महाभारत में एक अनुच्छेद है, जिसमें यह कहा गया है कि जिंदगी का सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि जब हम इस बात को जानते हैं कि मृत्यु अवश्यंभावी है, इस बात में कोई विश्वास नहीं करता कि वह भी एक दिन मर जाएगा। हम इन्सान मृत्यु और मरने को लेकर मोहासक्त रहे हैं।
एक बार मैंने दलाई लामा से पूछा कि मृत्यु का सामना कैसे करना चाहिए और उन्होंने ध्यान करने की सलाह दी। एक बार मैं बंबई (मुंबई) में आचार्य रजनीश से मिला। मैंने उनसे अपने भय के बारे में बात की और उनसे यह पूछा कि इससे कैसे पार पाया जाए। उन्होंने मुझे बताया कि मौत के भय से पार जाने का एकमात्र जरिया यह है कि हम मरते हुए को देखें, मृत को देखें। मैं यह बहुत दिनों से करता रहा हूं। मैं शायद ही किसी की शादी में जाता हूं, लेकिन अंतिम संस्कार में जरूर जाता हूं। मैं मृत व्यक्ति के रिश्तेदारों के साथ बैठता हूं और अक्सर निगमबोध घाट के श्मशान घाट भी जाता हूं और वहां चिता में आग लगाते हुए और शरीर को लपटों में जलते हुए देखता हूं। इसने एक तरह से भाव विरेचन का काम कियाः इसने मेरी क्षुद्रताओं को साफ कर दिया और गुमान को तोड़ दिया, और इसमें मेरी मदद की कि जीवन के झटकों को सहज भाव से ले सकूं। मैं अपने जीवन का जायजा लेता हूं, और उसके लिए शुक्रगुजार होता हूं, जो कुछ भी मुझे मिला। मैं अपनी शांति में घर लौटता हूं।
मुझे लगता है कि मैं मौत से इसलिए डरता था, क्योंकि मुझे यह नहीं लगता था कि मौत के बाद मैं कहां होऊंगा। ईश्वर की उपस्थिति को स्वीकार कर पाने की मेरी असमर्थता मृत्यु के बाद के जीवन की संभावना को अस्वीकार करती थी और पुनर्जन्म के सिद्धांत को भी। भगवद्गीता हमें आश्वस्त करता हैः जीवितों के लिए मृत्यु पक्का है, इसलिए जो अवश्यंभावी है, उसके लिए दुखी नहीं होना चाहिए। मैं इसके पहले हिस्से को स्वीकार करता हूं, क्योंकि मैं जानता हूं कि यह सच है, लेकिन दूसरे हिस्से का मेरे पास कोई प्रमाण नहीं है। इसलिए मुझे यह डर लगता है कि यह शून्यता में मिल जाना है। टॉम स्टॉपर्ड ने इसको इस तरह लिखा है, जो मुझे भी लगता थाः 'मृत्यु उपस्थिति की अनुपस्थिति है, इससे अधिक कुछ नहीं...अनंत बार नहीं आने का ...एक ऐसी दरार जिसे आप नहीं देख सकते हैं, और जब इसके बीच से होकर हवा गुजरती है, तो इससे कोई आवाज नहीं आती है।' और पॉल वेलेरी, जब यह कहते हैं-मृत्यु हमसे गहरी आवाज में कहता है कि उसके पास कहने के लिए कुछ भी नहीं है।
जहां तक मेरा संबंध है, तो मृत्यु आखिरी पूर्ण विराम है। इससे आगे कुछ भी नहीं। यह एक ऐसा शून्य है, जिसको कोई भी भेद नहीं पाया है। इसका कोई कल नहीं है। एक आयरिश कहावत है, 'उस आदमी के लिए दुनिया क्या है, जब उसकी पत्नी विधवा हो जाए!'
मृत्यु की प्रक्रिया तो तभी शुरू हो जाती है, जब हम पैदा होते हैं। मृत्यु जीवन में एकमात्र ऐसी चीज है, जिसको लेकर हम निश्चित हो सकते हैं। यह अवश्यंभावी है। फिर हम इससे इतना डरते क्यों हैं? क्या इस बात से कुछ फर्क पड़ेगा कि हम कब मरने वाले हैं? मुझे ऐसा नहीं लगता। मुझे नहीं लगता कि हम उससे निपट पाने में समर्थ हो पाएंगे। इससे हम और भी अधिक निराश हो जाएंगे। हम उस थोड़े से समय को बर्बाद कर देंगे, जो हम अंत के बारे में सोचकर बिताते हैं।
मैंने इस बात को काफी पहले ही समझ लिया था कि मेरे पास जीने के लिए एकमात्र जीवन है, यह नहीं जानता था कि इसका अंत कब होने वाला है, इसलिए मैंने यह फैसला किया कि इस जीवन से मैं जितना ले सकता था, उतना ले लूं। मैंने अपना जीवन भरपूर जीया है। मैंने दुनिया घूमी है, अपनी इंद्रियों का आनंद उठाया है, प्रकृति की सुंदरता का आनंद उठाया है और उस सबका जो उसके पास देने के लिए था। मैंने सर्वश्रेष्ठ भोजन का स्वाद लिया है, बेहतरीन संगीत सुना है और बेहतरीन औरतों के साथ संभोग किया है। जो समय मुझे मिला, मैंने उसका बेहतर उपयोग किया है।
...और चूंकि ईश्वर में मेरा कोई विश्वास नहीं है, न ही न्याय के सिद्धांत में, न ही पुनर्जन्म में, इसलिए मुझे पूर्णविराम वाली बात को मानना पड़ा। मेरी इस बात के लिए आलोचना की जाती रही है कि मैं उन लोगों की आलोचना भी कर देता हूं, जो मर चुके हैं, लेकिन मृत्यु किसी व्यक्ति को पवित्र नहीं कर देती है, और अगर मुझे यह पता चला कि वह आदमी भ्रष्ट है, तो मैं उसके बारे में उसके जाने के बाद भी बात करता रहूंगा।
जब मेरा वक्त आए, तो मैं नहीं चाहता कि मैं अपनी हंसी उड़वाऊं। मैं किसी के ऊपर बोझ बनना नहीं चाहता। मैं मदद के लिए रोना नहीं चाहता था या ईश्वर से यह नहीं कहना चाहता कि वे मुझे मेरे पापों के लिए माफ कर दें। मैं उसी तरह से जाना चाहता हूं, जिस तरह से मेरे पिता गए थे। उनकी मृत्यु शाम के स्कॉच पीने के कुछ मिनट बाद ही हो गई थी। मैं जाने से पहले आखिरी बार पीना चाहूंगा।
सबसे बढ़कर मैं एक ऐसे आदमी के रूप में मरना चाहता हूं, जिसको किसी तरह अफसोस न हो और जिसमें किसी के प्रति कोई दुर्भावना न हो। अल्लामा इकबाल ने एक शेर में इसको बहुत खूब कहा हैः
निशाने-मर्द-ए-मोमिन बा तू गोयम?
चूं मर्ग आयद, तबस्सुम बर लबे-ओस्त