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खिसियानी बिल्ली, खंभा और नेता

Tue, 20 May 2014 07:06 PM IST
निर्मल गुप्त
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खिसियानी बिल्ली खंभा नोचती है। उसे रसोई घर में दबे पांव घुसकर दूध-मलाई चट करने और मौका ताड़ कर चूहे को अपने पंजे में दबोच लेने के सिवा कुछ आता भी नहीं। सुना है, हर बार चूहे मारने का शतक लगाने के बाद उसे खुद को पाक-साफ दिखाने के लिए तीर्थाटन पर जाना पड़ता है। राजनेताओं के साथ दिक्कत यह है कि चुनावी दंगल में धूल का रसास्वादन करने के बाद उन्हें यह तय करने के लिए कि अब वे क्या करें, चिंतन-मनन और विमर्श करना पड़ता है। इसके बाद वे जो कुछ करते हैं, वह हाई मॉरल ग्राउंड पर होता है।
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पराजित राजनेता अक्सर बेहद चिड़चिड़े हो जाते हैं। इसके बावजूद वे कभी खंभा नहीं नोचते। वे अपने राजनीतिक नाखूनों को लेकर अतिसंवेदनशील होते हैं। उन्हें पता है कि जब तक पैनापन है, तब तक तमाम संभावनाओं की अंधी गुफा में आस का दिया टिमटिमाता है। बिल्ली और राजनेता में यही मौलिक फर्क होता है। प्रत्येक राजनेता भलीभांति जानता है कि राजनीति में हालात चाहे जो हों, लेकिन इसमें खिसियाने के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती। यदि खिसियाना अपरिहार्य हो जाए, तो खीसें निपोर दो। मन को अवसाद घेरे, तो शाहीदाना अंदाज वाला मुखौटा धारण कर लो। जरूरत आन पड़े, तो एकाध इस्तीफा देने का ऐलान कर दो। बाद में लोग मान-मनौव्वल करें, तो मान भी जाओ।

पहले बिल्ली और राजनेताओं के भाग्य का छीका दैवयोग से टूट जाता था। लेकिन इस हाई टेक युग में कोई छीका स्वत: नहीं टूटता। इसको तोड़ने की पूरी तकनीक है। जो इसे जानते हैं, वे कामयाब हो जाते हैं, बाकी टापते रह जाते हैं। समय आ गया है कि राजनेताओं को सफलता पाने के लिए बिल्ली जैसी उस चतुराई को सीखने की जरूरत है, जिसके चलते वह अपने मंतव्यों में प्राय: विफल नहीं होती।
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चुनाव परिणाम आने के बाद पराजित खेमों में यही खिसियाहट केंद्र में है। राजनीतिक पंडित कह रहे हैं कि खिसियाकर खंभे नोचना बंद करो। यह नाजुक वक्त है, भीगी बिल्ली की तरह कान दबाकर निकल जाओ।
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