संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण-पूर्व एशिया में पिछले बीस वर्षों में बाल विवाह की दर आधी रह गई है। इसकी बड़ी वजह युवाओं का शिक्षा की ओर बढ़ता रुझान, बेरोजगारी, आवास की लागत और समाज की बदलती सोच है। दुनिया के कई देशों में युवा शादी से दूरी बना रहे हैं। इसके पीछे अच्छा जीवनसाथी या स्थायी नौकरी न मिलना, आर्थिक परेशानियां और निजी आजादी में कमी का डर जैसे कारण हैं। यह सभ्यता के लिए सकारात्मक लक्षण नहीं है। जीने की औसत आयु और स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता में बढ़ोतरी और सामाजिक परिवर्तन के चलते बच्चे पैदा करना अब लोगों की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है। इसके अलावा, संकोच और सामाजिक वर्जनाओं के कारण परिवारों में शादी, यौन संबंध, गर्भधारण और मातृत्व जैसे विषयों पर खुलकर बात नहीं हो पाती। यही बंधन विद्यालयों में भी है। नतीजतन, हर स्तर पर लोगों के अपने अलग-अलग विचार हैं। इन विषमताओं को देखते हुए अब युवाओं के लिए रुकावटें खड़ी करने के बजाय नए विकल्प तैयार करने की सोच पर जोर दिया जा रहा है। अस्सी के दशक में फैमिली प्लानिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया के डॉ. महिंदर वात्सा और अवाबाई वाडिया व नेशनल वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन की ओर से विद्यालयों में पारिवारिक जीवन शिक्षा के तहत इन विषयों हेतु अभियान चलाया गया था, पर वह परवान न चढ़ सका। वर्तमान सरकार ने नई शिक्षा नीति के तहत इस विषय को प्रमुखता से प्रसारित करने की मंशा जाहिर की है। युवा से वृद्ध होती आबादी के लिए चीन और जापान के उदाहरण नजीर हैं कि समय रहते कदम उठाए जाने चाहिए।
इसी वजह से इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र ने विश्व जनसंख्या दिवस की थीम युवाओं की इच्छाओं और जरूरतों पर केंद्रित रखी है, ताकि वे अपने अधिकारों का सही उपयोग करते हुए अपनी पसंद का बेहतर भविष्य बना सकें। आवश्यकता युवा संवाद द्वारा युवाओं में व्याप्त भ्रांतियों को दूर करते हुए आने वाली संतति के लिए उपयुक्त वातावरण और अवसर के प्रति आश्वस्त करने की है। सामाजिक बदलावों के कारण परिवारों में आपसी विश्वास व समझ कम हुई है, जिससे दूरी और टकराव बढ़ा है। ऐसे में, कुटुंब प्रबोधन के जरिये परिवार की ताकत का एहसास कराना और दूरियों को कम करना जरूरी है, ताकि तेजी से हो रहे जनसांख्यिकीय बदलाव की गति को रोका जा सके। हर व्यक्ति को इस विषय पर जागरूक होकर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
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