प्रतिष्ठित टाइम मैग्जीन ने अपने वर्षांत के कवर पेज पर जो बाइडन और कमला हैरिस को जगह देते हुए उनकी चुनावी जीत को 2020 की सबसे प्रभावशाली घटना बताया है। राष्ट्रपति चुनाव में सबसे उम्रदराज व्यक्ति की अमेरिकी चुनावी इतिहास में सर्वाधिक पॉपुलर वोटों से जीत तथा उपराष्ट्रपति पद के लिए पहली एशियाई-अमेरिकी महिला की विजय का निस्संदेह ऐतिहासिक महत्व है। लेकिन कोविड-19 के वैश्विक असर ने दूसरी तमाम घटनाओं को महत्वहीन कर दिया है।
दुनिया भर में 7.8 करोड़ सक्रिय मामले, 16 लाख मौत, अर्थव्यवस्थाओं की नकारात्मक विकास दर, 60 करोड़ से अधिक रोजगार का जाना, शहरों में लॉकडाउन, राष्ट्रीय सीमाओं तथा स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों का बंद होना, दुनिया के आधुनिक विकसित देशों तक में आईसीयू और वेंटिलेटर की कमी पड़ जाना तथा सामूहिक अंतिम संस्कार जैसे दृश्यों से साफ है कि इस अदृश्य शत्रु ने हमारे जीवन पर अभूतपूर्व असर डाला है।
इस वैश्विक संकट के बीच हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मोर्चा संभाला। सार्क देशों के नेताओं साथ वर्चुअल बैठक करने, 165 से अधिक देशों में हाइड्रोक्सीक्लोरक्वीन की आपूर्ति करने तथा खाड़ी देशों में डॉक्टर और नर्स भेजने के फैसले मेडिकल इमर्जेंसी में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका के बारे में ही बताते थे। जून, 2014 से नवंबर, 2019 तक 94 देशों का दौरा करने वाले मोदी ने 2020 में एक भी देश का दौरा भले नहीं किया, पर श्रीलंका, बांग्लादेश, ऑस्ट्रेलिया, लक्जमबर्ग और डेनमार्क के प्रधानमंत्रियों के साथ वर्चुअल बैठक की, तो म्यांमार के राष्ट्रपति तथा अफगानिस्तान के राष्ट्रीय सुलह परिषद के अध्यक्ष अब्दुल्ला अब्दुल्ला की अगवानी की।
विगत फरवरी में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, पत्नी, बेटी और दामाद के साथ भारत आए थे, और अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम में प्रधानमंत्री मोदी ने डेढ़ लाख लोगों के बीच उनका स्वागत किया था। ट्रंप ने मोदी को लिजन द मेरिट से भी, जो पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री को दिया गया, सम्मानित किया। विगत अक्तूबर में 2+2 डायलॉग में भाग लेने के लिए अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और रक्षा मंत्री मार्क एस्पर भारत आए, और बेका (बेसिक एक्सचेंज ऐंड को-ऑपरेशन एग्रीमेंट) पर भी दोनों देशों ने दस्तखत किए। हालिया मालाबार संयुक्त युद्धाभ्यास में भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान की हिस्सेदारी ने वास्तविक नियंत्रण रेखा तथा दुनिया की दूसरी जगहों में भी आक्रामक मुद्रा अख्तियार किए चीन को भारत-अमेरिकी साझेदारी के जरिये ठोस संदेश दिया।
शंघाई सहयोग संगठन में भागीदारी, मॉस्को में विदेश मंत्री के दौरे, टोक्यो में क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों के सम्मलेन में भागीदारी तथा संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन व सेशल्स के दौरों ने कोविड-19 की भीषणता के बीच भी द्विपक्षीय, बहुपक्षीय और रणनीतिक रिश्तों को मजबूती देने की भारत की प्रतिबद्धता के बारे में ही बताया। क्वाड जहां चीन की आक्रामकता के खिलाफ मजबूत समूह के रूप में उभर रहा है, वहीं खाड़ी देश भारत की ऊर्जा और सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। फिर चूंकि वहां बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं, इसलिए भी खाड़ी देशों के साथ भारत की नजदीकी का महत्व है।
अलबत्ता चीन, पाकिस्तान और नेपाल से भारत के संबंधों के मामले में वर्ष 2020 एक मुश्किल साल रहा। चीन के साथ व्यापार संतुलन बनाने की कोशिश सफल नहीं हुई। चीन से आने वाले सीधे विदेशी निवेश पर भारत की चौकस नजर तथा 400 से अधिक चीनी एप पर प्रतिबंध लगाने के फैसले की चीन ने आलोचना की, इसके बावजूद पाकिस्तान को समर्थन देने की अपनी नीति से वह थोड़ा भी पीछे नहीं हटा। नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार तथा मालदीव जैसे देशों पर गहरा असर छोड़ने वाली चीन की नीति से भारत के रणनीतिक हित प्रभावित हुए हैं।
विगत 14 जून को चीनी सेना ने पिछले 43 साल से जारी शांति और संयम बनाए रखने के समझौते का उल्लंघन करते हुए वास्तविक नियंत्रण रेखा पर स्थित गलवां घाटी में 20 भारतीय सैनिकों की निर्ममता से हत्या कर दी। भारत के जवाबी हमले में मारे गए चीनी सैनिकों की संख्या ज्यादा थी, हालांकि बीजिंग ने इस बारे में खुलासा नहीं किया। बॉर्डर कमांडर स्तर की आठ दौर की वार्ताओं तथा दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की मुलाकातों से भी इस गतिरोध का हल नहीं निकल पाया है।
हालांकि भारतीय सैनिकों ने सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण चोटियों पर कब्जा जमा रखा है, पर चीनी सैनिक यथास्थिति की बहाली में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे, तथा चीन क्वाड की मजबूती और भारत-अमेरिकी दोस्ती को संदेह की नजर से देख रहा है। नेपाल के चीन समर्थक प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने कालापानी, लिपुलेख तथा लिंपियाधुरा का विवादास्पद नक्शा पारित कर अपने भारत-विरोधी रुख का परिचय दिया। और विडंबना देखिए कि अब जब चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी दोफाड़ होने की राह पर है, तब भारत नहीं, बल्कि चीन इस टूट को रोकने के लिए सक्रिय हो गया है।
पाकिस्तान अब भी सीमा पार से आतंकी भेज रहा है, तथा 26/11 के दोषियों को उसने सजा नहीं दी है। बालाकोट पर भारतीय हवाई हमले से भी पाकिस्तान के भारत-विरोधी तथा कश्मीर पर रवैये में कोई फर्क नहीं आया है। ऐसे ही, अफगानिस्तान में स्कूल, कॉलेज और संसद के निर्माण में मदद करने के लिए तीन अरब डॉलर की आर्थिक मदद करने तथा अफगान सैनिकों को प्रशिक्षित करने के बावजूद पाकिस्तान के असर तथा अमेरिका के अफगानिस्तान से निकलने की हड़बड़ी की वजह से भारत वहां हाशिये पर है। रूस से भारत के रिश्ते अच्छे हैं, लेकिन वह क्वाड की मजबूती को चीन-विरोधी होने के कारण पसंद नहीं करता।
ब्रेग्जिट के बाद के परिदृश्य का लाभ उठाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसॉन को गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है। आसियान और दक्षिण पूर्व एशिया से भारत के संबंध सकारात्मक हैं, पर इसमें चीन की छाया दिखती है। जहां तक भारत-प्रशांत रिश्ते के भविष्य की बात है, तो नए अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन के पदभार ग्रहण करने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।