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इस बेबसी से कैसे निकलें

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बीते वर्ष 16 दिसंबर को दिल्ली में हुई गैंगरेप की घटना के बाद भारी दबाव में पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस जे एस वर्मा की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया था, जिसे देशभर से 80,000 से अधिक सुझाव मिले थे।
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जस्टिस वर्मा कमेटी को मिले सुझाव यह बताते हैं कि उक्त घटना ने पूरे देश को कितना उद्वेलित कर दिया था। यह अलग बात है कि वर्मा कमेटी के सुझावों को खास तवज्जो न देते हुए सरकार ने बलात्कार विरोधी एक कड़ा कानून बना दिया, लेकिन देश की राजधानी में ही एक पांच वर्षीय बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म की घटना बताती है कि कुछ भी नहीं बदला है।

न पुलिस बदली है, न समाज और न ही राजव्यवस्था। दिल्ली की इस घटना से पहले इसी महीने उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में भी एक बच्ची के साथ बलात्कार की कोशिश किए जाने का मामला सामने आया। बुलंदशहर में तो पुलिस ने पीड़िता को ही हवालात में बंद कर दिया था।
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एक नए कानून के बावजूद महिलाओं और बच्चियों के साथ दुष्कर्म या उनके उत्पीड़न की घटनाएं थमी नहीं हैं, और उनके प्रति पुलिस के रवैये में भी कोई बदलाव नहीं आया है। साफ है कि सिर्फ कानून ही पर्याप्त नहीं है। सवाल है कि इसका निदान क्या है?

वर्मा कमेटी ने पूरी व्यवस्था में बदलाव के लिए व्यापक सुझाव दिए थे, पर केंद्र सरकार ने सिर्फ बलात्कार संबंधी कानून में ही परिवर्तन किए जाने से संबंधित सुझाव माने और बाकी को ठंडे बस्ते में डाल दिया। गहराई से देखें, तो इस समस्या की जड़ में सामाजिक-आर्थिक कारण भी नजर आते हैं।

आज रोजी-रोटी की तलाश में बड़ी आबादी गांवों से निकलकर महानगरों और दूसरे शहरों की ओर आ रही है। इस तरह पलायन करने वाले नए स्थान पर गुमनाम होकर समाज की वर्जनाओं से दूर होते जाते हैं और उनका व्यवहार भी बदलने लगता है। इस सामाजिक परिवर्तन पर गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है।

दूसरा कारण पुलिस तंत्र से जुड़ा है, जिसमें सुधार की जरूरत है। समाज में आज पुलिस का अमानवीय चेहरा कहीं भी देखा जा सकता है। हमारी पुलिस गैरपेशेवराना तो है ही, वह ठीक से प्रशिक्षित और नई प्रौद्योगिकी से सुसज्जित भी नहीं है।

जाहिर है, बलात्कार की बढ़ती घटनाओं और महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए पुलिस व्यवस्था में सुधार अत्यंत जरूरी है, मगर इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। देश की कानून व्यवस्था को लागू करने वाली सबसे जरूरी कड़ी पुलिस आज भी अंग्रेजों के बनाए 1861 के पुलिस ऐक्ट से बंधी हुई है।

सर्वोच्च न्यायालय तक कई बार इसमें सुधार की हिदायत दे चुका है। मगर सरकारों के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है। अभी हाल ही में दिल्ली में पुलिस और प्रशासनिक सुधारों के लिए केंद्रीय गृह मंत्री और मुख्यमंत्रियों की जो बैठक बुलाई गई थी, उसमें 21 मुख्यमंत्रियों ने शिरकत ही नहीं की। मुख्यमंत्रियों का यह व्यवहार यह दर्शाने के लिए काफी है कि हमारे देश के राजनेता देश की कानून व्यवस्था के प्रति कितने गंभीर हैं?

पुलिस सुधार के साथ ही राजनीतिक सुधार की भी सख्त जरूरत है, क्योंकि व्यवस्था को चलाने वाला तो यही वर्ग है। वास्तव में पुलिस और राजनीतिक सुधार एक-दूसरे के पूरक हैं। आखिर अपराधियों को राजनीति से रोका क्यों नहीं जा रहा है। भ्रष्टाचारियों और अपराधियों की राजनेताओं से सांठगांठ के कारण ही समाज में नकारात्मकता बढ़ती जा रही है।

बहरहाल, हमारे देश में आखिर ऐसी कोई व्यवस्था क्यों नहीं बन पा रही है कि कानून, न्याय व्यवस्था और पुलिस प्रणाली अपराध और उसके कारणों का स्वतः संज्ञान ले सकें। अपराध और अपराधियों का ऐसा डाटा बेस बनाने की भी जरूरत है, जिसे केंद्र और सभी राज्य साझा कर सकें।

लेकिन पुलिस सुधार की राह में सबसे बड़ा अड़ंगा राजनीतिक वर्ग है, क्योंकि पुलिस का सबसे ज्यादा दुरुपयोग यही जमात करती है।  विधायिका की स्थिति देखें, तो शर्म से सिर झुक जाएगा, क्योंकि हमारे 40 फीसदी जनप्रतिनिधियों का आपराधिक रिकॉर्ड रहा है। ऐसे में क्या यह उम्मीद करें कि संसद के मौजूदा सत्र में राजनीतिक पार्टियां इस विषय पर पूरी समग्रता के साथ विचार करेंगी?
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