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असहनीय है दलितों का दर्द

Fri, 12 Aug 2016 07:04 PM IST
तरुण विजय
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तरुण विजय
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अभिमान पर जरा-सी ठेस लगी थी, तो महाभारत हो गया था-द्रोपदी इसकी साक्षी है। एक बार गोली खाना हजम हो सकता है, लेकिन तिरस्कार नहीं। अनुसूचित जातियां तो सदियों से यह अपमान झेलती आई हैं। जिन्हें अपनी जाति के बड़ा होने का अहंकार है, उन्हें इन दलितों की चरण रज अपने माथे से लगानी चाहिए कि उन्होंने अपमान सहा, पर धर्म नहीं त्यागा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद में दलित दर्द पर जो भावनात्मक टिप्पणी की, उसका बड़ा महत्व है। वह फटकार थी उन कथित सवर्णों को, जो दलितों को मनुष्य से कमतर एवं प्रताड़ना योग्य मानकर चलते हैं। समता एवं समदृष्टि के लिए अनेक आंदोलनों तथा महापुरुषों के कठोर शब्द प्रहारों के बावजूद पंडितों, साधु-संन्यासियों और राजनेताओं ने अपने ही हिंदू धर्म के अविभाज्य अंग दलितों के प्रति समाज में समानता लाने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया। दलितों से विवाह करने पर लोगों को जान से मार डालना, विद्यालयों में दलित छात्रों से भेदभाव, दलितों के लिए पृथक श्मशान घाट और दुकानों में उनके लिए अलग ग्लास और बर्तन की व्यवस्था आज भी अनेक राज्यों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में लागू है। मातृभूमि की रक्षा में सर्वोच्च बलिदान देने वाले दलित की चिता से भी भेदभाव करने में सवर्ण 'देशभक्त' चुके नहीं।
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इस परिदृश्य में अनेक घटनाओं के एकजुट प्रभाव से एक सार्वदेशिक दलित पुनर्जागरण का वातावरण दिखता है। प्रधानमंत्री ने गोरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी और दलितों पर उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश से लेकर गुजरात और कर्नाटक तक हो रहे प्रहारों की घोर निंदा की है। ये लोग अपने अहंकार और मूर्खतापूर्ण आवेश के कारण हिंदू समाज को ही भीतर से कमजोर कर रहे हैं। इतना ही नहीं, इसमें इस्लामी और वामपंथी दखल शुरू होने से मामला और पेचीदा बनता गया है। दलित समस्या हिंदुओं की आंतरिक नासमझी की समस्या है-इसे इस्लामी सहानुभूति की जरूरत नहीं। वे लोग अपनी सामाजिक दुर्बलताओं को दूर करने का साहस पहले दिखाएं।

समाधान तो केवल हिंदू ही कर सकते हैं। उन्हें स्वयं से पूछना होगा कि कुछ जातियों को बड़ा और कुछ को छोटा वे किस अधिकार से कहते हैं। उनके पंडितों और साधु-संन्यासियों का व्यापार और राजनीति में बहुत दखल रहता है-लेकिन हिंदू समाज का हिस्सा दलितों के दर्द में ये कितना शामिल होते हैं? इनके द्वारा सैकड़ों विद्यालय चलाए जा रहे हैं। ऐसा कोई विद्यालय दिखाएं, जहां अनुसूचित जाति के बच्चों को आगे बढ़ाने के लिए विशेष व्यवस्था की गई हो? धर्मग्रंथों की मंत्रमुग्ध व्याख्या करने और तन्मय होकर कीर्तन करने से बात नहीं बनती, न ही धर्म बचता है। गंदे मंदिर, गंदे तीर्थस्थान, संस्कृत तथा संस्कृति से दूर पंडितों द्वारा भक्तों को छलने का काम, हर बड़े मंदिर के पंडितों का मुकदमेबाजी में फंसे रहना, गायों की रक्षा का पाखंड, हर गली-मोहल्लों में प्लास्टिक खाकर मरती भूखी गाएं, हिंदू अफसरों की रिश्वतखोरी के बल पर बांग्लादेश धकेली जाती गाएं-इन सबका जिम्मेदार दलित है या अहंकारी सवर्ण? उत्तराखंड में इन सवर्णों की एकजुटता का भीषण स्वरूप मैंने स्वयं देखा है। इन जैसे लोगों के कारण लाखों की संख्या में दलित हिंदू अन्य मजहबों में चले गए।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साहसिक वक्तव्य ने हिंदू समाज को नकारात्मक आघातों से समय पर बचाया है। गाय और दलितों के नाम पर हो रहे षड्यंत्र देश को तोड़ देंगे।
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लेखक भाजपा नेता हैं
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