इस साल की शुरुआत में इराक की राजधानी बगदाद के हवाई अड्डे पर ईरान की दूसरी सबसे बड़ी शख्सियत, जनरल कासिम सुलेमानी की अमेरिकी हमले में हत्या का ईरान के बाद सबसे ज्यादा विरोध कहां हुआ? अमेरिका में। लेकिन आगे बढ़ने से पहले, इसकी अहमियत पूरी तरह समझने के लिए थोड़ा इतिहास में जाना होगा।
ईरान के लोकप्रिय प्रधानमंत्री मोसद्दिक तेल स्रोतों का राष्ट्रीयकरण करने पर तुले हुए थे। अमेरिका फारस के खाड़ी क्षेत्र में अपने हितों के प्रतिकूल चलने वाली किसी भी सरकार को सहन नहीं कर सकता था। खुफिया एजेंसी सीआईए ने 1953 में मोसद्दिक का तख्ता पलटवा दिया। अमेरिका की छत्रछाया में शाह रजा पहलवी की सरकार बनी। अमेरिका के पौ बारह थे।
अमेरिका और अन्य देशों की तेल कंपनियों के लिए असीमित मुनाफे की गारंटी हो गई। अमेरिका की हथियार निर्माता कंपनियां ईरान को आधुनिक हथियार सप्लाई करने लगीं। 1978 तक शाह और अमेरिका दोनों की बल्ले-बल्ले थी। सीआईए और उसकी ईरानी सहयोगी एजेंसी 'सावाक' को रत्तीभर भी अनुमान न हो सका कि शाह की कुर्सी के नीचे विध्वंसक टाइम बम सुलग रहा है।
ईरान के बाजारों से उठी चिंगारी अबादान के तेल कारखानों तक पहुंचने के बाद विराट दावानल का रूप लेने लगी। पेरिस में बैठे आयतुल्ला खुमैनी ने नैतिक समर्थन देते हुए 'शाह गद्दी छोड़ो ' का नारा दिया। विश्व इतिहास में यह विचित्र क्रांति थी। बड़े-बड़े आलिम से लेकर ईरान की प्रभावशाली कम्युनिस्ट पार्टी (तुदेह) शाह विरोधी एजेंडे पर एकजुट थे।
पुलिस और सेना ने गोली चलाने से इन्कार कर दिया। शाह अपने महल की छत से भागने को मजबूर हो गए। 1979 में 'सर्वोच्च नेता' खुमैनी के संरक्षण में बनी सरकार शिया धार्मिक सिद्धांतों पर चलने लगी। तुदेह पार्टी और अन्य प्रगतिशील तत्वों के साथ ही अमेरिका से सहयोग की गुंजाइश नहीं थी।
शाह के खिलाफ लड़ाई में बड़ा योगदान करने वाले मजदूरों, युवाओं, छात्रों और किसानों का दमन करने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। अमेरिका ने ईरान में सत्ता परिवर्तन के लिए शिया बहुल इराक के सुन्नी तानाशाह सद्दाम हुसैन से हमला करवा दया। यह युद्ध करीब आठ साल चला। आयतुल्लाओं की सरकार बनी रही। यह अमेरिका की हार थी।
इतिहास की इन घटनाओं का जिक्र यह साबित करने के लिए कि अमेरिकी प्रतिष्ठान की नजर में ईरान दुश्मन है और दुश्मन से हमदर्दी देशद्रोह होनी चाहिए। लेकिन अमेरिका में अच्छी-खासी संख्या ऐसे लोगों की भी है, जो व्हाइट हाउस, पेंटागन और सैनिक-औद्योगिक प्रतिष्ठान की देशभक्ति-देशद्रोह की परिभाषा से इत्तेफाक नहीं रखते।
सुलेमानी की हत्या के विरोध में लगभग 70 अमेरिकी शहरों में प्रदर्शन हुए। व्हाइट हाउस के पास लाफाएट चौक और रक्षा मंत्रालय पर सैकड़ों लोग जुटे। 80 साल की अभिनेत्री जेन फांडा भी पहुंचीं। उन्हें ट्रोल नहीं किया गया। प्रदर्शनकारियों का नारा था- हम ईरान से युद्ध नहीं चाहते। इराक से 60-70 हजार अमेरिकी सैनिकों को वापस लाओ।
ट्रंप विरोधी अमेरिकी जनता की इस घोषणा पर गौर करें- हम ईरान, सीरिया, फलस्तीन, और यमन की जनता के साथ एकजुटता व्यक्त करते हैं, जो अमेरिकी साम्राज्यवाद के, जिसके वर्तमान नेता डोनाल्ड ट्रंप हैं, हमले का सामना कर रही है। विरोध की सबसे तीखी और तिलमिलाऊ आवाज मुखर की स्थायी असहमति के प्रतीक, प्रोफेसर नोअम चोम्स्की ने।
अत्यंत प्रतिष्ठित, एमआईटी में प्रोफेसर रह चुके, आधुनिक भाषा विज्ञान के जनक, चोम्स्की ने कहा, कासिम सुलेमानी की हत्या अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद है। अंतरराष्ट्रीय कानून आपसी मामलों में बल प्रयोग या उसकी धमकी को वर्जित करता है। अगर न्यूरमबर्ग के पैमानों (पराजित जर्मन नाजियों पर मुकदमा चलाने वाला कोर्ट) को लागू किया जाता, तो 1945 के बाद हर अमेरिकी राष्ट्रपति को फांसी लगती।
इतना सब बोलने और लिखने के बावजूद चोम्स्की को एमआईटी से निकाला नहीं गया और न वह राजद्रोह के लिए गिरफ्तार हुए। अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान का अमेरिकी मिलिटरी-इंडस्ट्रियल कंप्लेक्स से नाभिनाल का संबंध है। लेकिन यह व्यवस्था अपने कट्टर विरोधियों को भी सम्मानित करती है। सीनेटर विलियम फुलब्राइट (स्कॉलरशिप फेम) एक ऐसी ही शख्सियत थे।
उनकी चर्चित पुस्तक द एरोगेंस ऑफ पावर निजाम के खिलाफ एक विस्तृत चार्जशीट मानी जाती है। बर्लिन संकट के दौरान फुलब्राइट ने कहा, मुझे हैरत हो रही है, पूर्वी जर्मनी की कम्युनिस्ट सरकार सीमा को बंद क्यों नहीं कर देती, क्योंकि मेरा मत है कि ऐसा करने का उसे अधिकार है। यह बर्लिन की दीवार बनने के पहले की बात है।
इस तरह की सार्वजनिक अभिव्यक्ति के बाद भी विलियम फुलब्राइट सीनेट की विदेश संबंध समिति के अध्यक्ष बने रहे। अमेरिकी समाज की इस अंदरूनी ताकत का राज शायद यह है कि वह असुरक्षित नहीं महसूस करता। अमेरिकी जनता के प्रतिनिधियों ने अठारहवीं शताब्दी के अंतिम दशक में संविधान के प्रथम संशोधन की आवश्यकता महसूस कर ली थी।
मोटे तौर पर यह संशोधन नागरिकों के अधिकार और राज्य सत्ता की सीमाएं तय करता है। इसमें धर्म के स्थान और उसकी भूमिका को भी संविधान के फौलादी प्रावधानों में बांध दिया गया। दुनिया की परम संहारक, सर्वोच्च सैन्य शक्ति से कम ताकतवर अमेरिकी नागरिक की सत्ता नहीं है। जान लेना तो दूर, किसी अश्वेत से मामूली बदसलूकी भी अदालत में पहुंचा सकती है।
एक तरफ अहंकारी राज्य सत्ता है, तो उसके समानांतर समाज और विधि की भी सत्ता है, जो विलियम फुलब्राइट, नोअम चोम्स्की जैसों के लिए स्थान सुरक्षित रखती है और उन लाखों लोगों के लिए भी जो व्हाइट हाउस, पेंटागन और हथियार निर्माता कंपनियों के मुख्यालयों पर प्रदर्शन कर, बिना खरोंच के लौट जाते हैं और जिन्हें राजद्रोह-देशद्रोह की धाराओं के फंदे का डर नहीं रहता।
विरोध और असहमति की इसी भट्ठी में तपकर अमेरिकी लोकतंत्र ने कुंदन बनने का रास्ता चुना। वास्तव में स्वस्थ और सर्वहिताय राजनीति अन्य किसी मार्ग पर जा भी नहीं सकती।