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ऐसे भी कोई जाता है भला

Sun, 03 Jul 2016 10:31 AM IST
मरिआना बाबर
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मरिआना बाबर
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कव्वाली की खूबसूरती, प्यार, जुनून, ताकत और इबादत अमजद साबरी के शब्दों में बेहतर तरीके से पेश हुई है, जिन्होंने हाल ही में भारत प्रवास के अनुभवों को बयां किया था। कराची में बर्बर तरीके से मारे जाने से एक महीने पहले ही अमजद साबरी को दिल्ली से कराची की फ्लाइट पकड़ने के लिए सड़क से सफर करना पड़ा था। दिल्ली तक के इस सफर के बारे में साबरी ने बताया था, ' कई लोगों ने मुझे नसीहत दी थी कि झांसी के क्षेत्र में सड़क के रास्ते से गुजरना सुरक्षित नहीं है, क्योंकि यह डकैतों का इलाका है।' अपनी आंखों की खास चमक और दिलकश मुस्कान के साथ साबरी ने फरमाया, 'मैंने लोगों से कहा कि हमारे पास और कोई चारा नहीं है, क्योंकि कुछ ही घंटों में हमें पाकिस्तान के लिए फ्लाइट पकड़ने के लिए दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचना है। डकैत मुझे परेशान नहीं करेंगे, हमें भी उनसे मिलना है।' आखिरकार अहमद साबरी सुबह बहुत जल्दी झांसी पहुंच गए और एक ढाबे पर रुककर नाश्ता करने का फैसला किया। उन्होंने बताया, 'हम सभी झांसी के ढाबे पर बजाए जाने वाले संगीत को सुनकर हतप्रभ रह गए, क्योंकि वह रिकार्डिंग मेरे वालिद गुलाम फरीद साबरी की थी। वह 'भर दे मेरी झोली' नाम की खास कव्वाली थी, जिसके बोल हैं- शाह-ए मदीना सुनो, इल्तजा खुदा के लिए/करम हो मुझपे हबीबी ए खुदा खुदा के लिए/हुजूर गुंचा ए उम्मीद अब तो खिल जाए...भर दो झोली भर दो झोली मेरी या मुहम्मद/ लौटकर मैं ना जाऊंगा खाली...।
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अमजद साबरी ने बताया कि अपने वालिद की रिकार्डिंग को सुबह-सुबह सुनना उनके लिए एक दिलचस्प अनुभव था। उन्होंने बताया, 'तभी हमारे दल के ही किसी ने जाकर ढाबे के मालिक को बताया कि मैं कौन हूं। अचानक वहां नाश्ता करने वाले सभी लोग हमारे पास आ गए। मैं छह फीट से ज्यादा लंबा हूं, लेकिन वहां बड़ी मूछों वाले और पगड़ी पहने कुछ और लोग भी थे, जो संभवतः डकैत थे। लेकिन मेरे वालिद की कव्वाली ने उनके दिल को पिघला दिया। उन्होंने मुझे बताया कि वे खास तौर पर यह कव्वाली सुनने के लिए ही इस ढाबे पर नाश्ता करने आते हैं।' उन्होंने बताया कि वे सभी गैर-मुस्लिम थे, लेकिन ‘भर दे झोली’ के मुख्य भाव परमात्मा के प्रति प्यार ने उन्हें इस भक्ति संगीत से जोड़ दिया। फिर उन्होंने मुझे एक कव्वाली गाने के लिए कहा और मैं उन अनजान लोगों के ऐसे प्यार को भला कैसे ठुकरा सकता था। साबरी ने कहा, 'कल्पना कीजिए कि मुझे बताया गया था कि झांसी के डकैत बड़े खतरनाक होते हैं और वहां हम एक ही बेंच पर बैठे थे और इबादत के प्रति प्रेम से जुड़े थे। प्रेम के बिना जीवन क्या है, प्रेम के कई रूप होते हैं।'

सिर्फ पाकिस्तान में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के लोग उनकी मौत से सदमे में हैं, लेकिन एक सवाल फिजां में अब भी है-किसने और क्यों अमजद साबरी का कत्ल किया? उनका संदेश तो मानवता और प्रेम के लिए था। उन्होंने किसी का भला क्या नुकसान किया होगा?
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हाल ही में भारत की ब्लॉक बस्टर फिल्म बजरंगी भाईजान में अदनान सामी ने ‘भर दे झोली’ गीत गाया है। जिन लोगों को अमजद साबरी से मिलने का मौका मिला, वे बताते हैं कि वह वास्तव में एक अनूठे इंसान थे। वह सिर्फ कव्वाली के कड़े अनुशासन में नहीं रहे, बल्कि अपने आसपास के मुद्दों में भी दिलचस्पी ली।

पाकिस्तानी चैनलों ने क्रिकेट खेलने के उनके हुनर को भी दिखाया। अपने लंबे बालों को पीछे बांधकर उन्हें अनौपचारिक तौर पर क्रिकेट खेलते और मैदान पर काफी कैच लेते देखा जा सकता था। आम तौर पर क्रिकेटर काफी तंदुरुस्त होते हैं, लेकिन भारी-भरकम बदन वाले अमजद साबरी को पीच पर आसानी से दौड़ते हुए देखना दिलचस्प था। एक बार उन्होंने कहा था कि अगर मैं कव्वाल नहीं होता, तो क्रिकेटर बनता। दर्शन अमजद साबरी का प्रिय विषय था। वह टीवी के पसंदीदा चेहरे थे और कोई झूठा दंभ नहीं पालते थे। वह दार्शनिक विषयों पर बात करते थे। एक बार उन्होंने ख्वाब के बारे में बताना शुरू किया और कहा कि मनुष्य अपने जीवन के विभिन्न चरणों में कई तरह के ख्वाब देखता है। वह कहते थे, 'मेरे पास कई तरह के ख्वाब हैं। कुछ ख्वाब ऐसे हैं, जिन्हें मैंने सोते हुए देखा, तो कुछ जागती आंखों के हैं। मैंने कई बार ख्वाब देखे हैं और उसे फलित होते हुए भी देखा, क्योंकि अल्लाह ने मेरे ख्वाबों को पूरा किया। पाकिस्तान, भारत और अन्य देशों के लोग भी अपने ख्वाबों को पूरा कर सकते हैं। लेकिन ऐसा करने के लिए उन्हें मानवता की सेवा करनी होगी, क्योंकि अल्लाह को आपसे कुछ नहीं चाहिए।'

रातोंरात कराची के हर घर, टैक्सी, रिक्शा, ढाबे में अमजद साबरी के विभिन्न कव्वालियों के स्वर गूंजने लगे। अमजद साबरी और उनके वालिद की पसंदीदा कव्वाली है-ताजदार-ए हरम, जिसे वे अक्सर गाते थे। किस्मत में मेरी चैन से जीना लिख दे/डूबे न कभी मेरा सफीना लिख दे/जन्नत भी गंवारा है, मगर मेरे लिए/ए कातिब-ए तकदीर मदीना लिख दे/ ताजदार-ए हरम हो निगाह-ए करम/हम गरीबों के दिन भी संवर जाएंगे/हमीं ए बेकसान क्या कहेगा जहान/आपके दर खाली अगर जाएंगे।

लोग जब अमजद साबरी को यह कव्वाली गाते सुनते, तो उनकी आंखें खुशी से भर उठतीं। आज जब वे उनकी आवाज सुनते हैं, तो उनकी आंखें भर उठती हैं, लेकिन ये आंसू दुख के हैं। अमजद साबरी के भारतीय मुरीदों के लिए एक अच्छी खबर है कि वे इस कव्वाल की आखिरी कव्वाली जल्द देख और सुन सकेंगे, क्योंकि यह शीघ्र ही प्रसारित होने वाली है। कोक स्टूडियो 9 उस एपिसोड को 14 अगस्त को प्रसारित करने वाला है, जिसमें अमजद साबरी और राहत फतेह अली खां एक साथ मंच पर होंगे।
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