तथ्यः आज 20 अप्रैल को हमारे पास 524.5 लाख मीट्रिक टन खाद्यान्न का भंडार है- जिसमें 289.5 लाख मीट्रिक टन चावल और 235 लाख मीट्रिक टन गेहूं है- श्री राम विलास पासवान। ( इसके अलावा 287 लाख मीट्रिक टन धान भी है)
अमेरिका से खाद्यान्न आयात करने (पीएल480 कार्यक्रम) से लेकर निर्यात करने की क्षमता के साथ पर्याप्त रूप से आत्मनिर्भर होने की भारत की कहानी कई बार सुनाई जा चुकी है। हमारे यहां खाद्यान्न की इतनी तंगी थी कि जब भी कोई जहाज आता था, तो उसमें लदा भंडार जल्द ही वितरण के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में भेज दिया जाता था। भारत की स्थिति उस समय 'शिप टू माउथ' जैसी हो गई थी (जहाज से उतरकर सामान सीधे उपभोक्ता तक पहुंच जाए)।
हरित क्रांति ने सब कुछ बदल दिया
भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) की शुरुआत 1942 में हुई थी। इस व्यवस्था के जरिये उपलब्ध खाद्यान्न की राशनिंग की जाती थी। सातवीं पंचवर्षीय योजना में पीडीएस को स्थायी रूप दिया गया और सारी आबादी को पीडीएस के दायरे में लाया गया।
पीडीएस ने दो उद्देश्यों की पूर्ति की। खाद्यान्न की पैदावार बढ़ने के साथ ही किसानों के पास बेचने लायक अतिरिक्त खाद्यान्न बचने लगा। हमें ऐसी प्रणाली की जरूरत थी, जो खाद्यान्न की उचित और लाभकारी मूल्य पर खरीद कर सके-और उत्पादक मूल्य के लिए जमीन तैयार करे। भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) अतिरिक्त खाद्यान्न की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद करता है। एक अन्य उद्देश्य खरीफ और रबी की कटाई के बाद खाद्यान्न को जमा करना और फिर हर महीने राज्यों को जरूरत के अनुसार जारी करना था, ताकि साल भर की उपलब्धता और मूल्य स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।
खाद्यान्न वितरण विभिन्न तबके के लोगों के वर्गीकरण की एक जटिल व्यवस्था पर आधारित हैः गरीबी रेखा से ऊपर (एपीएल), गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल), अंत्योदय अन्न योजना (एएवाई) और खुले बाजार में बिक्री।
खाद्यान्न का मालिक कौन?
इन सबके बीच, एक बुनियादी सवाल कभी नहीं पूछा गया और न ही उसका जवाब दिया गया। एफसीआई में जमा खाद्यान्न का 'मालिक' कौन है? केंद्र सरकार/एफसीआई सोचती है कि वह उसकी मालिक है, क्योंकि खरीद, रख-रखाव और वितरण के लिए वह जवाबदेह है और नुकसान के लिए उत्तरदायी है। राज्य सरकारें सोचती हैं कि राज्य के धन से खरीदे संचय की वह मालिक हैं। वे गलत हैं। खाद्यान्न पर हक भारत के लोगों का है। अनाज किसानों और खेतिहर मजदूरों के श्रम से पैदा होता है। करदाताओं के धन से इसकी खरीद होती है और उसे जमा किया जाता है। एफसीआई या राज्य नागरिक आपूर्ति निगमों को होने वाला मुनाफा या घाटा राजकोष का मुनाफा या घाटा होता है। यदि खाद्यान्न भारत के लोगों का है तो खाद्यान्न पर भारत के लोगों का पहला दावा है।
यदि हम इस बुनियादी सच को अपने जेहन में रखें, तो इस सवाल का जवाब देना आसान हो जाएगाः एक महामारी के प्रकोप, देशव्यापी तालाबंदी और कम से कम आबादी के निचले क्रम के आधे हिस्से (13 करोड़ परिवारों) में अपरिहार्य गरीबी और भूख जैसी आपातकालीन स्थिति में सरकार को क्या करना चाहिए?
न नकद, न खाना
आज यह कठोर तथ्य है कि लाखों परिवारों के पास नकदी खत्म हो गई है। वे खाना नहीं खरीद सकते। लॉकडाउन में अकेले या परिवार के साथ रह रहे किसी व्यक्ति के लिए इससे बुरी स्थिति क्या हो सकती है कि उसके पास न धन है, न खाना। गरीबों को सरकार या निजी संस्थाओं द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे पके भोजन के लिए लंबी कतारों में खड़े होकर अपने स्वाभिमान से समझौता करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
पके भोजन का मुफ्त वितरण कभी सही नहीं कहा जा सकता। इसकी गुणवत्ता खराब हो सकती है। मात्रा अपर्याप्त हो सकती है। यदि परिवार में बुजुर्ग या छोटे बच्चे हैं, तो वे भोजन के लिए कतार में खड़े नहीं हो सकते; परिवार के अन्य सदस्यों को अतिरिक्त हिस्से के लिए गिड़गिड़ाना पड़ता है।
ऐसे देश में जहां खासतौर से बच्चों के बीच कुपोषण की बदतर स्थिति हो, भूख के व्यापक होने का खतरा हो सकता है। भूख और कुपोषण के कारण भुखमरी पैदा होगी। टीवी, प्रिंट और सोशल मीडिया अनेक परिवारों के भूख से पीड़ित होने और कुछ के भुखमरी का शिकार होने से संबंधित खबरों से अटे पड़े हैं। हम यह कभी नहीं जान पाएंगे कि कितने लोगों की भूख की वजह से मौत हुई, क्योंकि कोई भी राज्य सरकार भुखमरी स्वीकार नहीं करेगी या भूख से होने वाली मौतों की गिनती नहीं करेगी।
यह विडंबना ही है कि भारत में खाद्यान्न का पर्याप्त भंडार और सार्वजनिक तथा निजी दुकानों की पूरी प्रणाली है, जो लोगों तक खाद्यान्न पहुंचा सकती है, इसके बावजूद लाखों लोग भूख का सामना कर रहे हैं। अब जबकि लॉकडाउन समापन की ओर है, केंद्र तथा राज्य सरकारों को दो चीजें सुनिश्चित करनीं चाहिएः
1. लोगों के पास सार्वजनिक और निजी दुकानों से अनाज, दालें, तेल, नमक, चीनी इत्यादि खरीदने के लिए नकदी होनी चाहिए और दुकानों में पर्याप्त भंडार; और या
2. 13 करोड़ परिवारों को पर्याप्त मात्रा में अनाज, दालें, तेल, नमक इत्यादि मुफ्त दिए जाएं।
हमारे साधनों के भीतर
दोहराव के जोखिम के साथ मैं बताना चाहूंगा कि पहले विकल्प पर, प्रति परिवार पांच हजार रुपये देने से अधिकतम 65,000 करोड़ रुपये खर्च होंगे और इससे मई के अंत तक काम चल जाएगा।
दूसरे विकल्प की लागत दस किलोग्राम अनाज प्रति व्यक्ति प्रति परिवार के आधार पर 65 लाख मीट्रिक टन अनाज प्रति माह, और इसके साथ दालों, तेल, नमक और चीनी इत्यादि पर थोड़ा खर्च। वास्तव में इन दोनों विकल्पों का इस्तेमाल करना चाहिए। रबी की खरीद फिर से गोदामों को भर ही देगी।
पैसे की बचत और खाद्यान्न की जमाखोरी, जबकि लाखों परिवार भुखमरी का सामना कर रहे हैं, बेहद दुखद है।