहला, यही है कि पढ़े-लिखों के बीच बेरोजगारी दबे पांव बढ़ रही है। ऐसे कई आकलन भी इधर सामने आए हैं, जिनके मुताबिक जितनी बड़ी डिग्री आपके पास होगी, नौकरी पाने के अवसर आपके लिए उतने ही कम हो जाएंगे। हालांकि ध्यान देने पर यह भी पता चलता है कि इन लाखों आवेदकों में बहुतेरे ऐसे हैं, जो प्राइवेट नौकरियों में हैं, पर भविष्य की सुरक्षा के अभाव के कारण सरकारी नौकरी पाने की उनकी चाह इधर ज्यादा बढ़ गई है।
इसका एक अन्य अभिप्राय यह है कि छोटे-मोटे कस्बों और शहरों के युवा पढ़-लिखकर अपना काम-धंधा शुरू करने का जोखिम मोल नहीं लेना चाहते। लोग एक के बाद डिग्रियां तो हासिल करते जाते हैं, लेकिन कोई स्वतंत्र आजीविका तलाश करने की जहमत नहीं उठाते। ऐसी स्थिति में जब योग्यता के मुताबिक काम मिलना मुश्किल हो जाता है, तो वे मजबूरी में सरकारी बाबू या टीचर की नौकरियों की तरफ भागते हैं।
अशिक्षित और शिक्षित बेरोजगारी का फर्क इसे सही साबित करता है। हमारे देश में अशिक्षितों की बेरोजगारी के आंकड़ों पर नजर डालें, तो स्थिति एकदम साफ हो जाती है। उनमें बेरोजगारी का प्रतिशत महज 1.2 है, जबकि ग्रेजुएटों में यह 9.4 और पोस्ट ग्रेजुएटों में 10 प्रतिशत है। अमेरिका और ब्रिटेन में पढ़े-लिखों की बेरोजगारी का प्रतिशत इसका आधा है। वह भी तब, जब वहां काम के अवसर इधर बहुत कम हुए हैं।
बेरोजगारों के बल पर अपना खजाना भरने में जुटी राज्य सरकारों को क्या इतनी सदाशयता नहीं दिखानी चाहिए कि यदि वे नौकरियों का अकाल नहीं दूर सकतीं, हरेक बेरोजगार को अपने चुनावी घोषणापत्र में किए गए वायदे के मुताबिक बेरोजगारी भत्ता नहीं दे सकतीं, तो कम से कम बेरोजगारों के पहले से खाली बटुए में सेंध तो न लगाएं। यदि उन्हें यह प्रतीत हो रहा है कि अपात्र बेरोजगार भी ऐसी भर्तियों के लिए अपना आवेदन डालने की कोशिश करते हैं, तो वह उन्हें ऐसा करने से रोकने की व्यवस्था बना सकती हैं।
उदाहरण के लिए, यूपी में प्राइमरी टीचर की पात्रता न्यूनतम बीएड की डिग्री के साथ उम्मीदवार का कोई अध्यापक पात्रता परीक्षा (जैसे सीटीईटी या टीईटी) उत्तीर्ण होना अनिवार्य है। एक आकलन के अनुसार, यूपी में फिलहाल सिर्फ तीन लाख लोग ही यह पात्रता रखते हैं, तो शेष 55 लाख आवेदक कहां से आ गए हैं। यदि उन्होंने भूलवश आवेदन कर दिया है, तो उन्हें ऐसी भूल करने से रोका जा सकता था।