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रक्षा संबंधों की मजबूत बुनियाद

Mon, 01 Sep 2014 08:11 PM IST
मनोज जोशी
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा का मुख्य उद्देश्य भारत और जापान के बीच द्विपक्षीय व्यापार, आर्थिक और सांस्कृतिक समझौता तो है ही, रक्षा संबंधों में प्रगाढ़ता लाना भी इस दौरे का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है। चीन के प्रति भारत और जापान की आशंकाएं एक जैसी हैं। दोनों देशों के बीजिंग के साथ सीमा विवाद हैं और दोनों ने चीन की आक्रमकता का खामियाजा भुगता है। हालांकि सैन्य अभ्यास और बेहतर रिश्तों की साझा घोषणाओं के बावजूद राजनीतिक और सामरिक दृष्टि से दोनों के संबंधों में अभी तक वैसी गहराई नहीं आ पाई है।
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ऐसे में, इस द्विपक्षीय संबंध को नई ऊंचाई देने के लिए भारत जापान के साथ सैन्य और औद्योगिक साझेदारी के साथ ही एक राजनीतिक-सामरिक संबंध विकसित करना चाहता है। जापान एक व्यापारिक देश है, जिसकी समृद्धि निर्विवाद रूप से समुद्र पर निर्भर है। कई समुद्री गलियारे उन क्षेत्रों से होकर गुजरते हैं, जो भारत के काफी करीब हैं। यही वजह है कि भारत और जापान अपनी नौसेना और तटरक्षक बलों का नियमित द्विपक्षीय अभ्यास करते रहते हैं। तटरक्षक बलों का अभ्यास तो पिछले 14-15 वर्षों से चल रहा है, जबकि नौसेना के बीच अभ्यास का सिलसिला हाल ही में शुरू हुआ है। अब तो जापान उस त्रिपक्षीय मालाबार नौसैनिक अभ्यास में भी साझेदार है, जिसमें भारत और अमेरिका शामिल हैं।

बहरहाल, नरेंद्र मोदी की इस यात्रा के बहाने भारत जापान के साथ एक असैन्य परमाणु करार भी चाहता है। हालांकि जापान ऐसे किसी समझौते को लेकर उलझन में रहा है, क्योंकि वह इसके लिए परमाणु परीक्षण न करने और परमाणु अप्रसार को लेकर भारत की प्रतिबद्धता चाहता है, जबकि भारत ने इस शर्त का विरोध किया है। नई दिल्ली भारत-अमेरिका परमाणु करार के प्रावधान वाला ही भारत-जापान असैन्य परमाणु करार चाहता है। लेकिन सोमवार को जो घोषणाएं हुईं, उसमें परमाणु सहयोग बढ़ाने की बात तो है, पर ऐसा कोई करार नहीं हो सका है। बहुत कम लोग जानते होंगे कि दुनिया भर में एपी 1000 रिएक्टर की मार्केटिंग करने वाले वेस्टिंग्सहाउस कॉरपोरेशन का स्वामित्व जापान के पास है। इसके अलावा जापानी कंपनी हिताची अमेरिका की प्रमुख परमाणु ऑपरेटर जनरल इलेक्ट्रिक की साझेदार कंपनी भी है।
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चूंकि विश्वयुद्ध के समय के इतिहास, शांति को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध संविधान और रक्षा उपकरणों के निर्यात पर प्रतिबंधों के चलते आधुनिक जापान सैन्य सुरक्षा सामान के क्षेत्र में बड़ा खिलाड़ी नहीं है। लेकिन कमोबेश सभी विशेषज्ञ इस तथ्य को स्वीकार करेंगे कि जापान के पास दुर्जेय सैन्य क्षमता है, जो आत्मसुरक्षा को ज्यादा तवज्जो देती है। हालांकि सैन्य उत्पादों के निर्यात को लेकर जापान ने अपने नियमों में लगातार बदलाव किए हैं, लेकिन हथियार प्रणालियों का निर्यात करने में उसे अभी और वक्त लगेगा। वैसे इस बीच भारत जापान की प्रौद्योगिकी, पुर्जों को एसेंबल करने की कला और उसकी विराट उद्योग क्षमता से मैन्युफैक्चरिंग में भी महारत हासिल कर सकता है।

निश्चय ही, रक्षा सामग्रियों का उत्पादन एक ऐसा क्षेत्र है, जो परस्पर लाभदायक साझेदारी को बड़ी ऊर्जा दे सकता है। लेकिन वर्तमान में सिर्फ एक परियोजना ही वार्ता का मुख्य उद्देश्य है, वह है, भारतीय नौसेना और तटरक्षक बलों के लिए जापान का स्वदेशी शिनमायवा यूएस-2 विमान की आपूर्ति। इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच कई दौर की बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन अब तक भारत और जापान किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सके हैं। हालांकि इस बीच जापान भारत द्वारा यूएस-2 बनाने और उसे तीसरे देशों को बेचने पर अपनी सहमति जता चुका है, जिसे इस परियोजना के समर्थक भारत के विमान-निर्माण प्रौद्योगिकी क्षेत्र की उन्नति के लिए मील का पत्थर बता रहे हैं।

बहरहाल, रक्षा प्रौद्योगिकी में ही कई अन्य क्षेत्र हैं, जिसकी तरफ भारत कदम बढ़ाना चाहेगा। जापान के पास एक ऐसी नौसेना है, जो चीन की बड़ी नौसेना के बावजूद पूरे क्षेत्र में श्रेष्ठतम है। इतना ही नहीं, सोरयू वर्ग की पनडुब्बी जैसे जापानी रक्षा उत्पादों को दुनिया भर में पहचान मिली है और ऑस्ट्रेलिया ने इसे खरीदने की पेशकश भी की है। भारत की नजर कावासाकी विमानन कंपनी द्वारा तैयार दूसरी जापानी रक्षा उत्पादों पर भी है, जिनमें सी 1/2 शॉर्ट रेंज सैन्य परिवहन विमान, पी 1 समुद्री निगरानी विमान और टी 4 इंटरमीडिएट जेट ट्रेनर शामिल हैं। दुनिया के श्रेष्ठ युद्धक टैंकों में एक और पहाड़ी इलाकों में इस्तेमाल करने लायक टाइप 10 (एचडी) टैंक भी हासिल करने की कोशिश भारत कर रहा है, जिनकी गिनती बेहतर हल्के युद्धक टैंक में होती है। बैलिस्टिक मिसाइल क्षेत्र में भी कुछ भविष्योन्मुखी उत्पाद हैं। हालांकि भारत अभी इन उत्पादों के उपयोग में सक्षम नहीं हो सकता, लेकिन उम्मीद करनी चाहिए कि नरेंद्र मोदी कुछ ऐसी तकनीक और प्रौद्योगिकी लेकर वापस लौटेंगे, जिसका इस्तेमाल हम कर सकते हैं।

इन रक्षा उत्पादों को दरकिनार भी कर दें, तो भारत और जापान के बीच रक्षा समझौता निश्चय ही नई दिल्ली को उन संगठनों के करीब ले जाएगा, जिनके दरवाजे अभी उसके लिए बंद हैं। ये संगठन हैं, मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था (एमटीसीआर), ऑस्ट्रेलियाई समूह, वासनार समूह और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह। ये दोहरे इस्तेमाल वाले निर्यात नियंत्रण समूह हैं। इन समूहों में हमारी सदस्यता के होने का अर्थ होगा, प्रौद्योगिकियों के दोहरे उपयोग (सैन्य और असैन्य) तक हमारी पहुंच। और यह निश्चय ही विकसित देशों की कतार में हमें आगे ले जाने में मददगार होगा।
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(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के प्रतिष्ठित फेलो हैं)
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