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जाना-पहचाना परिचय!

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किसी भी खेल स्पर्द्धा के चीफ गेस्ट और साधु-संत में यही समानता होती है कि वे किसी को नहीं पहचानते। इसलिए आपने देखा होगा कि खिलाड़ियों से परिचय करवाने की सनातन परंपरा रही है खेलों में। काम निकलवाने हैं, तो चीफ गेस्ट बना देना कोई घाटे का सौदा नहीं है। कई खेल स्पर्द्धाएं तो इसीलिए होती हैं कि फाइल अटकी पड़ी है और साहब हैं कि चिड़िया नहीं बैठा रहे। ऐसा नहीं है कि इस हरकत का उपयोग सिर्फ फाइल की वजह से ही होता है। जहां भी काम अटक रहा हो या काम करवाना हो, इसे अंजाम दिया जा सकता है।
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अब मैदान पर तो दीप प्रज्ज्वलन नहीं हो सकता और न ही मां सरस्वती की तस्वीर पर हार चढ़ा सकते हैं। तो बढ़िया तरीका यही है कि खिलाड़ियों से परिचय करवा दो। खिलाड़ी का मन तो खेलने में लगा रहता है, मगर वह पांच-दस मिनट की इस बाधा को दौड़ लगाकर पार कर लेता है।
मजा तो तब आता है, जब किसी खिलाड़ी को चीफ गेस्ट बनाया जाता है। वह ‘परिचय’ प्राप्त करता है उन सारे खिलाड़ियों से, जिनकी जीवन-लीला उसे कंठस्थ है। हंसी तो आती है अपने नाम बताते हुए, मगर क्या करें, मजबूरी में करने पड़ते हैं। खेल में स्पर्द्धा उद्घाटन का यही रिवाज जो है।
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रात को मिलते हैं...अन्ना के यहां। चीफ गेस्ट ने हाथ मिलाते हुए खिलाड़ी से कहा।
हां, थोड़ी देर से आऊंगा...चले मत जाना। खिलाड़ी ने झुककर, मुस्कराते हुए जवाब दिया।
कल तुम कहां थे...आए नहीं। दूसरे खिलाड़ी से परिचय हो रहा है।
मेहमान आ गए थे...आज आता हूं। खिलाड़ी ने परिचय दिया।
अकेले-अकेले देख आए तारे जमीं पर? चीफ गेस्ट आगे बढ़ते जा रहे हैं। खिलाड़ी पीछे छूटते जा रहे हैं।
वाइफ पीछे पड़ गई थी...तुम्हारे साथ फिर देख लेंगे। अच्छी फिल्म है। खिलाड़ी ने झुकते हुए कहा, जैसे सम्मान कर रहा हो।
चीफ गेस्ट आगे बढ़े जा रहे हैं। खिलाड़ी सामने हैं...कौन पहले हाथ आगे करे...दोनों में दो दिन पहले ही माराकूटी हो चुकी है। न जाने किसने पहले हाथ बढ़ाया...और नाखुन चुभो दिया चीफ गेस्ट के हाथ में। मगर रवायत यही कहती है कि चीफ गेस्ट को मुस्कराते रहना चाहिए! इसलिए मुस्कराहट बनी रही। हाथ पर खून छलछला आया था...चीफ गेस्ट के।
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प्रकाश पुरोहित

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