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दलित विमर्श: मोहल्ले का झगड़ा नहीं, लोकतंत्र की बुनियादी आवाज

श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Mon, 16 Feb 2026 07:10 AM IST

सार

दलित-विमर्श समकालीन विमर्शों का मूल है। सभी विमर्शों को मिला लें, तो यह अस्सी फीसदी से अधिक आबादी की रचनात्मक अभिव्यक्ति है।
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दलित विमर्श - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


विविधता पूर्ण अभिव्यक्तियां विमर्शों की आत्मा हैं। दलित-विमर्श समकालीन विमर्शों का मूल है। सभी विमर्शों को मिला कर देखें, तो यह देश की अस्सी फीसदी से अधिक आबादी की रचनात्मक अभिव्यक्ति है। हालांकि संत साहित्य में जन्म-जाति को लेकर समता, स्वतंत्रता मूलक मूल्यों की पृष्ठभूमि है, जिसमें ईश्वर की दृष्टि से समानता की बात होती है। यह विमर्श अमेरिका और अफ्रीका के ‘ब्लैक पैंथर' से मराठी के 'दलित पैंथर' में आया और हिंदी पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। इसका उद्देश्य मनुष्य से मनुष्य की मुक्ति के लिए अन्याय और अपमान का अंत कर आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित समता मूलक सभ्य समाज बनाना है।


आज से ठीक तीस साल पहले 25 फरवरी, 1996 को संपादक मूलचंद गौतम की पत्रिका की ओर से ओम प्रकाश वाल्मीकि को ‘परिवेश सम्मान' दिया गया था। तब मुख्य अतिथि काशीनाथ सिंह ने कहा था-'यदि दलितों द्वारा लिखा हुआ ही दलित साहित्य माना जाएगा, तो घोड़े पर लिखने के लिए घोड़ा होना पड़ेगा।' यह सुनकर वाल्मीकि विचलित थे। इसे परंपरा से चले आ रहे हिंदी लेखकों के संस्कारों में समाई वर्चस्व की भावना या सामंती स्वभाव की ठसक भी कह सकते हैं।


डॉ. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक 'अनटचेबल्स' में अशरीरी अस्पृश्यता को रेखांकित किया। यह दासप्रथा से भी अधिक अमानवीय और अन्यायपूर्ण है। संविधान ने अस्पृश्यता निवारक कानून अमल में लाकर ऐसी कुप्रथाओं का अंत कर दिया। लोकतांत्रिक स्वभाव के अनुसार, नैतिक उपक्रम करने की वंचितों की दस्तक एक जैसी रही है।


विमर्श का विस्तार साहित्य और सिनेमा में एक जैसा दिखाई पड़ता है। गांधीवादी प्रभाव में बनी 'अछूत कन्या' जैसी फिल्में संविधान और आंबेडकर के प्रभाव तक आते-आते आयुष्मान खुराना की ‘आर्टिकल 15’, अमिताभ बच्चन और मनोज वाजपेई की ‘आरक्षण’ तक आया दिखता है। कालांतर में मराठी दलित निर्देशकों ने सिनेमा में अपनी उपस्थिति दर्ज की। नागराज मंजुले की ‘सैराट’ (2016) और ‘फंद्री’ फिल्म के बाद ‘नीरज घेवान’ के निर्देशन में आई ‘होम बाउंड’ ऑस्कर तक पहुंची है। लेकिन नीरज कहते हैं, 'आज भी किरदारों के नाम उच्च जाति सूचक ही होते हैं।' दलित-आदिवासियों को लेकर मुस्लिम निर्देशकों के नजरिये में भी कोई अंतर नहीं है, उन्हें भी दलितों में नायक दिखाई नहीं पढ़ते। वे भी ‘लगान’ में ‘कचरा’ के दम पर ऑस्कर पाना चाहते हैं।


साहित्य और सिनेमा की जो प्रवृत्तियां लोकतंत्र की प्रक्रिया में आड़े आती हैं, उनमें खास है परंपरागत जाति पूर्वाग्रह। यह इस हद तक गहरे पैठा कि, न केवल नीरज, बल्कि दलित प्रतिभाएं पहले भी जाति छिपाने को विवश होती रही हैं। डॉ. आंबेडकर को जातिगत पूर्वाग्रह का दंश झेलना पड़ा था। 1960 में ‘दया पवार’ ने 'अछूत' आत्मकथा में हिकारत के प्रसंगों की भरमार कर दी। ‘सारिका’ मई 1975 में कमलेश्वर ने बाबूराव बागुल का लेख छाप कर हिंदी मानस की गहरी तंद्रा तोड़ दी थी। जब नीरज घेवान कहते हैं कि सिनेमा जगत में मैंने 35 साल तक अपनी जाति छिपा कर काम किया, तो लगता है हम फिर वहीं खड़े हैं। डॉ. आंबेडकर के आधुनिक विचारों ने मनुष्य को मनुष्य की दृष्टि और स्थिति में भी समान होने का प्रश्न बनाया। एक बार अब्राहम लिंकन ने कहा था, 'मेरा अनुभव कह रहा है कि जिन लोगों में कोई दुर्गुण नहीं होता, उनमें सद्गुण भी बहुत कम होते हैं।' लिंकन के अनुभव की रोशनी में देखें, तो इतिहास के कई किरदार स्मरण हो आते हैं।


हिंसक अंगुलिमाल डाकू बुद्ध की शिक्षाएं पाकर हिंसा-डकैती छोड़कर भिक्षु ‘अर्हत’ हो जाता है, ‘रत्नाकर’ लुटेरे से महर्षि-आदिकवि हो जाते हैं। सम्राट अशोक कलिंग युद्ध में हजारों योद्धाओं की लाशों पर से गुजर कर प्रायश्चित करते हैं और अंततः ‘बुद्ध’ की शरण में जाकर उनकी शिक्षाओं के प्रचारक बन जाते हैं। पर क्या हम आज यह सोच सकते हैं कि यूक्रेन-रूस युद्ध पुतिन और जेलेंस्की को बौद्ध बना देगा, और श्रेय लेने को बेताब ट्रंप शांति की कोई वजह भी कायम करेंगे? सिद्धार्थ और देवदत्त के बाल्यकाल की कथा बताती है, देवदत्त ने ‘हंस’ को तीर मारा था और बड़े भाई सिद्धार्थ ने न केवल हंस का तीर निकला था, अपितु उसकी तीमारदारी कर जान बचाई थी। वही ‘बुद्ध’ विश्व में शांति और अहिंसा के प्रतीक बने।
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