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साइबर ठगी: क्या दोष यूपीआई की व्यवस्था का है, बचाव के लिए करने होंगे ये काम

सतीश सिंह
Updated Tue, 03 Dec 2024 07:07 AM IST

सार

मौजूदा परिवेश में साइबर ठगों के लिए मोबाइल नंबर और यूजर का निजी विवरण पाना बेहद ही आसान है, क्योंकि फोन नंबर एवं निजी जानकारी लोग ई-शॉपिंग, रेस्तरां, मॉल, पार्किंग स्थल आदि जगहों पर निरंतर साझा करते रहते हैं, जो साइबर फर्जीवाड़े को आसान बना देता है। साइबर ठगी से बचने के लिए यूपीआई क्रेडेंशियल को सुरक्षित रखना और उन्हें किसी के साथ साझा नहीं करना बहुत जरूरी है।
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generative ai - फोटो : अमर उजाला


इसकी लोकप्रियता का मूल कारण इसके उपयोग के तरीके का सरल और सुरक्षित होना है। यूपीआई का इस्तेमाल करने के लिए यूजर के पास एक स्मार्टफोन, सिम कार्ड, इंटरनेट और बैंक खाते की जरूरत होती है और लेनदेन करने के लिए यूजर को अपने फोन नंबर को बैंक खाते से लिंक करना होता है। तदुपरांत, यूजर गूगल पे, फोन पे, भीम एप आदि से फोन नंबर और क्यूआर कोड की मदद से सेकंडों में पैसे का लेनदेन कर सकते हंै।


सिंगापुर, मलयेशिया, थाईलैंड, फिलीपींस, वियतनाम, हांगकांग, दक्षिण कोरिया, जापान, फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम, नीदरलैंड, बेल्जियम, स्विट्जरलैंड आदि देशों में आज भारत में विकसित यूपीआई के जरिये डिजिटल लेनदेन बड़ी संख्या में हो रहा है और इसकी लोकप्रियता के कारण दुनिया के दूसरे प्रमुख देश भी इस तकनीक को खरीदना चाहते हैं। भारत में डिजिटल भुगतान की दशा एवं दिशा पर काम करने वाली संस्था पीडब्ल्यूसी इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, यूपीआई लेनदेन 2023-24 के 13,100 करोड़ से तीन गुना बढ़कर 2028-29 में 43,900 करोड़ हो जाएगा, जो डिजिटल खुदरा लेनदेन का 91 प्रतिशत होगा। आज इसके माध्यम से अनपढ़, असंगठित क्षेत्र के कामगार, ठेले एवं जमीन पर सब्जी, फल, कपड़े, खिलौने आदि बेचने वाले, टैक्सी व रिक्शा चलाने वाले, मजदूर, किसान आदि बहुलता में लेनदेन कर रहे हैं, लेकिन ठगे जाने पर वे अपने पैसे की वसूली नहीं कर पाते हैं।


विगत ढाई वर्षों में यूपीआई लेनदेन में 27 लाख से अधिक धोखाधड़ी के मामले सामने आए, जिनमें लोगों को 2,145 करोड़ रुपये की चपत लगी। वहीं, चालू वित्त वर्ष के छह महीनों यानी अप्रैल से सितंबर महीने के दौरान यूपीआई से किए गए 6.32 लाख धोखाधड़ी के मामलों में लोगों को 485 करोड़ रुपये गंवाने पड़े, जबकि वित्त वर्ष 2022-23 के दौरान धोखाधड़ी के 7.32 लाख मामलों में लोगों को 573 करोड़ रुपये की चपत लगी थी।


धोखाधड़ी को रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने मार्च, 2020 में सेंट्रल पेमेंट फ्राडइन्फोर्मेशन रजिस्ट्री की सुविधा का आगाज किया। रिजर्व बैंक के नियंत्रण में काम करने वाली सभी इकाइयों को डिजिटल लेनदेन में हुई धोखाधड़ी की जानकारी रिजर्व बैंक के साथ साझा करनी होती है, ताकि केंद्रीय बैंक ठोस रणनीति की मदद से धोखाधड़ी की घटनाओं पर लगाम लगा सके। भले ही यूपीआई यूजर के साथ ठगी की जा रही है, लेकिन यह बेहद ही सुरक्षित भुगतान की तकनीक है। उन्नत एन्क्रिप्शन से युक्त होने के कारण यूपीआई को डिजिटल लेनदेन के लिए सुरक्षित माना जाता है। इसमें बैंक खाते के विवरण और व्यक्तिगत पहचान संख्या, जिसे पिन’ कहते हैं, जैसी संवेदनशील जानकारी सुरक्षित होती है। साथ ही, यूपीआई के प्रत्येक लेनदेन को एक पिन के माध्यम से प्रमाणीकरण की आवश्यकता होती है, जो यूजर के मोबाइल पर आता है। उसके बाद ही लेनदेन निष्पादित होता है।


मौजूदा परिवेश में साइबर ठगों के लिए मोबाइल नंबर और यूजर का निजी विवरण पाना बेहद ही आसान है, क्योंकि फोन नंबर एवं निजी जानकारी लोग ई-शॉपिंग, रेस्तरां, मॉल, पार्किंग स्थल आदि जगहों पर निरंतर साझा करते रहते हैं, जो साइबर फर्जीवाड़े को आसान बना देता है। साइबर ठगी से बचने के लिए यूपीआई क्रेडेंशियल को सुरक्षित रखना और उन्हें किसी के साथ साझा नहीं करना बहुत जरूरी है।


लब्बोलुआब यह है कि डिजिटल ठगी से बचने के लिए सबसे कारगर उपाय डिजिटल लेनदेन के दौरान सावधान रहना, यूपीआई क्रेडेंशियल किसी दूसरे के साथ साझा नहीं करना और हमेशा जागरूक बने रहना है। अमूमन, वंचित तबके के लोग ठगी से बचने के तरीकों से वाकिफ नहीं होते हैं।  इसलिए इस मामले में बैंकों एवं अन्य वित्तीय संस्थानों, मीडिया, पुलिस, अन्य संबंधित सरकारी महकमों आदि को निरंतर लोगों को जागरूक करते रहना चाहिए, तभी यूपीआई लेनदेन में की जा रही धोखाधड़ी की घटनाओं को कम किया जा सकता है।

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