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इतिहास के मोड़ पर कहां चूक गए नेहरू

Sat, 02 Jul 2016 03:55 PM IST
सुधांशु रंजन
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सुधांशु रंजन
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परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में प्रवेश पाने के लिए जब भारत की ओर से पुरजोर कवायद की जा रही थी, तब पूर्व विदेश सचिव महाराज कृष्ण रसगोत्रा ने धमाका किया कि 1960 के दशक के प्रारंभ में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने भारतीय प्रधानमंत्री नेहरू को परमाणु प्रौद्योगिकी देने की पेशकश की थी, ताकि भारत परमाणु विस्फोट कर सके। अगर ऐसा होता, तो भारत चीन से पहले परमाणु शक्ति बन जाता। यही नहीं, तब 1962 में चीन एवं 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध टल जाते, भारत को एशिया की पहली परमाणु शक्ति बनने का गौरव प्राप्त होता और आज एनएसजी में प्रवेश के लिए उसे नाकों चने नहीं चबाना पड़ता।
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रसगोत्रा के दावे की विश्वसनीयता संदिग्ध होने के बावजूद इसे पूरी तरह खारिज शायद ही किया जा सके, क्योंकि नेहरू हमेशा अपनी शांतिवादी छवि पेश करते रहे। रसगोत्रा का दावा इंदिरा गांधी के पूर्व वैज्ञानिक सलाहकार अशोक पार्थसारथी के दावे पर आधारित है कि उन्होंने कैनेडी का नेहरू के नाम एक हस्तलिखित पत्र अपने पिता जी पार्थसारथी के पास देखा था। जी पार्थसारथी के पिता एन गोपालास्वामी आयंगार संविधान सभा तथा नेहरू मंत्रिमंडल के सदस्य थे।

यह भी कहा जाता है कि नेहरू ने सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट लेने से भी इन्कार कर दिया। इसकी अफवाह इतनी तेज थी जे एन पारेख ने संसद में यह सवाल पूछा, तो नेहरू ने इसका खंडन किया। उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद की संरचना संयुक्त राष्ट्र चार्टर द्वारा निर्धारित है, जिसके मुताबिक, कुछ खास देशों की स्थायी सीटें हैं। इसमें कोई परिवर्तन या जोड़ चार्टर में संशोधन किए बिना संभव नहीं है। इस खंडन के बावजूद विदेश मंत्रालय के कई पुराने अधिकारियों ने इस लेखक को बताया है कि मंत्रालय में कुछ ऐसे सरकारी नोट हैं, जिनसे ऐसे प्रस्ताव का पता चलता है।
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प्रश्न उठता है कि आखिर नेहरू ने ऐसा क्यों किया। इसका एक ही तार्किक जवाब है कि विश्व क्षितिज पर वह शांति के मसीहा के रूप में दिखना चाहते थे। उनका यह विचार कई जगहों पर रिकॉर्ड में है कि दुनिया में भारत की साख चीन के सहयोग पर निर्भर करती है। स्वप्नदर्शी नेहरू अपनी रोमानी दुनिया में रहते थे, यह इससे भी स्पष्ट है कि जब चीन ने हमला किया, तब भारत इसके लिए तैयार नहीं था। यह उनका आदर्शवाद था या विश्व नेता बनने की उग्र महत्वाकांक्षा कि चीन से मिली शर्मनाक हार के बावजूद वह संयुक्त राष्ट्र पर आधारित विश्व सरकार की बात करते थे। ऐसा एक भाषण उन्होंने सितंबर, 1963 में भी दिया था।

जो भी हो, उनकी नीति एवं कार्यों में थोड़ा अंतर्विरोध है। यह समझ से परे है कि शांति के एक पुजारी ने कश्मीर में पाकिस्तान से लड़ने के लिए अक्तूबर, 1947 में सेना भेजी। पाकिस्तान को रोकने के लिए सेना भेजने के अलावा शायद कोई विकल्प नहीं था, परंतु भारत मसले को संयुक्त राष्ट्र ले जाने के पहले तीन माह तक युद्ध करता रहा। वर्ष 1961 में उन्होंने गोवा को पुर्तगाल से मुक्त कराने के लिए वहां सेना भेजी, जिसकी पूरे विश्व में निंदा हुई। इसके अलावा, यदि वह सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट लेने के बारे में इस कारण तटस्थ रहे कि वह सत्ता का खेल खेलता है, तो उन्होंने अपने कार्यकाल में भारत को तीन बार सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य क्यों बनने दिया? शायद एक आदर्शवादी प्रधानमंत्री की गलतियों की देश कीमत चुका रहा है, जिनकी संभवतः अपनी महत्वाकांक्षाएं थीं।
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