राजस्थान के भरतपुर जिले के मालहा गांव में, जो विश्व-प्रसिद्ध केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी अभयारण्य से बस कुछ ही दूरी पर है, किसान एक मुश्किल हकीकत का सामना कर रहे हैं। यहां, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक भू-राजनीति का मेल कोई कोरी बहस नहीं, बल्कि रोजमर्रा का एक संघर्ष है।
पिछले हफ्ते मैंने मालहा के वार्ड सदस्य और एक बुजुर्ग किसान उदयभान से बात की। बेमौसम बारिश ने उनकी तैयार फसलों को तबाह कर दिया था। उन्होंने कहा, ‘किसानों की हालत बहुत बुरी है। कटाई का मौसम शुरू होते ही बेमौसम बारिश हो जाने से हमारी अधिकांश फसलें बर्बाद हो जाती हैं। इस बार तो दो महीने पहले ही बारिश हो गई। यह सब जलवायु परिवर्तन की वजह से है।’ लेकिन, उनका दर्द यहीं खत्म नहीं होता। वह आगे कहते हैं, ‘मजदूरी महंगी हो गई है। युद्ध की वजह से हर चीज की कीमतें बढ़ रही हैं। यूरिया, डीएपी (डाई-अमोनियम फॉस्फेट, भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली फॉस्फेटिक खादों में से एक) की कीमतें भी बढ़ गई हैं।’ उन्होंने कहा कि किसान सरसों और आने वाले खरीफ मौसम के लिए उर्वरकों का ‘भंडारण’ कर रहे हैं, क्योंकि ‘किसी को नहीं पता कि आगे क्या होने वाला है।’ दस बीघा जमीन वाले एक और गेहूं उत्पादक किसान ने भी इसी डर को दोहराया, ‘मुझे डर है कि हर चीज (डीजल, पेट्रोल, खाद) की कमी हो सकती है और कीमतें बढ़ सकती हैं। जो लोग सामान जमा करके रख सकते हैं, वे ऐसा कर रहे हैं।’
जिन किसानों से मैं मिली, वे पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव की बारीकियों को नहीं समझते थे, न ही उन्हें उस नाजुक संघर्ष विराम की कोई समझ थी। पर उनके लिए और ग्रामीण भारत में जमीन पर जीवन गुजारने वाले अनगिनत लोगों के लिए जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीति अलग-अलग खतरे नहीं हैं। यह तो एक दोहरा हमला है, जो एक ही समय पर वार करता है, और उम्मीद को कर्ज में तथा जुझारूपन को निराशा में बदल देता है। उन सुनहरे हफ्तों में, जब रबी की फसलें कटाई के लिए तैयार होनी चाहिए थीं, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के किसानों ने अपनी फसलों को बर्बाद होते देखा। भरतपुर के ‘द कोर्टयार्ड’ में काम करने वाले एक वेटर ने बताया कि वह सुबह चार बजे उठकर अपने खेत में काम करता है और फिर नौकरी पर जाता है। असमय हुई बारिश की वजह से गेहूं की फसल को हुए नुकसान के बारे में बताते हुए उसकी आंखों में आंसू आ गए।
मार्च और अप्रैल की शुरुआत में हुई बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि (जो लगातार पश्चिमी विक्षोभ के कारण हुई) ने कटाई से कुछ ही दिन पहले गेहूं, सरसों, चना व बागवानी की फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया। अकेले महाराष्ट्र में ही दो लाख हेक्टेयर से ज्यादा जमीन पर फसलों को नुकसान पहुंचने की खबरें हैं। बीकानेर के अर्जुनसर इलाके में किसानों का कहना है कि उनकी गेहूं, सरसों और चने की फसल पूरी तरह (सौ फीसदी) बर्बाद हो गई है। फसल बीमा का भुगतान मिलने में हो रही देरी ने परेशानी को और बढ़ा दिया है। यह कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे पैटर्न की नई कड़ी है, जो बार-बार दोहराई जा रही है।
पश्चिमी विक्षोभ, जो आमतौर पर सर्दियों में आते हैं, अब वसंत के मौसम में भी देर तक बने रहते हैं। वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन से जोड़कर देख रहे हैं, जिसके कारण वायुमंडलीय पैटर्न बदल रहे हैं। इसका नतीजा यह होता है कि ठीक ऐसे समय पर भारी बारिश, ओले और तेज हवाएं चलती हैं, जब इनकी सबसे कम संभावना होती है। खेतों में खड़ी गेहूं की फसल जमीन पर बिछ जाती है, अनाज खेतों में ही सड़ जाता है, और उसकी गुणवत्ता तेजी से गिर जाती है। कई किसान, जो अभी पिछले वर्षों के झटकों से उबर ही रहे थे, अब इस ‘दोहरी मार’ का सामना कर रहे हैं। मौसम की मार के साथ-साथ, पश्चिम एशिया में तनाव के नतीजों ने भी स्थिति को और बिगाड़ दिया है। भारत प्राकृतिक गैस और उर्वरकों के लिए खाड़ी देशों से होने वाली आपूर्ति पर बहुत ज्यादा निर्भर है। होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास पैदा हुई रुकावटों के कारण यूरिया और अन्य सामान की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। खरीफ की बुआई से पहले लोग घबराकर खरीदारी कर रहे हैं और विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर यही स्थिति बनी रही, तो देश में उर्वरक उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है। डीजल की बढ़ी हुई कीमतें बोझ को और बढ़ा देती हैं। जिन किसानों की रबी की फसल बर्बाद हो गई, उन्हें अब अगले मौसम की खेती के लिए ज्यादा लागत लगानी पड़ेगी। छोटे और सीमांत किसान सबसे ज्यादा मार झेलते हैं, जिनकी संख्या सर्वाधिक है। महीनों की मेहनत, बीज की लागत और कर्ज लेने के बाद, कई किसानों को अपनी फसल को लगभग पूरी तरह से चौपट होते देखना पड़ता है। जिन इलाकों में पहले से ही खेती से जुड़े संकट आते रहते हैं, वहां यह संकट और भी गहरा जाता है।
कृषि, जिसमें वानिकी और मत्स्य पालन भी शामिल है, भारत के लगभग 45-46 फीसदी कार्यबल को रोजगार देती है और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 18 फीसदी का योगदान करती है। यह ग्रामीण मांग को आधार प्रदान करती है, खाद्य कीमतों को स्थिर रखती है, और 1.4 अरब लोगों के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करती है। जब गेहूं का उत्पादन थोड़ा-सा भी गिरता है, तो खरीद, बफर स्टॉक और बाजार की आपूर्ति पर इसका दबाव पड़ता है। इसके चलते खाद्य महंगाई बढ़ सकती है, जिसका सबसे बुरा असर बढ़ी हुई कीमतों और कुपोषण के संभावित जोखिमों के रूप में शहरी परिवारों और सबसे गरीब लोगों पर पड़ता है। यह एक आर्थिक, सामाजिक और रणनीतिक कमजोरी है। बार-बार लगने वाले झटके किसानों की सहनशक्ति को कमजोर करते हैं, कृषि में निवेश को हतोत्साहित करते हैं, और संकट के कारण पलायन को तेज करते हैं।
जिस देश में खाद्य सुरक्षा से कोई समझौता नहीं हो सकता, वहां इन आपस में जुड़ी हुई समस्याओं (जलवायु में अस्थिरता और भू-राजनीतिक हलचलों) को नजरअंदाज करना लंबे समय तक अस्थिरता का जोखिम पैदा करता है। किसानों को हुए नुकसान के त्वरित आकलन और समय पर बीमा भुगतान की जरूरत है। लंबे समय के लिहाज से, भारत को जलवायु-अनुकूल फसलों की किस्मों, बेहतर मौसम पूर्वानुमान, जल प्रबंधन और उर्वरकों के मामले में आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। अस्थिर क्षेत्रों से हटकर आपूर्ति शृंखला में विविधता लाना बेहद जरूरी है। भारत की विकास गाथा अपने किसानों को पीछे नहीं छोड़ सकती। जब उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब या महाराष्ट्र के किसान तकलीफ उठाते हैं, तो पूरा देश उसे महसूस करता है।