प्रधानमंत्री मोदी की ढाका यात्रा का मुख्य उद्देश्य विरासत में मिले मुद्दों का समाधान पाना, जो अब भी हमारे रिश्ते को भरमाते हैं, और दोनों देशों के बीच घनिष्ठ आर्थिक एकजुटता के युग की नींव रखना था। लेकिन सबसे पहली जरूरत अतीत की समस्याओं से छुटकारा पाने की थी, जिसका मतलब है एक समझौते के जरिये हमारी भू-सीमा को निर्धारित करना, जिसके लागू होने के बाद अब सीमा के दोनों तरफ की छोटी-छोटी बस्तियों की अदला-बदली का समाधान हो गया है, जो इसके प्रभावी प्रबंधन के लिए एक बड़ी समस्या थी।
उनकी यात्रा का दूसरा उद्देश्य उस समस्या पर काबू पाना था, जो तीस्ता नदी के जल बंटवारे संबंधी समझौते को रोके हुए है। वर्ष 2011 में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मुद्दे पर समझौते के लिए मनमोहन सिंह सरकार की कोशिशों पर पानी फेर दिया था। इस बार संयोग से वह प्रधानमंत्री मोदी के साथ ढाका की यात्रा पर गईं। तीस्ता पर समझौते की अपेक्षा हालांकि इस बार नहीं थी, पर ढाका में हुई बातचीत और यात्रा से उत्पन्न सकारात्मक माहौल निश्चय ही दोनों देशों को इस महत्वपूर्ण समझौते की तरफ ले जाएगा। ममता बनर्जी को इस वार्ता में शामिल कर मोदी ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी मिसाल कायम की कि केंद्र को उन विदेशी मामलों में उस राज्य को भी शामिल करना चाहिए, जो संबंधित राज्य से सीधे जुड़े हों।
प्रधानमंत्री मोदी की बांग्लादेश यात्रा कुछ मामलों में खासा महत्वपूर्ण रही। भारत के सभी दक्षिण एशियाई पड़ोसियों में बांग्लादेश ऐसा है, जो लगभग पूरी तरह से भारत से घिरा है। उसकी 4,413 किलोमीटर लंबी भू-सीमा में से मात्र 271 किलोमीटर सीमा म्यांमार से जुड़ी है, जबकि शेष भारत से। जाहिर है, 1947 तक बांग्लादेश भारत का ही हिस्सा था और सीमा के दोनों तरफ के बंगालियों के बीच सांस्कृतिक संबंध बहुत गहरे हैं, क्योंकि वे एक ही भाषा और साहित्य साझा करते हैं। फिर यह वह देश है, जिसका जन्म 1971 में भारत के कारण ही हुआ।
बांग्लादेश पूर्वी भारत को पृथक करता है और पूर्वोत्तर के इलाके को शेष देश से अलग करता है। सिलिगुड़ी गलियारा, जो पश्चिम बंगाल को असम से जोड़ता है, शायद भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण जोखिम है, क्योंकि इसका उत्तरी हिस्सा चुंबी घाटी में शामिल है, जो चीन का हिस्सा है। भारत और बांग्लादेश की सीमा की प्रकृति ऐसी है कि इसे पूरी तरह से बंद नहीं किया जा सकता। इसलिए ढाका का सहयोग भारत की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री के रूप में शेख हसीना के कार्यकाल में इस सहयोग की कीमत हमें पता है, क्योंकि वर्ष 1991-96 और 2001-2006 के दौरान खालिदा जिया के कार्यकाल में भारत के साथ बांग्लादेश के रिश्ते बहुत खराब रहे।
लेकिन यह 'आधा गिलास खाली और आधा गिलास भरा हुआ' वाली स्थिति है। यह पूरा क्षेत्र, जिसमें पूर्वोत्तर भारत, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान शामिल है, अपार क्षमता वाला है। इसका किसी ने पूरी तरह से दोहन नहीं किया है, क्योंकि मतभेदों को पाटने के लिए प्रभावी कूटनीति के अभाव के चलते सबके लिए लाभदायक समाधान नहीं ढूंढा गया है।
ऐसे में भारत के लिए कई फायदे हैं। अभी पूर्वोत्तर के राज्यों को कोलकाता के बंदरगाह तक पहुंचने के लिए सिलिगुड़ी गलियारे से जाना होता है। अगरतला और कोलकाता के बीच 1,600 किलोमीटर से भी ज्यादा दूरी है, जबकि बांग्लादेश के चटगांव से इसकी दूरी मात्र 100 किलोमीटर है। अब बांग्लादेश न केवल अपनी परिवहन सुविधाओं का बेहतर उपयोग कर सकेगा, बल्कि भारत, नेपाल और भूटान में जलमार्ग और रेल नेटवर्क के जरिये माल ढुलाई को बढ़ावा देकर पारगमन शुल्क के रूप में एक अरब डॉलर का लाभ भी कमा सकता है। तिब्बत में चीनी नेटवर्क से जोड़ने या प्रस्तावित बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार गलियारे के जरिये इस क्षेत्र को बढ़ावा दिया जा सकता है।
पर इन सबके लिए भारत और बांग्लादेश या भारत और चीन के बीच के विवादों को कूटनीति के जरिये खत्म करना होगा। इसके लिए इस क्षेत्र के देशों को भी जागरूक होना होगा, जो खुद को उग्रवादी समूहों द्वारा इस्तेमाल किए जाने की इजाजत देते हैं। खालिदा जिया ने कट्टरवादियों को लंबे समय तक पनाह देकर संभवतः भारत को नीचा दिखाने की कोशिश की, पर उन्होंने ऐसा कर अपने देश को भी हानि पहुंचाई, क्योंकि कट्टरपंथी बांग्लादेश के लिए ही खतरा बन गए।
प्रमुख समस्याओं को हल करने के अलावा मोदी ने इस यात्रा में समझौतों, सहमति पत्रों और प्रोटोकॉल को आगे बढ़ाया, जो भविष्य में हमारे रिश्ते को और बेहतर कर सकते हैं। जिन 22 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए, उनमें तटीय नौ-परिवहन समझौता, अंतर्देशीय पारगमन व्यापार संधि, दो अरब डॉलर के लाइन ऑफ क्रेडिट पर सहमति पत्र और भारतीय निवेश की सुविधा से संबंधित समझौता शामिल है। इसके अलावा, चटगांव बंदरगाह के उपयोग, तटरक्षकों के बीच सहयोग, ढाका और शिलांग व अगरतला के बीच बस सेवा, बंगाल की खाड़ी के विकास पर सहयोग और दोनों देशों के शोध संस्थानों और विश्वविद्यालयों के बीच सहयोग से संबंधित सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर हुए। समग्र जोर सीमा के दोनों ओर आई आर्थिक गिरावट और विभाजन के चलते खत्म हुए संपर्क की बहाली पर है, और सभी संबंधित लोगों के लिए एक आर्थिक उन्नति का मंच तैयार करना है।
इस यात्रा के दौरान सामान्य रूप से प्रधानमंत्री के कदम सही थे, जिसमें भारत के लिए बांग्लादेश के महत्व पर जोर दिया गया, साथ ही, घनिष्ठ सहयोग, व्यापार, पारस्परिक लाभ पर आधारित भावी संबंधों का खाका खींचा गया। ढाकेश्वरी मंदिर और रामकृष्ण मिशन की यात्रा का प्रतीकात्मक महत्व था, जो भारत की एक महत्वपूर्ण चिंता को रेखांकित करता है-बांग्लादेश में हिंदू आबादी लगातार घट रही है, क्योंकि उन्हें हिंसा और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है।
-लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के प्रतिष्ठित फेलो हैं