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इस्तीफा मांगना बहुत आसान है

Thu, 23 Jul 2015 08:40 PM IST
सुरजीत सिंह
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नैतिकता के आधार पर इस्तीफे मांगे जा रहे हैं। इस्तीफे नैतिकता के आधार पर ही मांगे जाते हैं। किसी नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री का नाम घपले, गबन, घोटाले में आया नहीं कि, जो मुंह कभी कायदे से सदन में पब्लिक की समस्याओं के निराकरण की मांग करने के लिए नहीं खुलते, वे इस्तीफे मांगने के लिए तुरंत खुल जाते हैं। बल्कि पूरे मगरमच्छ की तरह खुलते हैं। और यदि इस्तीफा देने वाला मय इस्तीफे मुंह में घुस जाए, तो अपनी विकट राजनीतिक इच्छाशक्ति के बलबूते ये उसे भी निगल जाएं।
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हमारे यहां इस्तीफा मांगना सबसे आसान है और देना उतना ही मुश्किल। भले ही मांगन मरण समान कहा गया हो, पर सारा दर्शन मांगने पर ही टिका है। इसलिए दिया भी कैसे जाए, जब सिर्फ लेने की थ्योरी पर ही राजनीति में घुसपैठ की हो और हमेशा वोट से लेकर कमीशन, रिश्वत तक मांगते ही रहे हों। इस प्रकार जिनमें नैतिकता का लेशमात्र भी न हो, उनसे नैतिकता के आधार पर इस्तीफा मांगना हास्यास्पद ही है। यह तो घोर अनैतिकता हुई। यदि उनमें नैतिकता ही होती, तो वे गर्दन अनैतिकता के दलदल में क्यों धंसाते! क्यों घपला, गबन, घोटाला, अनैतिक आचरण करते!

पहले के नेता नैतिकता की इतनी ऊंचाई दिखा गए कि अब उसके आगे ढलान ही आती है। सो, अब सिर्फ अनैतिकता के आधार पर ही इस्तीफा मांगा जाना चाहिए। लेकिन अभी अनैतिकता में कोई गाइडलाइन तय नहीं है कि कितनी अनैतिकता पर इस्तीफा दिया जाना चाहिए। यदि अनैतिकता के नाम पर इस्तीफा दिया जाने लगा, तो यह भी देखा जाएगा कि पिछली दफा जब पांच हजार मौतों पर किसी ने इस्तीफा नहीं दिया, तो सिर्फ छियालीस मौतों पर तो अनैतिकता जैसा कुछ बनता नहीं है।
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अगर इसे नजीर मानी जाएगी, तो भविष्य में इसका आधार इस तरह होगा कि पिछली दफा किसी ने दो घोटालों पर इस्तीफा दिया, तो अगली बार इस्तीफे के लिए पांच-दस घोटाले जरूरी होंगे। इस से कम पर इस्तीफा मांगने वालों को ही अनैतिक मांग के जुर्म में गिरफ्तार किया जाना चाहिए!
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