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ब्राजील में निंदा, संसद में चुप्पी

Sun, 20 Jul 2014 06:32 PM IST
नीलांजन मुखोपाध्याय
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भारत जैसे देश को अपनी विदेश नीति किस आधार पर तय करनी चाहिए? सरकार में राजनीतिक आत्मविश्वास का स्तर कितना बढ़ जाने पर चीजों को देखने का नजरिया भी बदल जाना चाहिए? क्या नीति निर्माण में अब इसका भी ध्यान रखा जाएगा कि संसद में सरकार बहुमत में है या अल्पमत में? और आखिरी सवाल यह-कि बहुमत के गर्व में इतराती नरेंद्र मोदी सरकार अगर घरेलू स्थिति और अपने मतदाताओं की भावनाओं का ध्यान रखते हुए विदेश नीति तय करती है, तो क्या यह उचित होगा? ये तमाम सवाल महत्वपूर्ण तो हैं ही, तब और प्रासंगिक हो जाते हैं, जब एक प्रधानमंत्री विश्व के शीर्ष नेताओं में अपनी जगह दर्ज करने की इच्छा न सिर्फ जताता है, बल्कि शेष विश्व के भविष्य को भी सीधे-सीधे प्रभावित करता है। गाजा में लगातार इस्राइली आक्रामकता और उस पर अब तक भारत की प्रतिक्रिया की पृष्ठभूमि में भी ये सवाल उल्लेखनीय हैं।
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गाजा पट्टी में इस्राइली हमले और उसके नतीजतन फलस्तीनी नागरिकों के हताहत होने का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। शुरुआत में इस्राइल ने हवाई हमले किए थे, लेकिन अगले कुछ दिनों में उसने जमीनी आक्रमण भी शुरू कर दिया। फलस्तीनी नागरिकों के खिलाफ इस्राइल की सरकार द्वारा चलाई जा रही इस बर्बरता पर हमारी सरकार की प्रतिक्रिया अब तक क्या रही है? हमला शुरू होने के दो दिन बाद विदेश मंत्रालय ने एक वक्तव्य जारी किया, जिसकी भाषा बहुत लचर थी, और जिसमें इस्राइल और फलस्तीन के बीच हिंसा बढ़ जाने पर गहरी चिंता जताई गई थी। उसमें यह भी कहा गया था कि सीमा पार से रॉकेट लांचरों के जरिये इस्राइल के अलग-अलग हिस्सों को जिस तरह निशाना बनाया जा रहा है, उससे भी भारत सरकार चिंतित है।...भारत दोनों से यह अपील करता है कि वे संयम का परिचय दें और ऐसी कार्रवाइयों से बचें, जो स्थिति को भयावह बना दे और क्षेत्र की शांति और सुरक्षा को खतरा पैदा हो जाए।

इसका अर्थ यह कि भारत इस्राइली आक्रामकता को यह कहते हुए जायज ठहरा रहा है कि उसका जवाबी हमला हमास की गैरकानूनी गतिविधियों का नतीजा है, जिसका गाजा पर नियंत्रण है, जबकि पश्चिमी तट एक दूसरे फलस्तीनी गुट फतह के नियंत्रण में है। इस प्रतिक्रिया के अलावा, जिसमें इस्राइल की कार्रवाई की निंदा नहीं की गई, सरकार ने इस पर लोकसभा और राज्यसभा में चर्चा भी नहीं होने दी। बाद में हालांकि उसे राज्यसभा में इस मुद्दे पर चर्चा के लिए विवश होना पड़ा है।
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हाल के वर्षों में हमारी विदेश नीति तय करने वाले पश्चिम एशिया की स्थिति को दो तरह से देख रहे हैं-एक तो भारत की इस्राइल से दोस्ती बढ़ी है और वह हमारे लिए हथियारों का एक बड़ा आपूर्तिकर्ता देश है, इसलिए उसके हमलावर तेवरों के बावजूद चुप्पी और नरमी बनाए रखनी है। दूसरा यह कि घरेलू माहौल और बहुसंख्यक मतदाताओं के अनुरूप राजनयिक रणनीति तैयार होने लगी है। यह दूसरी प्रवृत्ति इस विश्वास से विकसित हुई है कि फलस्तीन के पक्ष में होना हिंदुओं को नहीं भाएगा, जबकि इस्राइल की आलोचना मुस्लिम तुष्टीकरण के रूप में देखी जाएगी।

जैसा कि प्रत्याशित था, इस्राइली आक्रामकता पर सरकार की लचर प्रतिक्रिया के खिलाफ राजधानी में विरोध प्रदर्शन हुए हैं। नई दिल्ली स्थित इस्राइली दूतावास के बाहर होने वाले इस तरह के प्रदर्शन अब हर साल होते हैं। प्रदर्शनकारी आते हैं, साम्राज्यवाद के खिलाफ नारे लगाते हैं, और फिर तितर-बितर हो जाते हैं। पुलिस के जवान खड़े रहते हैं, और इसका ध्यान रखते हैं कि प्रदर्शनकारी हिंसा न करें। लेकिन पिछले सप्ताह ऐसा नहीं हुआ। दिल्ली पुलिस ने इस्राइली दादागीरी के खिलाफ प्रदर्शन करते छात्रों और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया। मीडिया रिपोर्टों में पुलिस ने स्वीकारा है कि प्रदर्शनकारियों पर सख्ती बरतने का उन पर सरकारी दबाव था। विरोध करने वालों के प्रति इस बदले रवैये को क्या केंद्र में सत्ता परिवर्तन का नतीजा मानें? सामान्य स्थिति में, साउथ ब्लॉक इसकी चिंता नहीं करता कि प्रदर्शनकारियों से पुलिस किस तरह निपट रही है। लेकिन सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन के मामले में बेहद संवेदनशील इस्राइलियों ने इस मामले में हमारी सरकार पर दबाब बनाया होगा। यह भारतीय कानून-व्यवस्था में सीधा हस्तक्षेप है और बताता है कि पहले की तुलना में इस्राइल को ज्यादा रियायतें दी जा रही हैं।

हालांकि विदेश मंत्रालय में बैठे नौकरशाहों ने हमारी सरकार को एक अजीब स्थिति में डाल दिया है, क्योंकि भारत समेत सभी ब्रिक्स राष्ट्रों ने इस्राइल के रवैये की निंदा की है। ब्रिक्स देशों के जिस प्रस्ताव पर नरेंद्र मोदी ने भी हस्ताक्षर किए हैं, वह स्पष्ट कहता है कि-पांचों नेताओं का मानना है कि इस्राइल-फलस्तीन विवाद का समाधान पश्चिम एशिया में सतत शांति के लिए बुनियादी तौर पर जरूरी है और वे इस्राइल द्वारा फलस्तीनी इलाके में लगातार बस्तियों के निर्माण और विस्तार का विरोध करते हैं, क्योंकि यह शांति प्रयासों को गंभीर रूप से कमजोर करता है और दो राष्ट्रों के बीच विवाद के समाधान के लिहाज से खतरनाक है।

भारतीय राजनयिकों और मंत्रियों ने कदाचित यह मान लिया कि बारीक अक्षरों में छपे ब्रिक्स घोषणापत्र की अनदेखी की जा सकती है, क्योंकि ये ऐसे मुद्दे नहीं हैं, जिन्हें पत्रकार या विश्लेषक शिखर वार्ता के अंत में उठाएं। लेकिन भारत में संसदीय संस्थाएं इतनी व्यापक और पारदर्शी हैं कि यहां गाजा जैसे जरूरी विषयों पर बहस की अनदेखी करना कठिन है। हमारी सरकार जितनी जल्दी यह समझ ले, उतना ही बेहतर होगा।
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(वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक)
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