कम्युनिस्ट पार्टी की सर्वोच्च बैठक के दौरान दो बार राष्ट्रपति रह चुके हू जिंताओ को जिस तरह अपमानित करके बाहर निकाला गया, वह इस बात का संकेत है कि जिनपिंग अपने विरोधियों के साथ अब कैसा बर्ताव करने जा रहे हैं। हू जिंताओ के साथ इस अभद्र व्यवहार से पहले ही अंतरराष्ट्रीय मीडिया के कैमरों को कवरेज के लिए अंदर बुला लिया गया था। यानी जिनपिंग सारे विश्व को दिखाना चाहते थे कि वह इतने ताकतवर हो चुके हैं कि पूर्व राष्ट्रपति को भी नहीं बख्शते।
वैसे उनकी अगुआई में असहमत नेताओं को सबक सिखाने का काम कुछ वर्षों से लगातार चल रहा है। पिछले वर्ष कम्युनिस्ट पार्टी के शिखर संवाद में एक संकल्प पत्र जारी किया गया था, जिसके तहत जिनपिंग के खिलाफ किसी भी किस्म का बयान देने को अपराध की श्रेणी में डाल दिया गया है। पहले चीन में दो बार राष्ट्रपति रहने के बाद कोई राजनेता पद पर नहीं रह सकता था। पर चार साल पहले यह कानून खत्म कर दिया गया था। जिनपिंग चाहें, तो पूरी उम्र राष्ट्रपति बने रह सकते हैं।
क्या जिनपिंग चीन के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता भी हैं? शायद नहीं, क्योंकि उनके दोनों कार्यकालों में मानवाधिकारों का जिस तरह मखौल उड़ाया गया, नागरिकों की सोच पर पहरा लगाया गया, अभिव्यक्ति, व्यापार और धार्मिक स्वतंत्रता छीनी गई, वे सबूत हैं कि जिनपिंग फौजी ताकत के बल पर गद्दी पर हैं। जिनपिंग की लोकप्रियता में गिरावट आई है और आम चीनी उन्हें पसंद नहीं करता। पर चीन के भीतर तो छोड़िए, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जिनपिंग के रवैये का विरोध करने की स्थिति किसी में नहीं है, क्योंकि देशों के संबंधों में निजी कारोबारी हित प्रधान हो गए हैं।
आने वाले वर्षों में भारत के लिए चीन एक बड़ा खतरा बनकर उभर रहा है। गलवान में यकीनन चीन को अधिक नुकसान हुआ था, जिससे यह संदेश गया था कि चीन की बड़ी फौजी ताकत मोर्चे पर कमजोर साबित हुई है। छवि के इस संकट से उबरने के लिए जिनपिंग ने कम्युनिस्ट कांग्रेस में गलवान घाटी का वीडियो दिखाया तथा उस मोर्चे पर तैनात कमांडर को बुलाकर एक तरह से उनका अभिनंदन किया। सर्वोच्च कमांडर होने के नाते वह एलान कर चुके हैं कि चीन के लिए सैन्य मजबूती सर्वोच्च प्राथमिकता है।
इसके बावजूद भारत के लिए चुनौती अधिक गंभीर है, क्योंकि भारत की घेराबंदी करने में चीन कामयाब रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध में रूस का खुला साथ देकर चीन ने लाभ की स्थिति भी बना ली है। इस युद्ध में एक स्थिति बनी थी, जब रूस चाहता था कि भारत मध्यस्थ की भूमिका निभाए। वह जानता था कि यूक्रेन और उसे समर्थन दे रहे यूरोपीय व पश्चिमी मुल्क चीन की मध्यस्थता स्वीकार नहीं करेंगे, इसलिए उसने भारत की ओर देखा था। पर भारत उस अवसर का लाभ नहीं उठा पाया। ऐसे में, रूस भविष्य में भारतीय हितों की रक्षा कैसे करेगा?
भारतीय कूटनीतिज्ञों के लिए यह एक ऐसा प्रश्न है, जिसका उत्तर आसान नहीं। एक बात और है। चीन बेशक ताकत के दम पर अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों का मुकाबला करने में सक्षम नहीं। पर उसे अमेरिका तथा अन्य यूरोपीय राष्ट्रों के साथ भारत के अच्छे संबंधों की जानकारी है। वह भारत को मुसीबत में डालकर उन देशों पर दबाव बना सकता है। जिनपिंग का यह सपना हो सकता है कि वह भारत को एक बार और करारी शिकस्त देकर चीन में महानायक की छवि गढ़ सकें। पर उनका यह सपना शायद कभी पूरा नहीं होगा। जब तक जिनपिंग घरेलू मोर्चे पर विजय हासिल नहीं करते, उनकी महत्वाकांक्षाएं पूरी नहीं होने वालीं।