सलमान खान को पिछले सप्ताह जब जेल भेजा गया, तब हर टीवी चैनल पर यह खबर इस तरह दिखाई गई, जैसे कोई क्रिकेट मैच हो रहा हो, 'सलमान खान अभी कोर्ट से बाहर नहीं आए हैं, वहां देखिए, उनकी बहनें हैं, जो भावुक दिख रही हैं, अब सलमान बाहर आ गए हैं, पुलिस की गाड़ी में उनको जोधपुर सेंट्रल जेल ले जाया जा रहा है', आदि-आदि। बाद में चर्चाओं में शामिल अधिकतर लोग हमारी न्यायिक प्रणाली की प्रशंसा करते दिखे। यह ठीक है कि सलमान को जेल भेजा गया, पर मैं विनम्रता से यह कहना चाहूंगी कि अपने देश की न्यायिक व्यवस्था प्रशंसा के लायक शायद ही है।
किसी मामले में न्याय होने में अगर बीस साल लग जाते हैं, तो यह न्याय नहीं है। सलमान खान ने जब काले हिरण का शिकार किया, तब उसके शिकार करने पर प्रतिबंध था। क्या उन पर जुर्माना लगाकर इस मामले को निपटाया नहीं जा सकता था? सलमान खान अमीर आदमी हैं, सो क्या उनसे चिंकारों और जंगल के अन्य असुरक्षित जानवरों के लिए एक खास सुरक्षित वन के ईजाद के लिए पैसे वसूल नहीं किए जा सकते थे?
लेकिन ऐसा कुछ करने के बदले हमारी न्याय प्रक्रिया के तहत बीस साल तक अदालतों में कार्यवाही लटकी रही, और इसके पैसे हम, आप ने, देश के करदाताओं ने दिए हैं। इस दौरान बाघ, चिंकारे, हाथी और न जाने कितने अन्य जानवर उन लोगों ने मारे हैं, जिनके लिए शिकार करना तिजारत है। इतनी गंदी तिजारत, जिसके कारण इस देश के बचे-खुचे जंगल और जंगली जानवर अंतिम सांसंे ले रहे हैं। इस कारोबार में हाथी के दांत, शेरों के नाखून और खाल निर्यात किए जाते हैं। इस तिजारत को बंद करना इसलिए कठिन है, क्योंकि इसमें वन अधिकारी भी शामिल हैं और राज्य सरकारों के आला अधिकारी भी। लेकिन इस तिजारत के बारे में कम ही सुनते हैं हम, क्योंकि इस कारोबार में सलमान खान जैसे लोग नहीं हैं, बल्कि असली अपराधी हैं, जो उन सबको जान से मारने की ताकत रखते हैं, जो उनकी पोल खोलने की कोशिश करते हैं।
सो सलमान खान के दो दिन जेल में रहने से अगर आपको यह लगता है कि देश की न्याय व्यवस्था ने अपनी शक्ति दर्शाई है, तो इस विचार को फौरन अपने मन से निकाल दीजिए। हमारी न्याय प्रणाली का यथार्थ यह है कि हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर मामलों में दशकों तक मुकदमे चलते हैं और अंत में भी कई बार न्याय तब होता है, जब पीड़ित भी इस दुनिया से चल बसते हैं और अपराधी भी।
पिछले सप्ताह शायद आपने सुना होगा कि फिर से उस हाशिमपुरा नरसंहार की चर्चा छिड़ गई है, जिसमें उत्तर प्रदेश की पुलिस ने निहत्थे मुसलमानों को एक ट्रक में बंद कर उन पर गोलियां चलाई थीं। मारे जाने वाले लोगों में सत्तर साल के बुजुर्ग भी थे और तेरह-चौदह वर्ष के बच्चे भी। गोलियों से भून डालने के बाद उनकी लाशें गंगनहर में फेंक दी गई थीं। अगर पुलिस की उस गोलीबारी में एक-दो लोग जीवित नहीं बचते, तो उस शर्मनाक घटना की खबर तक किसी को नहीं मिलती। हाशिमपुरा के उस नरसंहार को तीस साल से ज्यादा हो चुके हैं और अभी तक अदालती कार्यवाही चल ही रही है। इस तरह के गंभीर अपराधों के बाद न्याय जब शीघ्र होने लगेगा, तब हम अपने देश की न्याय प्रणाली पर गर्व कर सकेंगे। एक अभिनेता को शिकार करने के जुर्म में जेल भेजकर कुछ हासिल नहीं हुआ है।