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कर्ज और संकेत: दृष्टिकोण में संतुलन और वित्तीय अनुशासन की दरकार, प्रबंधन अनिवार्य

अमर उजाला Published by: Pavan Updated Wed, 01 Jul 2026 08:22 AM IST

सार

केंद्रीय बैंक की तरफ से जारी आंकड़ों के अनुसार, देश में विदेशी कर्ज का मार्च, 2026 तक 762.8 अरब डॉलर तक पहुंचना तत्काल संकट का संकेत बेशक न देता हो, लेकिन यह निस्संदेह वित्तीय अनुशासन और विवेकपूर्ण ऋण प्रबंधन की आवश्यकता की याद दिलाता है।
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कर्ज और संकेत - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स


आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि के दौरान विदेशी कर्ज-जीडीपी अनुपात 19.8 फीसदी से बढ़कर 20.8 फीसदी हो गया है। यह एक फीसदी की वृद्धि मामूली दिखाई पड़ सकती है, लेकिन इससे यह संकेत भी मिलता है कि कर्ज की वृद्धि आर्थिक उत्पादन की तुलना में तेज रही है, जो भविष्य में एक परेशानी बन सकती है। उल्लेखनीय है कि विदेशी कर्ज अपने आप में कोई नकारात्मक बात नहीं है। अगर इसका उपयोग बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, विनिर्माण, तकनीकी उन्नयन और उत्पादक क्षेत्रों में निवेश के लिए किया जाए, तो यह आर्थिक विकास को गति ही देता है। लेकिन, चिंता तब होती है, जब कर्ज की वृद्धि अर्थव्यवस्था की आय अर्जित करने की क्षमता से कम हो जाए और उसका उपयोग ऐसे क्षेत्रों में होने लगे, जो भविष्य में पर्याप्त फल न दे सकें।


लिहाजा, कर्ज का आकार नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता, अवधि, ब्याज दर और उपयोगिता कहीं अधिक अहम होती है। भारत के मामले में एक राहत की बात यह है कि विदेशी मुद्रा भंडार अब भी मजबूत स्थिति में है और बाह्य भुगतान क्षमता संतोषजनक बनी हुई है। देश का अधिकांश विदेशी कर्ज दीर्घकालिक है, जबकि अल्पकालिक कर्ज का अनुपात अपेक्षया सीमित है। इसके अतिरिक्त, सेवा क्षेत्र, सूचना प्रौद्योगिकी, प्रवासी भारतीयों की ओर से भेजी जाने वाली धनराशि और निर्यात से मिलने वाली विदेशी मुद्रा भी भुगतान क्षमता को मजबूत आधार प्रदान करती है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां भारत की बाहरी ऋण स्थिति को फिलहाल नियंत्रित ही मानती हैं। फिर भी, कुछ ऐसे पहलू हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।


पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव, भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा कीमतों में अस्थिरता और डॉलर की मजबूती ने विकासशील देशों की ऋण लागत बढ़ाई है। अगर भविष्य में वैश्विक वित्तीय परिस्थितियां और कठोर होती हैं, तो विदेशी कर्ज पर ब्याज भुगतान का बोझ भी बढ़ सकता है। इस संदर्भ में निर्यात बढ़ाना सबसे प्रभावी उपायों में से एक है। देश ने सेवा निर्यात में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, किंतु वस्तु निर्यात में अभी पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं। विनिर्माण क्षेत्र को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाना और नए बाजारों तक पहुंच बनाना समय की मांग है। विदेशी कर्ज का मौजूदा स्तर तत्काल संकट का संकेत नहीं देता, लेकिन यह निस्संदेह वित्तीय अनुशासन और विवेकपूर्ण ऋण प्रबंधन की जरूरत की याद दिलाता है।

 
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