इस सप्ताह नरेंद्र मोदी अपने प्रधानमंत्री काल के छह महीने पूरे करेंगे। उनके अब तक के कार्यकाल का अनुभव क्या रहा है? जिन अच्छे दिनों का उन्होंने वायदा किया था, क्या वे आए हैं, या वे बस आने ही वाले हैं? या इन वायदों के पूरे होने की कोई उम्मीद इसलिए नहीं है, क्योंकि मोदी भी उन नेताओं की तरह हैं, जो चुनावों से पहले तो वायदे करते हैं, लेकिन बाद में उन्हें पूरा करने के प्रति उत्साह नहीं दिखाते? इन छह महीनों में मोदी ने भारत को कितना बदला है, और इस दौरान भारत और उसके लोग मोदी को कितना बदल पाए हैं?
इन छह महीनों में से ज्यादातर तो संक्रमण काल के तौर पर ही रहा है। इसे वैचारिकता और प्रशासन की शैली में आए बदलाव के रूप में भी देखा जा सकता है। नीतिगत क्षेत्र में इस सरकार ने क्या बदलाव किए हैं, यह देखना अभी शेष है, हालांकि इसके सुबूत दिखते हैं कि सरकार को ज्यादा कुशल तरीके से चलाने के प्रयास किए गए हैं।
वैचारिक रूप से, भारत की परिभाषा बदली है और यह धारणा भी कि भारतीय राष्ट्रवाद किससे निर्मित है। राष्ट्रवाद को क्षेत्रीय आधार पर परिभाषित करने के बजाय अब हम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को सरकारी स्तर पर बढ़ावा देते देख रहे हैं। कई अवसरों पर भाजपा नेताओं ने यह समझाने की कोशिश की है कि हिंदू संस्कृति में तमाम चीजों की व्याख्या निहित है। कुछ सप्ताह पहले नरेंद्र मोदी ने यह दावा किया था कि आधुनिक विज्ञान और पुनर्जागरण से बहुत पहले प्राचीन भारत में जेनेटिक इंजीनियरिंग और प्लास्टिक सर्जरी का चलन था। पिछले सप्ताह राजनाथ सिंह ने यह दावा कर श्रोताओं को चौंका दिया कि वॉर्नर हेजेनबर्ग के 'अनिश्चितता का सिद्धांत' वेदों पर आधारित था।
अतीत का पुनराविष्कार एक चीज है, पर यह तर्क देना, कि हिंदू संस्कृति में हर प्रश्न का उत्तर है, तथा आधुनिकता का हर पहलू हिंदू अतीत से जुड़ा है, विश्व को देखने का अविवेकी तरीका है। इससे वैश्विक पटल पर हम भारतीय हंसी के ही पात्र बनेंगे। दुर्योग से मोदी के कार्यकाल के छह महीने का यही सबसे बड़ा असर है।
भारत के हिंदू अतीत को लगातार सामने रखना वस्तुतः इस देश की मिली-जुली संस्कृति को खारिज करना भी है। अगर सिर्फ एक समुदाय को यह महसूस कराया जाए कि भारत के अतीत में उन्हीं का योगदान रहा है, और दूसरे समुदाय दूसरे देशों से आए हैं, तो यह एक समुदाय को दूसरे समुदाय के खिलाफ खतरनाक ढंग से खड़ा कर देगा। संघ परिवार के नेता या तो बारह सौ वर्ष की गुलामी की बात कर रहे हैं या इस पर अभिमान कि आठ सौ वर्ष बाद देश की सत्ता में एक हिंदू सरकार आई है।
नरेंद्र मोदी बनारस की गंगा-जमनी तहजीब की बात तो करते हैं, लेकिन इस बहुलतावादी संस्कृति को आगे बढ़ाने में अभी तक उन्होंने कुछ खास नहीं किया है। अपने संसदीय क्षेत्र के हालिया दौरे में उन्होंने सिल्क रूट पर ट्रेड फैसिलिटी सेंटर की शुरुआत की-उनके नजदीकियों ने उन्हें समझाया होगा कि यह परियोजना क्षेत्र के मुस्लिम बुनकरों के लिए काफी फायदेमंद होगी। यह एक अच्छी पहल है। इसके बावजूद मैं उन्हें बनारस की मिली-जुली संस्कृति और वहां पैदा हुए दोनों समुदायों की अनेक महान शख्सियतों की याद दिलाना चाहूंगा, जिन्होंने इस शहर को विशिष्ट पहचान दी।
अच्छा होता, यदि घाटों का दौरा करते हुए नरेंद्र मोदी इसका जिक्र करते कि गंगा सिर्फ हिंदुओं के लिए नहीं, बिस्मिल्लाह खान जैसे मुस्लिमों के लिए भी पवित्र रही है। बिस्मिल्लाह खान के बारे में कहा जाता है कि वह विदेश यात्रा पर नहीं जाना चाहते थे, क्योंकि उनके मुताबिक, वे म्लेच्छों की भूमि हैं। इसीलिए हर विदेश यात्रा से लौटकर वह गंगा के घाट पर आते थे। वह गंगा स्नान तो करते ही थे, बल्कि शहनाई और दूसरे यंत्रों पर भी गंगा जल छिड़ककर उन्हें पवित्र करते थे। इसके बावजूद वह एक सच्चे मुस्लिम थे, जो पांचों वक्त नमाज पढ़ते थे।
प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं तक में हिंदुत्व की विचारधारा ने अपनी भूमिका निभाई। शपथ ग्रहण समारोह में आश्चर्यजनक ढंग से सार्क देशों के नेताओं को आमंत्रित करने से लेकर दक्षिण पूर्व एशिया, ऑस्ट्रेलिया और फिजी की उनकी हालिया यात्रा सुनियोजित ढंग से तय की गईं। मसलन, उनकी हर विदेश यात्रा तय करते हुए देश के जनमानस का ख्याल रखा गया और इसका भी ध्यान रखा गया कि बाहर के कौन-से देश उन्हें उनके अच्छे कामकाज का प्रमाणपत्र दे सकते हैं। दुनिया भर के नेता मोदी से गर्मजोशी के साथ मिलें, और यह भरोसा करें कि भारत में अब कोई सांप्रदायिक उन्माद नहीं होगा, इसके लिए मोदी सरकार को एक ऐसी सामाजिक नीति लेकर आना होगा, जिसमें समाज के सभी वर्गों की बेहतरी का आश्वासन हो।
जबकि हकीकत यह है कि धार्मिक विवाद और सामाजिक अलगाव के हर अवसर पर प्रधानमंत्री और उनके मंत्रियों ने चुप्पी साधी है। बेशक विश्व नेताओं का उनसे घनिष्ठ रिश्ता है-अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने तो अपनी दूसरी भारत यात्रा का वायदा किया है, आगामी गणतंत्र दिवस के परेड पर वह हमारे सम्माननीय अतिथि होंगे। लेकिन यह तो कूटनीति और राजनय का हिस्सा है। मोदी सरकार का संसद में बहुमत है, लिहाजा अमेरिका अपने कारोबारी हितों के लिए इस सरकार से बेहतर रिश्ता बनाए रखना चाहेगा ही।
मोदी सरकार के शुरुआती छह महीने में राहत बहुत कम मिली है-विश्व बाजार में कच्चे तेल के दाम घटने से ईंधन के दाम कम हुए हैं, जिसका सकारात्मक असर कई मोर्चे पर दिख रहा है। सरकार ने अगले छह महीने में कई और मोर्चे पर बेहतर काम करने का वायदा किया है, जिन्हें पूरा करना होगा। अगर इसमें सुस्ती दिखी, तो आगे का रास्ता उतना आसान नहीं भी हो सकता है।
(वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक)