उदारवाद मर गया है अथवा कम से कम यह मरने के कगार पर है। चौथाई सदी पहले विजेता बनकर उभरा उदारवाद, जब अधिनायकवादी यूटोपिया पर उदार लोकतंत्र स्पष्ट रूप से प्रबल दिखाई देता था, अब बाहर से भी घेरेबंदी में है और अंदर से भी।
मानव जाति पर, जिसके लालच, पूर्वाग्रह, अज्ञान, वर्चस्ववाद, चापलूसी और डर के आगे गलती करने की आदत बर्लिन की दीवार के ढहने के बावजूद खत्म नहीं हुई है, नए तरीके से अंकुश लगाने और छल-कपट से उन्हें तोड़ने के लिए प्रौद्योगिकी समर्थित राष्ट्रवाद और अधिनायकवाद नए रूप में एक साथ सामने आए हैं। जैसे ही साम्यवाद का पतन हुआ, बंद समाजों को मुक्त करने के लिए मजबूर किया गया, तेज भूमंडलीकरण का दौर शुरू हुआ और अमेरिका ने हाइपर-पावर का उपनाम अर्जित किया, तो यह मानने को मजबूर होना पड़ा, जैसा कि चर्चित राजनीति विज्ञानी फ्रांसिस फुकुयामा ने 1989 में कहा था, कि पश्चिम और उसकी विचारधारा की जीत, पश्चिमी उदारवाद के व्यावहारिक और व्यवस्थित विकल्प को पूरी तरह खत्म कर देने का पहला स्पष्ट सबूत है। इसलिए फुकुयामा के ही अनुसार, पश्चिमी उदार लोकतंत्र के सार्वभौमिकीकरण के साथ ही इतिहास का अंत हो गया है। यह एक युक्तिसंगत तर्क था और इसका मतलब भी था। सोवियत साम्राज्य के भीतर गुलामों की जिंदगी बिताते करोड़ों लोग थोड़े ही समय पहले मुक्त हुए थे। वे जानते थे कि किस व्यवस्था का काम बेहतर था।
मानव इतिहास में पीछे मुड़कर देखिए, तो उदार लोकतांत्रिक प्रयोग की, जिसका जन्म नवजागरण से हुआ और जिसमें व्यक्ति द्वारा नियति पर जीत हासिल करने का विश्वास था, अवधि छोटी ही रही। इसके विपरीत अमोघ संप्रभुता, ईश्वर से हासिल शक्ति का प्रदर्शन, वर्चस्ववाद, कृषिदासता और इशैया बर्लिन के मुताबिक, 'तर्कवाद-विरोधी रहस्यवादी कट्टर ताकतों' द्वारा दमन लंबे समय तक चला।
बुद्धिवाद-विरोधी ऐसी ताकतें इन दिनों डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका में, मैरिन ले पेन के फ्रांस में, ब्लादिमीर पुतिन के रूस में और पश्चिम एशिया की ज्यादातर जगहों से लेकर उत्तर कोरिया तक काबिज हैं। कानून के शासन के तहत प्रतिनिधि सरकारें आज व्यर्थ ही साबित हुई हैं, जब अहंवादी सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम के दौर में उनके सत्ता से चिपके रहने और हिंसक होने की छवि बहुत जल्दी बन जाती है। फुकुयामा से बहुत पहले इशैया बर्लिन ने उदारवाद की एक बड़ी कमजोरी पकड़ ली थी। द क्रूक टिंबर ऑफ ह्युमैनिटी में उन्होंने लिखा था-'एक उदार धर्मोपदेश एक समूह को अपने विरोधियों को ज्यादा नुकसान पहुंचाने से रोकने के लिए एक खास किस्म का सुझाव देता है; वह प्रत्येक मानव समूह को अपनी खास विशेषता का एहसास दिलाने के लिए पर्याप्त जगह देता है, जिसमें दूसरे समूह के स्पेस में हस्तक्षेप करने की गुंजाइश नहीं होती। यानी उदारवाद में उस उत्कट युद्धघोष की जगह नहीं है, जो लोगों को त्याग, शहादत और वीरतापूर्ण कारनामे करने के लिए प्रेरित करे।'
अमेरिकी संविधान निर्माताओं को पता था कि उदारवाद का यह प्रेरित करने वाला तंत्र ही नागरिकों को लंबे समय तक तानाशाही से रक्षा करने का काम करेगा। जबकि स्वाधीनता के लिए कुछ चीजें जरूरी हैं। उदारवाद मानव समाज के बीच व्याप्त मतभेदों को स्वीकारने और लोकतांत्रिक संस्थाओं के जरिये उन्हें सुलझाने की संभावना की मांग करता है। उदारवाद तरह-तरह के सच, और संभवतः असंगत सत्य की स्वीकृति की भी मांग करता है। भाषण और चिल्लाहट, ध्रुवीकरण और तिरस्कार, बिकाऊ राजनीति और हल्के मनोरंजन की राजनीति के इस दौर में ट्रंप का उभार उतना हैरान करने वाला नहीं है, जितना खतरनाक है। इसी तरह पुतिन द्वारा अपनी प्रशंसा करना भी हैरान नहीं करता। रूसी अधिनायकवाद सत्ता के बाहुबली तामझाम का ही दूसरा रूप है, जिसमें चापलूस मीडिया सत्ताधारियों की जार जैसी छवि पेश करता है। बर्लिन ने रूढ़िवादी लेखक जोसेफ डे मैस्त्रे के विचारों में व्याप्त कुछ सच्चाई को रेखांकित किया था। बर्लिन ने कहा था, 'खुद को कुर्बान करने, खासकर महाशक्ति के सामने खुद को पीड़ित और पराजित करने की इच्छा, वर्चस्व हासिल करने की इच्छा, सत्ता की ताकत दिखाने की इच्छा और अपना अहं तुष्ट करने के लिए सत्ता और शक्ति का प्रदर्शन-वस्तुतः ये ताकतें ऐतिहासिक रूप से उतनी ही मजबूत हैं, जितनी शांति, समृद्धि, स्वतंत्रता, न्याय, खुशी और समानता की इच्छा।'
और इसलिए इतिहास का अंत नहीं होता। यह आगे-पीछे डोलता रहता है। अरब जागरण की, जो 1989 के बाद का सबसे बड़ा जनजागरण था, जिसमें अरब जनता ने खुद को सशक्त बनाने की कोशिश की, व्यापक विफलता के कई कारण थे, लेकिन इसका एक प्रमुख कारण था-मिस्र से लेकर लीबिया तक के समाज में उदार क्षेत्र का अभाव। यहां तक कि विशाल मध्यवर्ग की आबादी वाला मिस्र भी लोकतांत्रिक संस्थानों के जरिये भांति-भांति के सच को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं था। इसलिए सत्ता फिर सेना के पास चली गई और इस्लामपंथियों को-जिनमें उदरवादी भी थे, जेल या उससे भी बुरी जगह नसीब हुई।
रूस में और अब हंगरी से लेकर पोलैंड और चीन में अधिनायकवाद प्रबल है और उदारवाद पलायन कर रहा है। पश्चिम एशिया में इस्लामिक स्टेट अपनी लंबी छाया पेश कर रहा है। बढ़ती असमानताओं से आक्रांत पश्चिमी समाज (नव उदारवादी अर्थव्यवस्था ने भी उदारवाद की विश्वसनीयता को कमजोर किया है), राजनीतिक विमर्श, कॉलेज कैंपसों की बहस और सोशल मीडिया पर शेखी बघारना-ये सब अलग-अलग सचों को स्वीकारने के मामले में एक नई किस्म की अधीरता को दर्शाते हैं। यह एक नई असहिष्णुता और उस समझौते व मेल-मिलाप का निषेध है, जो उदार लोकतंत्र को काम करने की अनुमति देता है।
पश्चिम के उदार समाजों के लिए खतरा भीतर से भी है और बाहर से भी। उदारवाद भले ही कमजोर हो, पर भूलना नहीं चाहिए कि मानवीय गरिमा और शालीनता से महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है।