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कहीं तो हंसी हो

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अपने करियर को खतरे में डालकर क्या कोई राजनेता असंवेदनशील बयानबाजी कर सकता है? अगर कोई राजनेता अपनी पार्टी लाइन से हटकर किसी संवेदनशील मुद्दे पर या इस समय में भारत-चीन तनाव पर कुछ बोल दे, तो निश्चित रूप से उसे उसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
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लेकिन यही राजनेता यौन उत्पीड़न या बलात्कार के बारे में निहायत बेहूदा और अपमानजनक टिप्पणियां करने से नहीं हिचक रहे हैं। वजह यह है कि ऐसे बयानों का राजनीतिक खामियाजा बहुत कम है। अगर मामला तूल पकड़ ले, तो माफी मांग लेना या फिर यह कह देना कि उनके बयान को गलत संदर्भ में लिया गया, बचाव का एक मानक तरीका बन गया है।

इसलिए बच्चियों के साथ हुई बलात्कार की घिनौनी हरकतों से जब देश में एक बार फिर गुस्से और दुख का माहौल बना हुआ है, उसी वक्त मध्य प्रदेश के भिंड के कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री सत्यदेव कटारे ने एक राजनीतिक सभा के दौरान एक बेहद हल्की टिप्पणी की।
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उन्होंने कहा कि जब तक महिला तिरछी नजर से नहीं देखेगी तब तक पुरुष उसे नहीं छेड़ेगा। बाद में हालांकि कटारे ने माफी मांग ली। उनकी इस आपत्तिजनक टिप्पणी से ऐसे कई राजनेताओं और अधिकारियों के पूर्वाग्रह का पता चलता है, जो यौन उत्पीड़न और बलात्कार के मामलों में लगातार बहाने खोजते फिरते हैं।

बलात्कार जैसी घिनौनी हरकत करने वालों की जगह पीड़ित को दोषी ठहराने के आदी हो चुके लोगों को पिछले सप्ताह बच्चियों के साथ बलात्कार और हत्या की खबरों की बाढ़ आने के बाद जवाब नहीं सूझ रहा था।

पिछले कुछ दिन से देश के कई हिस्सों से बच्चियों के साथ बलात्कार के कई मामले सामने आए हैं। ऐसी डरावनी घटनाएं बताती हैं कि भारतीय जनसंख्या का सबसे संवेदनशील हिस्सा बीमार मानसिकता वाले लोगों के निशाने पर है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़े बताते हैं कि साल 2009 से 2011 के बीच देश में बच्चों के साथ होने वाले बलात्कार के आंकड़े में 30 फीसदी का इजाफा हुआ है और यह 5,368 से बढ़कर 7,112 हो गया है।

इस समयावधि के दौरान बच्चों के खिलाफ होने वाले कुल अपराधों में 24 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है और यह 24,201 से बढ़कर 33,098 हो गया है। बलात्कार के अलावा बच्चों के अपहरण के मामलों में हुई बढ़ोत्तरी चौंकाने वाली है। साल 2009 में यह आंकड़ा 8,945 था, जो 2011 में बढ़कर 15,284 तक पहुंच गया।

अब यह भी पूरी तरह से साफ हो चुका है कि पिछले दिसंबर में दिल्ली में चलती बस में एक युवती के साथ सामूहिक बलात्कार और उसकी मौत के बाद हुए राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शनों और यौन हिंसा की समस्या पर आत्मनिरीक्षण की पहल के बावजूद जमीनी हकीकत में नाममात्र का बदलाव आया है।

हमने उस युवती को निर्भया नाम दिया। उसकी मौत के बाद आम लोगों के दबाव के चलते बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अन्य अपराधों की रोकथाम की दिशा में नये कानून बनाए गए। लेकिन बच्चियों और महिलाओं के प्रति नजरिया बदलने का संदेश अभी सभी लोगों तक नहीं पहुंच रहा है। न तो परिवार और न ही समाज बच्चों को सुरक्षा दे पाने में सक्षम हैं।

बच्चों का शोषण घर की चारदीवारी और उसके बाहर दोनों ही जगहों पर हो रहा है। निश्चित रूप से पुलिस सुधार और तीव्र न्याय की जरूरत है। लेकिन नजरिया तभी बदलेगा जब समाज और पड़ोसियों में बलात्कार और यौन हिंसा से जुड़े अन्य अपराधों के खिलाफ सक्रियता बढ़ेगी।

इसके अलावा गरीब कामकाजी लोगों के बच्चों के लिए क्रेच और दिन में देखभाल करने वाले केंद्रों की संख्या को बढ़ाए जाने की जरूरत है ताकि काम पर जाते वक्त वे अपने बच्चों को वहां छोड़ सकें। हमारे यहां ज्यादातर लोग असंगठित क्षेत्रों में काम करते हैं, जो आमतौर पर इस तरह की सुविधाएं नहीं मुहैया कराते। इसके साथ ही हर किसी को नए आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम 2013 के बारे में जानना चाहिए।

ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं है कि नये कानून के खंड 166 ए के तहत प्रावधान है कि अगर कोई पुलिस अधिकारी बलात्कार के खिलाफ शिकायत दर्ज करने से इनकार करता है तो उसे दो साल की कैद हो सकती है। बाल संरक्षण के तहत हर जिले में एक बाल कल्याण समिति होनी चाहिए, जो संवेदनशील बच्चों की देखभाल से जुड़े मामलों पर नजर रख सके।

दुर्भाग्य से भारत के आधे से भी कम जिलों में ऐसी समितियों का गठन किया गया है और उन समितियों के ज्यादातर सदस्यों को बाल संरक्षण प्रणाली का कोई प्रशिक्षण प्राप्त नहीं है। बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन उत्पीड़न को रोकना पूरी दुनिया के लिए चुनौती का विषय है। लेकिन भारत में इसे लेकर समाज और सरकार दोनों में कमियां हैं।

एक अंतरराष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्था ह्यूमन राइट वाच की 2013 की रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे मामलों की शिकायत दर्ज कराने के लिए आगे आने वाले पीड़ितों को इसके चलते काफी तकलीफें उठानी पड़ती हैं। इस चुप्पी को तोड़ने के लिए ऐसे परिवारों को समुदाय आधारित सहयोग की जरूरत है।
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