दीपावली रोशनी का उत्सव है। दीपों के उजास का उत्सव है। हमारे भारतीय साहित्य में दीप न जाने कितनी तरह से और कितनी बार आते हैं। महादेवी वर्मा जी के साहित्य में तो दीप कई रूपों में आते हैं। 'मधुर-मधुर मेरे दीपक जल' जैसी कई पंक्तियां उनके साहित्य में हैं। उन्होंने प्रतीक के रूप में दीपक का इस्तेमाल किया है, लेकिन प्रतीक भी तो हम उसी को बनाते हैं, जो हमारे जीवन में कहीं रहा हो।
हमारे साहित्य में, हमारी कलाओं में मिट्टी के दीये का उल्लेख बार-बार हुआ है। सामान्य दिनों में भी जब हम कहीं दीप को जलता हुआ देखते हैं, तो मन में एक उजास भर उठता है और कुछ कोमल भावनाएं भी हमारे मन में पैदा होती हैं। दीपक की लौ में एक आभा तो होती ही है, रोशनी की महीन रेखाएं भी होती हैं, जो देखने पर बहुत सुंदर लगती हैं। यह एक अलग तरह का सौंदर्य रचती हैं। दिवाली के अवसर पर जब हम कतार में दीये को जलते हुए देखते हैं, तो हमारा मन उजास से भर उठता है। दिवाली के अवसर पर मुझे हर साल अपना बचपन याद आता है। बचपन में जब मैं कलकत्ते से किसी साल दिवाली में गांव आता था, तो मेरी मां बड़े आग्रह से किसी खेत, बाग, पेड़, नदी, तालाब, कुएं के पास एक-एक दीप जलाकर रख आने के लिए कहती थीं।
दिवाली के बहाने इससे हम अपने आसपास की प्रकृति से जुड़ते थे और इसका निहितार्थ यही था कि दिवाली पर चहुंओर रोशनी, चहुंओर प्रकाश। आज महानगरों में रहने वाले बच्चों को यह सब कौन बताएगा! कभी-कभी मुझे लगता है कि पाठ्यक्रमों में इस तरह के पाठ रखे जाने चाहिए। अगर वास्तव में हम अपने पर्व-त्योहारों की सांस्कृतिक गरिमा और महत्ता को नई पीढ़ी या आने वाली पीढ़ी को बताना चाहते हैं, तो हमें ऐसे प्रयास अवश्य करने चाहिए। यह दिवाली कोरोना काल की दिवाली है। इस दिवाली को न बच्चे भूलेंगे, न बुजुर्ग। इससे पहले कभी ऐसी दिवाली आई नहीं है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से खासकर दिल्ली और एनसीआर के इलाके में देखा जाता है कि प्रदूषण की समस्या बहुत गंभीर हो उठती है। इस बार भी प्रदूषण का स्तर बहुत बढ़ गया है।
कोरोना काल और इस प्रदूषण की वजह से भी हमें यह एहसास होता है कि हमने प्रकृति के साथ अब तक कितना अत्याचार किया है और पर्यावरण की अनदेखी करके हमने अपने जीवन को कितनी मुश्किलों में डाल लिया है। सिर्फ पर्यावरण ही नहीं, हमने अपने देसी हुनरों की भी अनदेखी की है। हाल के वर्षों में चीनी वस्तुओं के बहिष्कार की बातें जबसे मुखर हुई हैं, तो भले ही हम चीनी लड़ियां नहीं खरीदते, लेकिन दीपावली पर जलाते तो लट्टू ही हैं। दीप तो हम भूल ही चुके हैं। दीप को भूलने का मतलब यह हुआ कि हमने माटी से अपना संबंध तोड़ लिया है। अपने देसी शिल्पकारों एवं हुनरमंदों को भी हम भूल गए हैं।
यह अवसर इन सब चीजों को याद करने का है। इन सब चीजों को याद कर हम अपनी संस्कृति, अपनी परंपरा को तो बचाएंगे ही, इसके अलावा हमारी देसी वस्तुएं, जिस पर गांधी जोर देते थे, भी बची रहेंगी। इन देसी वस्तुओं के उत्पादन से कलाकारों, बुनकरों, हस्तशिल्पियों को कुछ काम मिलता था, कुछ आमदनी होती थी। इससे हुनर की एक विशाल परंपरा जिंदा रहती थी। दिवाली के बहाने हम अगर अपने देसी हुनर की उस परंपरा को बचाएं, तभी दिवाली सार्थक होगी। इसलिए मैं बार-बार दोहराना चाहूंगा कि इस दिवाली दीप जलाओ, बिजली के लट्टू और लड़ियां नहीं। इसमें भले थोड़ी परेशानी हो सकती है कि दीप, बाती और तेल का इंतजाम करना पड़े, लेकिन इतना तो किया ही जा सकता है। कम से कम दस-बीस दीप तो जला ही सकते हैं।
वैसे भी दिवाली पर लक्ष्मी पूजन के वक्त दीप तो जलाते ही हैं, तो उसकी संख्या कुछ और बढ़ा दी जाए। इससे हमारे कुंभकार बंधुओं के घर में भी दिवाली की खुशियां आएंगी। यह एक छोटी-सी, मगर अच्छी शुरुआत होगी। इसके अलावा दिवाली पर हम एक संकल्प-जैसा कुछ ले सकते हैं कि अपने बच्चों को देसी शिल्पकारों, हस्तशिल्पियों, हुनरमंदों की बनाई वस्तुएं उपहार में देंगे, चाहे वह कोई खिलौना हो, सजावटी सामान हो, या कोई चित्र हो। ऐसा करने पर हमारे बच्चों को यह दिवाली याद भी रहेगी और आर्थिक संकट के दौर में शिल्पकारों की मदद भी हो जाएगी।
यह बहुत अच्छी बात है कि अब भी हमारे घरों में दिवाली के अवसर पर अल्पनाएं बनाई जाती हैं। पहले हम चावल पीसकर बनाते थे, लेकिन अब रंगों से बनाए जाते हैं। उसमें भी मेरा आग्रह है कि देसी जैविक रंगों का प्रयोग किया जाए, जहां तक हो सके, हानिकारक रासायनिक रंगों से बचा जाए। नई चीजें आने से हमारी पारंपरिक चीजों की उपयोगिता खत्म नहीं हुई है, बल्कि हमने ही उन्हें अपने जीवन से बाहर कर दिया है। हमारा यह देश सांस्कृतिक रूप से बहुत ही समृद्ध रहा है। बचपन में हम देखते थे कि बांस और लकड़ी की बनी कई तरह की डोलचियां, फूलडालियां बिका करती थीं, जिनमें फूल, फल आदि घरों में रखे जाते थे।
दिवाली के अवसर पर ऐसी चीजें सड़क के किनारे फुटपाथ पर बिका करती थीं। दीपावली मन में उजास भरने का उत्सव है। और आज इस मन को और भी उजला करने की जरूरत है, क्योंकि चाहे किसी भी तरह की बुराई हो, घरेलू हिंसा हो, स्त्रियों के प्रति यौन हिंसा हो, कालाबाजारी हो, मिलावटखोरी हो, नफरत हो, अतिरिक्त धन संग्रह की होड़ हो, ये अपने ही लोग तो कर रहे हैं। इसका मतलब हुआ कि समाज के कुछ हिस्सों में अब भी बुराइयों का अंधेरा पसरा हुआ है, जिसे दूर करने की जरूरत है।
दिवाली पर बहुत ज्यादा दिखावा करने की बुराई भी बढ़ती जा रही है। कहीं इतनी रोशनी होती है कि आंखें चुंधिया जाती हैं और कहीं किसी झोपड़ी में एक दीया तक नहीं जलता। प्रशासन की मनाही के बावजूद पटाखे छोड़ने में भी एक होड़-सी दिखती है। हमें इस होड़ से, प्रदर्शनप्रियता से बचना चाहिए, क्योंकि इससे इस रोशनी भरे, उल्लास और उम्मीद के पर्व की गरिमा नष्ट होती है। हमें सामाजिक भेदभाव की इस बुराई को खत्म करना चाहिए, तभी इस उत्सव की सार्थकता है।