सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि नागरिकता (संशोधन) कानून किसी समुदाय के खिलाफ नहीं है, यह केवल हमारे कुछ पड़ोसी देशों में उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के कई इलाकों में हुई हिंसा व अशांति की वजह से राष्ट्रीय राजधानी में अस्थिरता की स्थिति पैदा हुई।
निर्विवाद रूप से किसी भी तरह की हिंसा व अराजकता के लिए लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है। किंतु दुखद है कि ऐसी परिस्थितियों का भी कांग्रेस सहित विपक्ष द्वारा अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
दरअसल इस हिंसा की पृष्ठभूमि में ‘भ्रामकता’ का एक ऐसा तानाबाना तैयार हुआ है, जिसे कांग्रेस सहित कुछ अन्य दलों द्वारा नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 के लागू होने के बाद से ही बुना जा रहा था। अब जबकि दिल्ली नाजुक दौर से गुजर रही है, तब भी कांग्रेस इस हिंसा की आड़ में भ्रामक बयानबाजी कर भाजपा पर बेबुनियाद आरोप गढ़ने का प्रयास कर रही है।
आजादी के बाद से ही कांग्रेस देश के अल्पसंख्यकों के मन में भय और असुरक्षा की भावना पैदा कर अपना वोट बैंक साधने की रणनीति पर चलती रही है। कालक्रम में वोट बैंक साधने की इस विभाजनकारी रणनीति को कुछ और दलों ने भी आजमाने में संकोच नहीं किया।
देश के सामने इन राजनीतिक दलों द्वारा फैलाई जा रही गलत सूचनाओं के प्रति जागरूक, संयमित और सजग होने की चुनौती है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि कुप्रचारों की वास्तविकता को सामने लाया जाए।
गत 24 फरवरी को जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत पहुंचने वाले थे, उससे कुछ ही समय पूर्व दिल्ली के कई इलाकों में नागरिकता(संशोधन) कानून के विरोध के नाम पर प्रदर्शन और सड़कें बंद करने की गतिविधियां शुरू हुईं।
आमतौर पर जब कोई विदेशी मेहमान आता है, तो देश के मान, सम्मान और प्रतिष्ठा को बरकरार रखने की चिंता सभी की होनी चाहिए। किंतु कांग्रेस ने इस मामले में भी अपने राजनीतिक हितों के लिए मर्यादित आचरण के विपरीत काम किया।
बयानों के लिए दूसरों पर उंगली उठाने वाली कांग्रेस तथा आम आदमी पार्टी को अपने नेताओं द्वारा नागरिकता कानून के विरोध में शुरुआत से ही दिए गए बयानों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। उग्र बयानबाजी के बाद से दिल्ली में सड़कें बंद कर प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हुआ।
कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के नेता शाहीन बाग के सड़क बंद आंदोलन में शामिल हुए और लगातार उकसाने वाले बयान दिए। शाहीन बाग के अलावा दिल्ली के अन्य मुस्लिम बहुल इलाकों में नागरिकता (संशोधन) कानून के नाम पर लोगों के मन में भय और असुरक्षा की भावना को बढ़ावा देकर विरोध प्रदर्शन खड़े करने का काम भी किया गया।