आज लोकसभा चुनाव का नतीजा सामने आ जाएगा। भारतीय गणतंत्र का गुणगान चारों तरफ होने लगेगा। उसको सुरक्षित रखने का दावा सबसे ज्यादा शायद वे लोग करेंगे, जिनका उसे खोखला और निरर्थक बनाने के प्रयास में सबसे अधिक योगदान रहा है। इसलिए कुछ ऐसी महिलाओं को याद करना, उनकी बहादुरी को सलाम करना और गणतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने के प्रति उनकी निष्ठा से कुछ सीखना अच्छा होगा।
हुगली जिले की शांतना मंडल जिला अस्पताल में भर्ती है। उसके इलाके में छह मई को चुनाव हुआ था, और चुनाव के कुछ दिन बाद उस पर तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने चाकू से हमला किया था। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि धमकियों के बाद भी उसका भांजा माकपा का पोलिंग एजेंट बना। उसे ऐडवा नेत्री वृंदा करात के साथ मैं देखने गई। अस्पताल में इस 35 वर्षीय दलित खेत मजदूर महिला ने कहा, मैं डरती नहीं हूं। क्यों डरूं? 14 साल पहले मेरे पति ने मुझे छोड़ दिया। मैं अपनी बहन के साथ रहती हूं और हम मेहनत-मजदूरी कर अपने बच्चों को पाल रहे हैं। मेरी दो बेटियां हैं, उसका एक बेटा। हमें धमकी देने जो आए थे, उनसे मैंने कहा था कि तुम अगर हमारा घर जला दोगे, तो हम खुले में सोएंगे। अगर हमें मार डालोगे, तो जितनों को मारोगे, लाल झंडा उठाने उतनी ही और आगे आएंगी।
मेरे इलाके में भी लोगों को डराने-धमकाने का काम तृणमूल की तरफ से पहले ही शुरू हो गया था। कुछ इलाके में हमारे पोलिंग एजेंट, कार्यकर्ताओं और उनके घरों पर हमले हुए थे। काफी तनाव के माहौल में 12 को मतदान शुरू हुआ। एक विधानसभा क्षेत्र बीजपुर के 204 पोलिंग बूथों में से करीब 175 में तृणमूल के अलावा किसी अन्य पार्टी का एजेंट प्रवेश भी नहीं कर पाया। लेकिन यहां भी आम लोगों ने जोखिम उठाकर वोट देने का प्रयास किया।
पानपुर की दलित महिला प्रधान रेखा मंडल पोलिंग एजेंट थी। सुबह से ही उसे धमकियों और गालियों की बौछार सहनी पड़ी, लेकिन उसने अपनी जगह नहीं छोड़ी। दोपहर में उसके घर पर हमला किया गया। उसके बाद रेखा को बूथ से निकाला गया। थोड़ी देर बाद मैं उससे मिलने गई, तो उसकी आंखों में आंसू भर गए। उसे इसका अफसोस नहीं था कि उसका घर तोड़ा गया है, बल्कि इस बात का था कि उसे बूथ छोड़ने के लिए मजबूर किया गया।
रेखा के गांव के सामने सड़क पर सुभाष नगर का ग्रामीण इलाका है, जहां की पंचायत की दलित महिला सदस्य रोमा मंडल अपने गांव के लोगों को लेकर वोट देने आतंक के माहौल में गई थी। जब वे बूथ की तरफ जा रहे थे, तब उनका रास्ता तृणमूल के लोगों ने रोका। रेखा ने अधिकारियों से संपर्क किया और उनकी मदद से वे बूथ तक पहुंचे। वहां रेखा के घुटने पर लाठी मारी गई, उसे धक्का दिया गया। उसके साथ की कई औरतों को उनके बेटों की उम्र के तृणमूल कार्यकर्ताओं ने थप्पड़ मारे।
मैं जब उनसे मिलने पहुंची, तो देखा कि पुलिस के अधिकारी दल-बल के साथ सड़क पर खड़े तमाशा देख रहे थे। रोमा गांववालों के घेरे में एक कुर्सी पर बैठी कराह रही थी। मैंने सबको तसल्ली देने की कोशिश की। जब मैं जाने लगी, तो मार खा चुकी औरतों ने अपनी उंगलियों पर काला निशान मुझे दिखाया।
मेरे क्षेत्र के एक छात्र पर गर्म तेल फेंका गया था। एक महिला थी-रूमा मंडल। उसके घुटने के नीचे गोली लगी थी। मैंने उसका सिर सहलाया, तो उसने मुझे अपनी उंगली पर काला निशान दिखाया। गणतंत्र की लड़ाई लड़ने वाले ये गरीब साहसी लोग हैं, जिनको समाज और व्यवस्था ने वोट के अधिकार के अलावा कुछ नहीं दिया है। इसलिए अपनी जान की बाजी लगाकर वे उसे बचाने में जुटे हैं।