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लुटे-पिटे एकजुट नेता

Sun, 23 Nov 2014 08:07 PM IST
श्याम विमल
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बहुधर्मी भारत में तीसरे-चौथे मोर्चे के राजनीतिक मुहावरा कोश में सेक्यूलर शब्द इस कदर घिस-पिट चुका है कि उसकी धार मोदी के कर्मानुगामी धर्मराज्य में कुंद पड़ गई है। अब इस शब्द का असर धौंस या धमकी लगता है। केंद्र में नई सरकार के आ जाने के बाद उजड़े-हारे, छिटके और फिक्रमंद ये नेतागण एकजुट होकर भावी चुनाव की मंडी में अपना धर्मकांटा टांग बैठने की तैयारी में जुट गए हैं। इन फिक्रमंद नेताओं का जुबानी बही-खाता अभी से खुलने लगा है। ये कमती वोटों के मारे थकेले हैं, पर हमेशा ख्याली पुलाव पकाने में लगे रहते हैं।
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चुनाव के इस मौसम में नेताओं की मेढकीय प्रवृत्ति उनके उछल-कूद में दिखती है। इसमें पल-पल संतुलन बनाए रखना होता है कि कब किसके पाले में जाना है, कितने दिन टिकना है, टिकना है भी या नहीं। न जाने, कहां-कहां से कूदते-फांदते-टर्राते चले आते हैं राजनेतागीरी में तरबतर ये मेढक- बिहार के दियारा के कीचड़-बालू से, उत्तर प्रदेश के ताल से, हरियाणा के जोहड़ से, झारखंड के डबरे से, दिल्ली के स्विमिंग पूल से, तो दूर दक्षिण के उनींदे पड़े समुद्री कछार से। चुनावों के समय ये हमेशा एकजुट दिखाई देते हैं, बाद में पता नहीं, कहां बिला जाते हैं।

इन मेढकों के साथ दिक्कत यह है कि इनमें से सभी खुद को सबसे बड़ा मानते हैं। कुर्सी की बाट जोहना तो दूर, एक ही जंप में ये इंतजार की घड़ी लांघ जाना चाहते हैं-प्यादे से पीएम की कुर्सी पर विराजमान होने के वास्ते। लेकिन ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि केंद्र में तो छप्पन इंच का सीना ताने हमारे मोदी जी विराजमान हैं। ये करें तो क्या करें?
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और इस बात की क्या गारंटी कि इतने ऊर्जावंत मेढक एक पलड़े में पांच साल तो क्या, पांच दिन के लिए भी टिके रह सकें? मेढक कूद की पारिवारिक आदत साफ है कि वे एक साथ टिक भी नहीं सकते। यह तो अच्छा है कि इन मेढकों को बड़ी जिम्मेदारी नहीं मिलती। पता नहीं, तब वे एक साथ टरटराते भी या नहीं!
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