उन्हें जुकाम नहीं है, फिर भी खांसी से पीड़ित हैं। उनको स्वच्छता अभियान अति प्रिय है, फिर भी झाड़ू के मारे हैं। स्वाइन फ्लू से भी घातक 'मफलर फ्लू' की चपेट में हैं वह, जिसकी कोई टैमी फ्लू नहीं। खांसी फोबिया उन्हें इस कदर हुआ है कि किसी को खांसता देख हलकान हो जाते हैं। कोई मफलर वाला दिख जाए, तो इरादों पर शक होने लगता है।
उन्होंने चेतावनी जारी कर दी है कि अब से घर में झाड़ू नहीं लगेगी। वजूद बनाए रखने के लिए गंदगी अपरिहार्य है। कोई गंदगी मुक्त भारत का नारा नहीं देगा। स्वच्छता अभियान का तो हर्गिज नहीं। यह पब्लिक स्वच्छता और मुक्ति का अपना अभीष्ट अर्थ निकालती है। खांसना सख्त मना है और खांसी पूर्णतया बैन की जाती है। उनका बस चले, तो हर खांसने वाले से इरादों के कैरेक्टर का सर्टिफिकेट मांग लें, ताकि समय रहते सावधान हो सकें। घर में मफलर वाले किसी भी आदमी की आज से नो एंट्री! दरवाजे पर लिखवा दो-मफलर वालों का प्रवेश वर्जित है! कृपया मफलर उतारकर ही प्रवेश करें। खासकर वैसे शख्स को संक्रामक महामारी का वाहक माना जाए, जिसने मफलर बांध रखा हो और जिसे लगातार खांसी आती हो।
वे सचमुच बड़े हलकान हैं। खांसते वह रहे, छाती इनकी सिकुड़ गई। मफलर वह कसे रहे, ख्वाहिशों का गला इनका घुट गया। सारी ख्वाहिशें एक झटके में दिल्ली हो गई। वह खांसी, मफलर, झाड़ू पर पैरोडी बनाने में श्रम करते रहे, जबकि दिल्ली हौले से उन्हें ही मुक्त कर गई। जी तो करता है कि अभी सरकार से अपील कर खांसी को बैन करवा दें। दूसरे सारे अभियानों को फौरन स्थगित कर खांसी उन्मूलन अभियान का आगाज करवा दें। खांसने वालों को पकड़कर जेलों में ठुंसवा दें। हर मफलर वाला आदमी उनके लिए असाधारण 'मफलरमैन' है, उसे बिना वारंट जारी किए टाडा, रासुका इत्यादि लगा जेल भिजवा दें। कल तक हाथ में जो झाड़ू स्वच्छता अभियान के बहाने शोभित थी, आज जैसे 'एके-67' हो गई है, और उन्हें ही निशाने पर ले पूछ रही है, बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाए।