विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के ताजा बयान को हल्के में नहीं लिया जा सकता। इसके अनुसार कोविड-19 महामारी अभी अपने चरम पर नहीं पहुंची है। इसके अनुसार करीब एक करोड़ लोगों के संक्रमित होने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता। ज्यादा बड़ा खतरा तब पैदा होगा, जब यह बीमारी अफ्रीकी देशों में पैर पसारेगी और वहां से फिर सभी देशों में वापिसी का भय बना रहेगा। इतना होने के बाद भी दुनिया पूरी तरह टूटी नहीं है। अमेरीका, फ्रांस इसके ताजा उदाहरण हैं, जहां लॉकडाउन का विरोध हो रहा है। हमारे देश में भी क्या यह महामारी जल्दी पीछा छोड़ेगी की नहीं, यह सवाल सबके जहन में है।
जो रुझान सामने आ रहे हैं और जिस तरह के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार हम लोगों के द्वारा किए जा रहे हैं, वे सरकारी प्रयत्नों पर पानी फेर रहे हैं। यह ऐसी बीमारी है, जिससे धैर्य व संयम भी जुड़ा है। हमें खुद को ही नहीं बचाना है, बल्कि जो हमसे किसी भी रूप में या संपर्क में आए उसे भी बचाना है। ये छुआछूत से एक कदम आगे वाली बीमारी है। जो हम तक किसी भी रोजमर्रा में काम आने वाली चीजों से भी आ सकती है। और इलाज का भी साफ पता नहीं, तो हम ऐसा जोखिम लेने से क्यों बाज नहीं आ रहे हैं।
आज के हालात में सरकार मात्र सहायक की भूमिका में है और इसको रोकने के लिए जद्दोजहद से जुटी भी है। सरकार का दायित्व हमें कष्ट से दूर रखने के साथ या जब पड़ ही गए, तो उससे उबारना है। इससे आगे तो सरकारें भी बेबस हैं।
पूरी दुनिया के हालात को देखते हुए हम बहुत भाग्यशाली हैं। हम एक ऐसे देश में पैदा हुए हैं, जहां प्राकृतिक शक्तियां हमारे साथ हैं। हमारे हर व्यवहार में हमारे बीच में बचे हुए संस्कार हमें दुनिया से अलग रखते हैं। इन सबके अलावा हमारे नेतृत्व करने वाले लोग भी संवेदनशील ही नहीं, बल्कि ऐसे अवसरों पर अद्भुत क्षमताओं से सबको जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यह बात पक्की है कि अगर अपने देश में समय पर लॉकडाउन न हुआ होता, तो हम इटली, स्पेन, चीन, अमेरिका जैसे देशों के ही तरह बद से बदतर हालात में होते।
केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें हालात को नियंत्रण से बाहर न जाने देने के लिए सब कुछ झोंकने के लिए तैयार बैठी हैं। फिर भी हम प्रधानमंत्री व सरकार के इस एक सूत्रीय कार्यक्रम की गंभीरता को हल्के में ले रहे है। इसीलिए जब भी मौका मिले नियमों की अवहेलना करने में लग जाते हैं।
देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्री भी जुटे हुए हैं। उत्तर प्रदेश हो या उत्तराखंड, या फिर दिल्ली हो या महाराष्ट्र, इन राज्यों के मुख्यमंत्री अपनी जिम्मेदारी को समझ रहे हैं। इस समय कोरोना के अलावा उनकी अन्य कोई प्राथमिकता नहीं है। पर कमी अगर है, तो हमारी खुद की है। अब भी हम कहीं इस महामारी से पूरी तरह भयभीत नहीं हैं। और सोचते हैं कि कब लॉकडाउन से मुक्ति मिले। इसीलिए पहले चरण के खत्म होने के बाद जब दूसरे चरण में जरा-सी ढील दी गई, तो सड़कों में भीड़ बढ़ गई। दिल्ली, फरीदाबाद, नोएडा की सीमा पर दिखा नजारा इसका उदाहरण है।
किसी भी तरह हमें अनुशासन को स्वीकारना है। इस समय अगर हमें कोई बचा सकता है, तो वह सरकार और इसके नियम ही हैं। देखिये किस तरह डॉक्टर, पुलिस और सफाई कर्मचारियों ने अपना जीवन व परिवारों को हमारे लिए दांव पर लगा रखा है। उनके इस त्याग को तालियों व फूलमालाओं से ही नहीं निपटाना है, बल्कि उनके इस महान त्याग को सफल भी बनाना है। और यह तभी संभव होगा, जब हम आदेशों और अनुरोधों का पालन करेगें। पर आज हमारी सारी समझ लॉकडाउन के साथ ही लॉक हो गई कि हम हर बंधन को तोड़ने के लिए उतावले हो रहे हैं।
यह समय आलोचनाओं का नहीं है। न ही भ्रमित होने का है। राजनीतिक दलों को भी समझना चाहिए कि यह चुनाव का नहीं कोरोना का समय है। उन्हें जान लेना चाहिए कि कोरोना पक्ष या विपक्ष में कोई अंतर नहीं करने वाला।
यह प्रकृति का गुस्सा है, इसलिए दंड तो भुगतना ही पड़ेगा। आज देश के प्रधानमंत्री एक अभिवावक की भूमिका में हैं और कोशिश कर रहे हैं कि यह महामारी देश को जकड़ न ले। ज्यादा सुझावों से काम नहीं बनेगा। आज बस एक ही बात इसमें कारगर होगी कि घरों को कारागार न समझें, बल्कि इसे सामाजिक, शारीरिक व सौहार्द को बढ़ाने का अवसर समझें। सियासत व तफरीह करने के सैकड़ों अवसर होंगे, पर उनके लिए जान बचानी जरूरी होगी।