आपने अक्सर चित्रों में हमारे अवतारों, तीर्थंकरों और सद्गुरुओं के चेहरे के आसपास एक वर्तुलाकार आभामंडल देखा होगा और विस्मय-विमुग्ध हुए होंगे कि यह जो आलोक इन्हें घेरे हुए है, यह सच में है, अथवा उनके शिष्यों ने उन्हें महिमामंडित करने के लिए बना दिया है! यह निश्चित ही एक वास्तविक घटना होती है और ध्यान-साधना की थोड़ी-बहुत गहराई वाले साधकों को दिखाई देती है। वे अपने भीतर जितना आलोकित होते जाते हैं, उतने ही वे श्रेष्ठ आत्माओं के आसपास प्रकट होने वाले आभामंडल को देख पाते हैं और उनके चुम्बकीय प्रभाव में आकर और अधिक आलोकित हो जाते हैं।
ये स्थिति केवल भगवान राम, कृष्ण, शिव, बुद्ध, महावीर, गुरु नानक, कबीर, रैदास, मीरा जैसी श्रेष्ठ आत्माओं की ही नहीं होती- बीज रूप में हम सब उसी भगवत्ता के स्वामी हैं, हम सबके भीतर उसी दिव्यता की पूंजी सन्निहित है। श्रेष्ठ आत्माओं की उपस्थिति हमें इसका स्मरण दिलाती है कि इन आत्माओं का दीया जल गया है और हमारा अभी जला नहीं, जलने को है। श्रेष्ठ आत्मा का यही अर्थ है कि अब वे केवल मिट्टी के दीये ही नहीं रहे, वे मिट्टी की सीमा से ऊपर उठ कर ज्योतिर्पुंज हो गए, असीम हो गए। ज्योति अर्थात चैतन्य।
चिरंतन काल से भारत के ऋषियों और द्रष्टाओं ने स्वयं की अनुभूति के आधार पर हमारे पथ को आलोकित किया है और हमने उनके आगमन पर दीपोत्सवों का आयोजन किया है। भारत में हुए इन आयोजनों में श्रीराम के स्वागत में हुआ दीपावली महोत्सव सर्वाधिक केंद्रीय स्थान रखता है, क्योंकि श्रीराम अवतार होते हुए भी सामान्य मनुष्य के सर्वाधिक निकट हैं, सर्वमान्य हैं, भले ही उन्हें आंशिक अवतार माना जाता है और भगवान कृष्ण को पूर्ण अवतार। समाज में भगवान राम ने एक ऐसे आदर्श की स्थापना की, जैसी किसी और ने नहीं की। एक आदर्श नीतिवान मर्यादा पुरुषोतम व्यक्ति और एक आदर्श शासक भी रामराज्य का प्रतीक बन गया सुशासन का।
दिवाली का उत्सव भगवान महावीर से भी जुड़ा है, इसी महीने की अमावस को उनको मोक्ष प्राप्त हुआ। भगवान महावीर त्याग-तपस्या के शीर्ष पुरुष हैं, इसलिए जैनियों की दीपावली में लक्ष्मी की पूजा नहीं होती, जबकि हिंदू लक्ष्मी की पूजा करते हैं। ओशो ने 50 वर्ष पहले कहा था, 'मनुष्य के हाथ में धर्म के नाम पर संप्रदायों के बुझे दीयों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। धर्म के नाम पर मनुष्य के हाथ में बुझी हुई किताबों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। धर्म के नाम पर परमात्मा तो बिल्कुल नहीं है। लेकिन पुरोहित जरूर हैं, मंदिर हैं, प्रार्थनाएं हैं, और सब बुझी हुई, सब राख, उनमें कोई रोशनी नहीं, कोई प्रकाश नहीं है।'
उनके अनुसार, जिसके हाथ में कोई प्रकाश नहीं है, कोई दीया नहीं है, वह संभलकर चलता है; यह सोचकर कि मेरे हाथ में प्रकाश नहीं, रास्ता अंधेरा है और मैं अंधा हूं। लेकिन हमारे हाथ में बुझे हुए दीये हैं। और उन्हीं दीयों को हम अगर जलते हुए दीये समझ रहे हों, तो आदमी का भविष्य बहुत खतरनाक है। यह स्मरण रहे कि जागे हुए व्यक्ति के लिए दिवाली हर रोज होती है और सोये हुए व्यक्ति के लिए सिर्फ एक दिन या कुछ दिन। ऐसा मत सोचना कि तुम्हारे पास ध्यान नहीं है। तुम्हारे पास ध्यान है- उतना ही जितना बुद्धों के पास। रत्ती-भर कम नहीं।
परमात्मा किसी को कम और ज्यादा देता नहीं। उसके बादल सब पर बराबर बरसते हैं। उसका सूरज सबके लिए उगता है। उसकी आंखों में न कोई छोटा है, न कोई बड़ा है। ऐसा मत सोचना कि कृष्ण को कुछ ज्यादा दिया था, कि बुद्ध को कुछ ज्यादा दिया था, कि ये रोशन हुए, कि ये जगमगाए। न खुद जगमगाए, बल्कि इनकी जगमगाहट से और भी लोग जगमगाए। दीयों से दीये जलते चले गए। ज्योति से ज्योति जले! जरूर इन्हें कुछ ज्यादा दे दिया होगा छिपाकर; हमें दिया नहीं, हम क्या करें? नहीं; ऐसा मत सोचना। निष्कर्ष यह है कि सोच-विचार और चिंताएं छोड़ें, केवल जागें, समग्र जीवन का प्रेम और ध्यान के साथ आलिंगन करें। ध्यान और प्रेम बांटें और अपने जीवन और जगत को रोशन करें।