एक दिन देवर्षि नारद हिमालय के पास आए। उन्होंने पार्वती को देखकर मुस्कुराते हुए कहा, ‘राजन, आपकी पुत्री साधारण नहीं है। भविष्य में यह भगवान शिव की अर्धांगिनी बनेगी।’ यह सुनकर पार्वती का चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा, किंतु माता मैना चिंतित हो गईं। वह सोचने लगीं, कि शिव तो विरक्त योगी हैं। वह भस्म लगाते हैं, गले में सर्प धारण करते हैं। मेरी कोमल पुत्री उनके साथ कैसे रहेगी?
उधर देवताओं पर भीषण संकट छाया हुआ था। अत्याचारी तारकासुर तीनों लोकों में आतंक फैला रहा था। ऋषि-मुनियों के यज्ञ नष्ट किए जा रहे थे और देवता भी भयभीत थे। उसे वरदान मिला था कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही संभव है। देवताओं ने समझ लिया कि शिव और पार्वती का विवाह ही संसार को तारकासुर के आतंक से मुक्त करा सकता है।
इधर, पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या करने का निश्चय किया। उन्होंने राजमहल के सुख त्याग दिए और वन में जाकर ध्यान में लीन हो गईं। पहले वह केवल फल खाकर रहती थीं।
फिर उन्होंने फल भी छोड़ दिए और सूखे पत्तों पर जीवन बिताने लगीं। समय बीतता गया, उनकी तपस्या और कठोर होती गई। अंततः उन्होंने पत्तों का भी त्याग कर दिया। अब वह बिना कुछ खाए-पिए केवल शिवजी का स्मरण करती थीं। तभी से उनका नाम ‘अपर्णा’ पड़ गया (जिसने पत्तों तक का सेवन न किया हो)। अपर्णा की माता मैना को जब यह समाचार मिला, तो वह तुरंत वन में पहुंचीं। वह पार्वती को गले लगाकर बोलीं, ‘पुत्री, यह कैसी तपस्या है? अपने शरीर को इतना कष्ट मत दो।’ लेकिन पार्वती शांत स्वर में बोलीं, ‘माता, मेरा जीवन भगवान शिव को समर्पित है। जब तक वह प्रसन्न नहीं होंगे, मैं तपस्या नहीं छोड़ूंगी।’ मैना व्याकुल होकर बार-बार कहने लगीं, ‘उ मा! उ मा!’ (हे पुत्री, ऐसा मत कर!)। मां के इन्हीं करुण शब्दों से पार्वती का नाम ‘उमा’ प्रसिद्ध हो गया।
पार्वती की अटूट भक्ति और तपस्या से अंततः भगवान शिव प्रसन्न हुए। वह साधु का वेश धारण करके पार्वती के सामने आए और बोले, ‘देवी, तुम जिस शिव को पाने के लिए तप कर रही हो, वह तो एक विरक्त योगी है। न उनके पास राजसी वैभव है, न सुख-सुविधाएं। तुम जैसी राजकुमारी को कोई भी राजकुमार मिल सकता है।’ यह सुनते ही पार्वती ने कहा, ‘भोलेनाथ से श्रेष्ठ इस संसार में कोई नहीं। मैं उन्हें ही अपना पति मान चुकी हूं।’ पार्वती की अटल निष्ठा देखकर महादेव अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपना दिव्य रूप प्रकट किया और मुस्कुराकर बोले, ‘देवी, तुम्हारी तपस्या सफल हुई। मैं तुम्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करता हूं।’
इसके बाद शिव और पार्वती का भव्य विवाह संपन्न हुआ। विवाह के बाद माता मैना ने अनुभव किया कि उनकी पुत्री केवल उनकी संतान नहीं, बल्कि जगत की आदिशक्ति है। इस प्रकार हिमालय की पुत्री पार्वती अपनी कठोर तपस्या के कारण ‘अपर्णा’ और अपनी माता के प्रेम भरे शब्दों के कारण ‘उमा’ नाम से प्रसिद्ध हुईं।