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सवाल बनकर उछले जूते का जवाब कब

Mon, 11 Apr 2016 07:40 PM IST
कुमार प्रशांत
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कुमार प्रशांत
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फिर एक जूता सवाल बनकर हवा में उछला! निशाने पर थे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। जूता लगा या नहीं-यह बड़ा सवाल नहीं है। जूता चला, यह बड़ा सवाल है। हवा में उछाला गया हर जूता एक सवाल है, जिसका जवाब न तो मार-कुटाई है, न पुलिस-मुकदमा है और न विपक्ष के षड्यंत्र का फतवा! जरूरत इस बात की है कि हवा में उछाले गए जूते का भी जवाब समाज को बताया जाए! ऐसा एक जवाब भी आ जाए, तो पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश से लेकर अरविंद केजरीवाल तक की तरफ उछाला गया जूता धरती पर आ लगेगा।
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जूता उछालने वालों को मेरा पहला जवाब यह है कि अरविंद केजरीवाल से हमारे चाहे जितने मतभेद हों, वह आज देश के सबसे अच्छे मुख्यमंत्री हैं, जो देश की सबसे अच्छी सरकार चला रहे हैं। उनकी तरफ जूता उछालना जूते बराबर भी अक्ल न रखने जैसा है। देश में कैसे-कैसे मुख्यमंत्री हैं और वे कैसी सरकारें चला रहे हैं, इसे यदि वे देख सकेंगे, तो केजरीवाल के बारे में मेरे कथन का मतलब समझना आसान हो जाएगा। और फिर यह भी ध्यान में रखने की बात है कि केजरीवाल जिस राज्य के मुख्यमंत्री हैं और वह जो सरकार चला रहे हैं, वह देश की सबसे लंगड़ी सरकार है। इस कसौटी पर जब मैं इस सरकार को कसता हूं, तो इसे देश की सबसे अव्वल सरकार कहने से हिचकता नहीं हूं। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि जो जूता उनकी तरफ उछला, उसका जवाब देने की जरूरत नहीं है। वह जूता भले गिर गया, पर उसने जो पूछा, वह सवाल हवा में टंगा है। उसका जवाब ‘आप’ पर ठीक वैसे ही उधार है, जैसे चिदंबरम साहब पर उछले जूते का या शरद पवार पर चले तमाचे का जवाब उधार है। कई लोग उधार चुकाते नहीं हैं, पर उससे उधार सध नहीं जाता, नए जूते के रूप में उभर आता है।

सम-विषम का दिल्ली सरकार का प्रयोग कितना सफल-विफल रहा, इससे बड़ी बात यह है कि प्रदूषण, ट्रैफिक जाम, तेल खर्चने की अंधाधुंध आपाधापी और इन सबका हम पर और हमारे बच्चों पर जैसा जहरीला असर हो रहा है, उस दिशा में यह ऐसी पहल है, जैसी पहल देश की दूसरी किसी सरकार ने की ही नहीं। लेकिन होना तो यह चाहिए था कि इस पहले प्रयोग का पूरा अनुभव, उसका परिणाम, उस बारे में विशेषज्ञों की राय आदि सबका पूरा अहवाल दिल्ली व देश के सामने रखा जाता। लेकिन पता नहीं क्यों, इसे एक पोशीदा प्रयोग में बदल दिया गया। यहां से इस पूरे परिदृश्य में जूते का प्रवेश होता है। यह सच्चाई किसी से छिपी नहीं है कि यह सारा तंत्र भ्रष्टाचार के ईंधन पर चलता-रेंगता है। दिल्ली सरकार भी इसकी अपवाद नहीं है। केजरीवाल के विधायक दूसरे विधायकों से अलग साबित नहीं हुए हैं।
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शिकायत पहले प्रयोग के वक्त ही आई थी कि सीएनजी स्टिकरों की कालाबाजारी हो रही है। कई अखबारों-चैनलों ने बाजाप्ता प्रमाण दिए थे। नंबर प्लेटें आसानी से बिक रही थीं और बदली जा रही थीं। ऐसे व्यापक प्रयोग में, जिसका अनुभव सरकार को भी नहीं था, यह सब होना अनहोनी तो नहीं था। लेकिन पहला दौर समाप्त होते ही जैसे सारे मामले पर्दे के पीछे चले गए और कहीं से कोई सफाई नहीं आई, तो शंका बनी। सरकार को अपने सारे पत्ते खोल देने थे कि वह पिछले अनुभव से क्या सीखी है और नया क्या-क्या करने जा रही है कि पिछली कमजोरियां दूर हों। उसने ऐसा कुछ नहीं किया। जूता हवा में है, उसे जवाब का इंतजार है।
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