भारत में कोरोना वायरस के मामले करीब 34 लाख हो चुके हैं। कोरोना से ठीक होने की दर 76.28 फीसदी है, जबकि देश में अब तक इससे 61,500 से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई है। लेकिन जो लोग बचे हुए हैं, उनकी जिंदगी कैसी है? महामारी और भयावह आर्थिक संकट के दौर में 1.3 अरब की आबादी वाले इस देश में रोजमर्रा की जिंदगी क्या महसूस करती है? बचे हुए लोग आने वाली पीढ़ियों को क्या बताएंगे कि कोविड-19 के समय में उनकी जिंदगी कैसी थी? महामारी के इन छह महीनों से ज्यादा की अवधि में हर कोई अनिश्चितताओं और समस्याओं से जूझ रहा है, बेशक सबकी समस्याएं अलग-अलग तरह की हैं। अंततः यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप सामाजिक और आर्थिक खाद्य शृंखला के किस पायदान पर खड़े हैं।
मसलन, दिल्ली में ऐसे बहुत से लोग हैं, जिनके पास सुरक्षित नौकरियां हैं, सिर पर छत है, परिवार का सहयोग है और वे घर से काम करने की स्थिति में हैं, और वे अपने काम की जगह को फिर से सजा रहे हैं और अपनी बालकनी-बगीचे में अधिक समय बिता रहे हैं। लेकिन इसी महानगर में बहुत से बेघर और अत्यंत गरीब लोगों को मुफ्त की दाल-रोटी के लिए कतारों में लगे देखा जा सकता है, जैसे कि टिंकु कुमार। मैं नई दिल्ली के गुरुद्वारा बांग्ला साहिब के सामने वाले फुटपाथ पर इस युवक से मिली। वह अपनी पत्नी के साथ मुफ्त भोजन के लिए कतार
में खड़े थे-यह उनका पहला दिन था। टिंकु जीवन यापन के लिए सार्वजनिक शौचालय की सफाई करते हैं और फिलहाल काम ढूंढ रहे हैं। लॉकडाउन के बाद अर्थव्यवस्था फिर से धीरे-धीरे खुल रही है। लेकिन टिंकू ने बताया कि उन्होंने जिस ठेकेदार के लिए काम किया, वह अब उनके फोन का जवाब नहीं देता।
कर्नाटक की प्रवासी मजदूर लता दास भी मुफ्त भोजन के लिए कतार में खड़ी थीं। सेल्समैन का काम करने वाले उनके पति बीमार हैं और फिलहाल अस्पताल में भर्ती हैं। लता गारमेंट फैक्टरी में काम करती थीं। लेकिन लॉकडाउन के दौरान वह फैक्टरी बंद हो गई। लता के पास कोई काम नहीं है। उनके चार बच्चे हैं और वह कर्ज में डूबी हैं। उन्होंने पांच महीने से घर का किराया भी नहीं दिया है। लता और टिंकु जैसे लोगों को पहले दिल्ली सरकार की तरफ से मुफ्त भोजन मिलता था, लेकिन अब उन्हें मुफ्त भोजन के लिए शहर की सफाई करनी पड़ती है। यह भारत के संपन्न शहरों में लाखों शहरी गरीबों की महामारी के दौरान रोजमर्रा की कहानी है। पश्चिमी दिल्ली में उत्तम नगर की झुग्गी बस्तियों में किशोरियों के लिए काम करने वाली एक स्वयंसेवी संस्था ‘प्रोत्साहन इंडिया फाउंडेशन’ की संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी सोनल कपूर कहती हैं, ‘महामारी को लेकर आतंक भले ही कम हो गया हो, लेकिन जिन समुदायों के ज्यादातर लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, उनमें भूख और वित्तीय संकट बढ़ा है।'
वह कहती हैं कि स्कूल बंद हैं और ऑनलाइन कक्षाओं के लिए सबके पास डिजिटल उपकरण उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए पढ़ाई का संकट बढ़ रहा है। प्रोत्साहन का 'स्लम डिजिटल लैब’ अप्रैल और मई में बंद रहा। कपूर कहती हैं कि ‘हमने 10 जून को लैब को फिर से खोला। तब से सभी सुरक्षा मानदंडों का पालन करते हुए यह सुचारु रूप से चल रहा है, हालांकि सामाजिक दूरी के मानदंडों के कारण मात्र 40 फीसदी क्षमता के साथ ही। यहां लड़कियां आती हैं, स्कूल का होमवर्क पूरा करती हैं, अपने प्रोजेक्ट तैयार करती हैं, हाई स्कूल के बाद की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करती हैं, कोडिंग सीखती हैं और अपने परिवार के लिए सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए ऑनलाइन आवेदन करती हैं।' ‘प्रोत्साहन’ के साथ काम करने वाली किसी भी लड़की के घर पर कंप्यूटर नहीं है।
कई गरीब परिवारों के पास मात्र एक ही फोन है और उसे हासिल करना इन लड़कियों के लिए असंभव है। केरल में एक किशोरी ने इसलिए आत्महत्या कर ली, क्योंकि खास चैनल पर छात्रों के लिए प्रसारित शैक्षिक पाठ का लाभ उठाने के लिए उसका परिवार मोबाइल फोन या टीवी नहीं खरीद सकता था। उसके पिता ने स्थानीय पत्रकारों को बताया कि वह एक दिहाड़ी मजदूर हैं और मोबाइल फोन या टीवी नहीं खरीद सकते। यह ‘डिजिटल इंडिया’ सपने का एक दूसरा पहलू है। देश के अग्रणी स्वास्थ्य कार्यकर्ता जो पूरे भारत में पैदल घर-घर जाकर कोविड-19 के मरीजों का पता लगाते हैं, वे बहुत काम कर रहे हैं, पर उन्हें पैसे कम मिल रहे हैं। उनमें से अनेक को तब पीटा भी गया, जब वे कोविड मरीजों का पता लगाने के लिए घर-घर घूम रहे थे।
अलबत्ता अपेक्षाकृत सुविधा संपन्न लोगों का जीवन भी बहुत अच्छा नहीं है। दक्षिण दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में कोविड मरीजों के क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट रितेश अग्रवाल कहते हैं, दिल्ली में स्थिति सुधरी है, लेकिन उत्तर प्रदेश, राजस्थान एवं हरियाणा जैसे पड़ोसी राज्यों से गंभीर मरीज यहां इलाज के लिए आ रहे हैं। अग्रवाल का दिन सुबह छह बजे शुरू होता है। कोविड वार्ड में हर दिन उन्हें आठ से दस घंटे काम करना पड़ता है और उसके बाद वह कुछ और घंटे अन्य कामों को निपटाते हैं। आठ बजे के आसपास वह घर (वह फिलहाल एक होटल में ही अस्थायी रूप से रहते हैं) लौटते हैं। वह कहते हैं, ‘मेरे दो छोटे-छोटे बच्चे हैं। मेरी पत्नी भी डॉक्टर हैं। हम कोई जोखिम नहीं लेना चाहते। मैं महीने में एक या दो बार अपने परिवार को देखता हूं। बच्चों का ख्याल उनके दादा-दादी रखते हैं।‘
लेकिन महामारी के इन दुर्दिनों में दिल को छू लेने वाली कहानियां भी सामने आई हैं। उत्तर प्रदेश के एक किसान को एक स्मार्टफोन की जरूरत थी, ताकि उसका बच्चा ऑनलाइन क्लास में हिस्सा ले सके। मुंबई के जॉय दास को जब इस बारे में पता चला, तो उन्होंने ट्विटर पर यह कहानी साझा की। जल्द ही क्राउड फंडिंग से पैसे इकट्ठा हो गए, जो उस किसान को दे दिए गए। भले ही महामारी के समय रोजमर्रा की जिंदगी की तस्वीर बदरंग दिखती हो, लेकिन उम्मीद की कहानियां भी हैं। बेशक सभी इच्छाएं पूरी न हो पा रही हों, लेकिन सब कुछ भयावह नहीं है।