ऐन चुनाव के पहले जाटों को केंद्रीय नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग के कोटे के तहत आरक्षण देने संबंधी केंद्र सरकार के फैसले ने साफ कर दिया है कि इस वोट बैंक पर उसकी निगाह है। इस फैसले को राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजीत सिंह ने अपनी कोशिशों का नतीजा बताया है। उनका कहना सही है, पर इस मुद्दे पर स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह के नजरिये को भी नहीं भूलना चाहिए।
इस फैसले को समग्रता में देखने की जरूरत है। आपातकाल के बाद 1977 में जनता पार्टी की जो सरकार बनी थी, उसका एक बड़ा वोट बैंक पिछड़ा समुदाय था। पिछड़े समुदाय की परख के लिए उस सरकार ने वीपी मंडल की अगुवाई में मंडल आयोग बनाया था। आयोग ने पिछड़ापन मापने के लिए सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक मानक तय किए थे। मसलन, उसने ऐसी जातियों को पिछड़े की परिभाषा में रखा था, जो मुख्यत: अपने जीवन-यापन के लिए शारीरिक श्रम पर निर्भर हों। आयोग के मुताबिक, वे समुदाय भी पिछड़े वर्ग की श्रेणी में आते थे, जिनके यहां कभी स्कूल का मुंह न देखने वाले पांच से 15 वर्ष उम्र के बच्चों की संख्या या बीच में ही स्कूल छोड़ देने वाले इस आयु वर्ग के बच्चों की संख्या राज्य के औसत से 25 फीसदी अधिक हो। इन पैमानों पर जाट पिछड़े नहीं थे। बल्कि कई जगह तो जाटों ने खुद को पिछड़ा बताए जाने पर विरोध भी जताया था।
दिलचस्प यह है कि पहले राम मंदिर आंदोलन के उभार और उसके बाद पिछले साल मुजफ्फरनगर में हुए दंगों के बाद उस भाजपा ने भी इस समुदाय को आरक्षित वर्ग में रखने की जरूरत नहीं समझी, जिसे इसका समर्थक माना जाता है। यहीं से बतौर वोट बैंक जाटों पर कांग्रेस की निगाह लगी। उसने अपने वरिष्ठ नेता पी शिवशंकर की अगुवाई में बने पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट को आधार बनाया, जिसे उन्होंने नवंबर, 1997 में पेश किया था! उस रिपोर्ट में राजस्थान के जाटों को कमजोर बताया गया था। इसके बाद कांग्रेस ने राजस्थान में जाटों को आरक्षण देने का शिगूफा छोड़ दिया, जिसका फायदा भी उसे मिला। यह देखकर भाजपा ने 1999 के लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान राजस्थान में जाटों को पिछड़ा वर्ग में शामिल करने का ऐलान कर दिया था। उससे घबड़ाई तत्कालीन अशोक गहलोत की सरकार ने चुनाव के तत्काल बाद जाटों को पिछड़ा वर्ग में आरक्षित करने का ऐलान कर दिया था।
राजस्थान में मिली कामयाबी से दूसरे राज्यों में फैले जाटों के बीच आरक्षण की मांग तेज होती गई। तीन साल पहले हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में जाट समुदाय ने रेलें रोकीं। जबकि राजस्थान की राह पर वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश, 2001 में मध्य प्रदेश और 2003 में हिमाचल प्रदेश ने जाटों को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर दिया है। 2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान राष्ट्रीय लोकदल के साथ कांग्रेस के समझौते के बाद मेरठ के रामलीला मैदान में राहुल गांधी और अजित सिंह की रैली में ही तय हो गया था कि केंद्रीय नौकरियों में जाटों को आरक्षण मिलेगा।
यह सवाल जरूर उठता है कि इस फैसले को ठीक चुनाव से पहले लागू क्यों किया गया है। दरअसल हाल ही में राजस्थान और दिल्ली विधानसभा चुनावों में जाटों ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया। इसलिए कांग्रेस सरकार हिली हुई है। गौरतलब है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 23 सीटों समेत 65 सीटों पर जाट मतदाता भारी तादाद में हैं। इनमें से 28 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां चुनावी नतीजा सिर्फ जाट मतदाता ही तय करते हैं।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जिस सरकार की अगुवाई में सरकारी नौकरियां लगातार कम होती जा रही हैं, उसमें इस आरक्षण का क्या महत्व है। वह भी तब, जबकि पहले से ही अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची में 76 जातियां शामिल हैं। तेज शहरीकरण और औद्यौगिकीकरण के चलते दिल्ली, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कई इलाकों में जाट समुदाय की आर्थिक स्थिति बेहतर हुई है। एक समुदाय को वोट बैंक में तब्दील करने का फैसला चुनावी राजनीति में कितना भी लाभ पहुंचाए, लेकिन समानता आधारित समाज की संरचना का लक्ष्य हासिल करने में यह कोई मदद पहुंचा पाएगा, इसमें संदेह है।