जब से केंद्र में मोदी सरकार आई है, तब से लगातार गो-हत्या को लेकर गो रक्षकों द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में आक्रोश व्यक्त किया जाता रहा है। इतना ही नहीं, गोमांस खाने व ले जाने के संदेह में कई बार मुसलमानों पर हिंसक हमले भी किए गए हैं। इन सबसे मुसलमानों के बीच यह संदेश गया कि हिंदुस्तान में गोवंश की हत्या को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसलिए उनका यह ताजा फैसला और गो-माता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग एक समझदारी भरा कदम माना जाना चाहिए। मुस्लिम समाज के नेताओं को यही मांग देश के अन्य प्रांतों में भी उठानी चाहिए।
हमारे पूरे इतिहास में, इस देश के शासकों और आदर्श व्यक्तियों ने गाय की रक्षा और पोषण किया है। राजा पृथु (जिनके नाम पर पृथ्वी को ‘पृथ्वी’ कहा जाता है) ने पृथ्वी के स्वरूप वाली गाय का दोहन कर अकाल को समाप्त किया और मानवता की रक्षा की। भगवान श्रीकृष्ण एक गोपाल (गाय चराने वाले) थे। अर्जुन ने विराटनगर के युद्ध में गायों की रक्षा के लिए 14 वर्ष का और निर्वासन झेलने का जोखिम उठाना उचित समझा। राजा नहुष को ऋषि च्यवन के जीवन के बदले पुरस्कार के रूप में मछुआरों को मुआवजा देना पड़ा, जिसके लिए उन्होंने उन्हें एक गाय दान की। चोल राजा मनु नीति चोलन ने अपने पुत्र वीधिविदंगन को मार डाला, क्योंकि उसके रथ के पहियों के नीचे एक बछड़ा कुचल गया था। मुगल सम्राट अकबर (1556–1605), जहांगीर (1605–1627), और अहमद शाह (1748–1754) ने भी गो-हत्या पर प्रतिबंध लगाए थे। मैसूर के सुल्तान हैदर अली (1761-82) ने गो-हत्या को दंडनीय अपराध बनाया, जिसमें अपराधियों के हाथ काटे जाते थे। 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में, सिख साम्राज्य के संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह ने अपने पूरे राज्य में गो-हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर ने 1857 में गो-हत्या पर प्रतिबंध लगाया, गोमांस खाने पर रोक लगाई और गो-हत्या करने वाले को तोप से उड़ाने की घोषणा की।
मराठा, जो सभी धर्मों के प्रति समावेशी और सहिष्णु माने जाते थे, उन्होंने गो-हत्या रोकने के लिए व्यापक कदम उठाए। कई मामलों में गो-हत्या करने वालों को फांसी भी दी गई। उन्होंने 1790 के दशक के अंत में बसेन (वर्तमान वसई, महाराष्ट्र) के आसपास नाकेबंदी कर दी थी, ताकि गायों की लाशों को बॉम्बे और सलसेट के कसाइयों तक तस्करी से न पहुंचाया जा सके। हिंदू धर्म सम्राट करपात्री जी महाराज से लेकर आज तक हर संत और सनातन धर्मी गोवंश की हत्या रोकने की मांग करता आया है। फिर भी रोजाना भारत से हजारों ट्रक गो वंशों को काटने के लिए अवैध रूप से बांग्लादेश भेजा जाता है, जो शर्मनाक है।
दरअसल, गोरक्षा का मुद्दा धार्मिक नहीं, बल्कि कृषि, अर्थव्यवस्था और लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा है। हजारों साल पहले भारत के ऋषियों ने गोवंश के असीमित लाभ जान लिए थे। इसलिए उन्होंने गोवंश को इतना महत्व दिया। अंग्रेज शासकों ने रणनीति बनाकर भारतीय गोवंश को नष्ट करने का अभियान चलाया, जो आज भी जारी है। वे जानते थे कि हजारों साल से भारत की आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक शक्ति का स्रोत गो आधारित कृषि रहा था। बिना गोवंश की हत्या किए भारत और भारतीयों को कमजोर नहीं किया जा सकता था। आजादी के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इसमें पर्दे के पीछे से भूमिका निभाई।
उन्होंने ऐसी मानसिकता तैयार की कि घर-घर में पलने वाली गाय उपेक्षा और हीनभावना का शिकार हो गई। गाय के दूध, दही, मक्खन, घी और छाछ का सेवन करके हर भारतीय परिवार स्वस्थ, सुखी और संस्कारवान रहता था। आज आम भारतीयों को पोषक तत्व नहीं मिलते हैं। बड़े ब्रांडों के नाम पर जो दूध, दही, घी बेचे जा रहे हैं, उसमें भारी मिलावट रहती है। नतीजतन चिकित्सा व्यवसाय हर गली व शहर में तेजी से पनप रहा है। चिंता की बात यह है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापन पर जीने वाले लोग कैसे देशहित में सोच सकते हैं? वे तो वही लिखेंगे और बोलेंगे, जो उनके कॉरपोरेट आका उन्हें लिखने को कहेंगे। इस लॉबी के खिलाफ संगठित होकर आवाज उठानी होगी। लेकिन हिंसा से नहीं तर्क और प्रमाण के साथ।
भारतीय गोवंश की श्रेष्ठता को भारतीय जनमानस के सामने लगातार इस तरह रखना होगा कि फिर से भारतीय परिवार गोवंश को अपने आंगन में स्थान दे। गांवों में तो यह आसानी से संभव है, लेकिन ऐसा होता नहीं है। गाय गोशाला में नहीं, जब हर घर के आंगन में पलेंगी, तभी गोवंश की रक्षा होगी। जिनके पास स्थान का अभाव है, उनकी तो मजबूरी है। पर वे भी गोवंश के उत्पादों को प्रोत्साहन देकर परिवार और समाज का भला कर सकते है। भूटान में हर व्यक्ति सुखी है, क्योंकि उनका जीवन गो और कृषि आधारित है। उन्हें दुनिया के साथ दौड़ने की इच्छा नहीं है, क्योंकि वे तीव्र औद्योगीकरण के दुष्परिणामों से परिचित हैं।
औद्योगीकरण और ‘बीफ’ निर्यात से भौतिक प्रगति तो हो सकती है, पर समाज सुखी होने के बजाय और ज्यादा असुरक्षित होकर तनाव में आ जाता है। भारत की सनातन संस्कृति सादा जीवन और उच्च विचार को अपनाने की प्रेरणा देती है। इन्हीं मूल्यों के कारण भारतीय समाज हजारों साल से निरंतर जिंदा रहा है, जबकि पश्चिमी समाज ने एक शताब्दी के अंदर ही औद्योगीकरण के नफे और नुकसान, दोनों का अनुभव कर लिया है। अब वह भारतीय जीवन मूल्यों की ओर आकर्षित हो रहा है। ऐसे में भारत को फिर से विश्वगुरु बनना होगा, जो गो आधारित जीवन और वेद आधारित ज्ञान से ही संभव है। इसमें न तो कोई अतिशयोक्ति है और न ही कोई धर्मांधता। -edit@amarujala.com