विजय यात्रा की तैयारी के उत्सव का अचानक शोक यात्रा के हृदयद्रावक दृश्य में बदलना जीवन का एक ऐसा कठोर सत्य है, जो गोपीनाथ मुंडे के निधन से पुनः प्रकट हुआ है। वह दिल्ली से मुंबई जा रहे थे, जहां अपने निर्वाचन क्षेत्र में विजय यात्रा में उन्हें शामिल होना था। लेकिन 16वीं लोकसभा का पहला सत्र शुरू होने से ठीक एक दिन पहले ही दुखद दुर्घटना में नियति ने उन्हें छीन लिया।
महाराष्ट्र में जमीन से जुड़े, अपार जनसमर्थन के धनी, गरीब किसान, दलित पिछड़ों की राष्ट्रीय फलक पर आवाज बने गोपीनाथ मुंडे का जीवन संघर्ष और साहस का मिश्रण रहा। किसी से दबे नहीं, नुकसान सहकर भी समझौते न करने की जिद्द दिखाई। उनका व्यक्तित्व ही था कि राजनीति में 'न्यायाधीश' बन सजा और बख्शीशें देने वालों की उन्होंने बित्ते भर भी परवाह नहीं की। उन्होंने बताया कि अगर जमीन पर कदम है, जनता में स्नेह और समर्थन है, अपनी ताकत पर विश्वास है, तो भविष्य भी मुट्ठी में ही रहेगा।
वह बंजारा समुदाय से थे, पिछड़े वर्ग के, लेकिन जनजातीय समाज, अनुसूचित जातियों और किसानों में समान रूप से लोकप्रिय थे। संसद में 100-100 से अधिक किसान प्रतिनिधिमंडलों को बुलाते, उनसे मिलते, और उन्हें संसद भवन दिखाते। इतनी ही सहजता से वह जापान, चीन के प्रतिनिधिमंडलों से भी संसद के भाजपा कार्यालय में बात करते थे। पेड़ के नीचे जिस गोपीनाथ ने कभी शिक्षा पाई, वह भारत के केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री पद तक पहुंचे, तो इसके पीछे उनकी अपनी मेहनत और लगन का हाथ था। वह नई सोच के धनी थे। इसलिए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री का पदभार संभालने के बाद ही वह मनरेगा जैसी योजना में भी बदलाव की बात कह रहे थे, ताकि गरीबों को साल में सौ दिन का रोजगार हकीकत बन सके।
उनकी जोड़ी- प्रमोद महाजन के साथ अप्रतिम और बेहद प्रभावशाली थी। बाला साहब ठाकरे के साथ महाजन-मुंडे बेहद करीबी और अंतरंग संबंध रखते थे। विधि की कैसी विडंबना है कि उनके अन्यतम साथी, मित्र और साले प्रमोद महाजन भी अकाल मृत्यु का शिकार हुए। महाजन के परिवार को संभालना, सुख-दुख की चिंता, राहुल और पूनम का हाथ थामना- यह सब गोपीनाथ मुंडे ने अपनी पारिवारिक जिम्मेदारी समझकर किया था। अपनी आत्मीयता से हजारों कार्यकर्ताओं को साथ में लिए चलना और ऐसा साथ निभाना कि हर आरोह-अवरोह में वह साथ खड़ा दिखें। ऐसे गुण थे कि तमाम आघातों के बावजूद कोई उन्हें महाराष्ट्र की धुरी से खारिज नहीं कर पाया।
महाराष्ट्र, जहां मराठा राजनीति का वर्चस्व यशवंत राव चव्हाण सरीखे नेताओं के समय से ही स्थापित था और जिनके रक्षा मंत्री बनने पर सह्याद्रि के पास हिमालय आया जैसे मुहावरे गढ़े गए, गोपीनाथ मुंडे के जमीनी राजकाज और हिम्मत, कई बार अतिक्रमण करते हुए साहसी राजनीति के कारण भाजपा के पक्ष में आया और मुंडे उस महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री बने, जहां भाजपा को हाशिये की पार्टी बताया जाता था। आसन्न विधानसभा चुनावों में उनकी प्रमुख भूमिका रहने वाली थी। वह मुख्यमंत्री हो सकते थे।
दिल्ली की राजनीति और आम माहौल में पैसे के अहंकार, पद से जन्मी तुनकमिजाजी और असभ्यता हवा में घुली रहती है। यहां अंधी रफ्तार सड़क पर बिखरी रहती है और गाड़ियां नियम, लाल बत्ती या राह पर चलने के दूसरे के अधिकार को अस्वीकार करती हैं। गोपीनाथ मुंडे भारत के स्वपनिल ग्रामीण विकास मंत्री और गरीब पिछड़े वर्ग की धमकदार राष्ट्रीय आवाज इसी असभ्य दिल्लीपन का शिकार हो गए। विजयोत्सव में सम्मिलित होने जा रहे एक धरती पुत्र को भारत ने गंवा दिया।
(लेखक भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं)