गोपिका गाती थी-बहुत कठिन है डगर पनघट की। राधेलाल गा रहा है-बहुत कठिन है डगर लॉकडाउन की। गोपिका को पानी भरने पनघट जाना होता था। राधेलाल को मॉर्निंग वॉक करनी है, फेफड़ों में ताजी हवा भरने के लिए के लिए पार्क जाना है। गोपिका का मार्ग कृष्ण रोकते थे, राधेलाल का मार्ग पुलिस वाले नटवर जी रोक रहे हैं। एक दिन राधेलाल ने अपने अपार्टमेंट की लक्ष्मण रेखा लांघ ली। इधर लांघी, उधर थानाधिपति प्रकट हुए। बोले-‘‘सेहत बनाने की पड़ी है। हमारे थाने में जिम है, चल तेरी सेहत वहां बनाता हूं। बूढ़ा है सो इज्जत से बोल रहा हूं, जहां से आया वहीं चला जा वरना...।’’ उसने सड़क पर जोर से लट्ठ मारा। बुद्धू राधेलाल लौट कर घर को आ गया। पत्नी जी को पूरी कहानी सुना दी। पत्नी जी बोली-‘‘देख लिया मेरी न सुनने का नतीजा। लेखक हो न ,बहुत दिनों से सम्मान-स्वागत के लिए तड़प रहे थे... करवा लिया सम्मान? घर काटता है। घर बैठो?’ कुछ देर में राधेलाल को उमेशलाल ने फोन पे पुकारा। उमेशलाल राधेलाल का सहायक है। पोस्ट ऑफिस, बैंक आदि के उसके काम कर देता है।
अयोध्यावासी है पर दिल्ली उसे अधिक भाती है, क्योंकि दिल्ली रोजगार देती है। लेकिन इस बार उमेशलाल बोला-‘‘साहेब! मुझे कुछ पैसे चाहिए, गांव जाना है।’’ ‘‘गांव जाना है! कल तक तो नहीं जा रहा था। पागल हो गया है क्या?’’ राधेलाल का स्वर ऐसा बौखलाया था जैसे उसे अपने पड़ोसी के कोरोना वायरस होने का समाचार मिला हो।‘‘चारों ओर लॉकडाउन है। रेल से लेकर बैलगाड़ी तक जैसे पब्लिक ट्रांसपोर्ट बंद हंै और तुझे गांव जाना है! पुलिसवाले तेल पिलाए लठ्ठ लिए घूम रहे हैं और तुझे गांव जाना है। अचानक तेरे दिमाग में दिल्ली छेाड़ने का वायरस घुसा कैसे?’’ ‘‘ हमारे सभी संगी-साथी जा रहे हैं।’’
‘‘ उनको समझा कि सरकार मुफत खाने-रहने का इंतजाम कर रही है। पूरी सुरक्षा का वादा कर रही है।’’ ‘‘ समझाया था। उन्हें सरकार के वादे पर विश्वास नहीं। कहते हैं कि घर से सुरक्षित कोई जगह नहीं होती।’’ ‘‘तुम नाहक में डर रहे हो। सबको मेहनताना मिलेगा।’’ ‘‘ नाहक में नहीं साहब! मेरा तीन साथी आज सुबह अपने ठेकेेदार से पैसे लेने गए थे। वो आरामकुर्सी में बैठा था। उसका खूंखार कुत्ता उसकी बगल में बैठा था और हमें तीन मीटर दूर बैठाया गया था। ठेकदार अपने कुत्ते को सहला रहा था। मेरे साथी हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाए कि साहेब दो दिन में महीना खत्म होने वाला है, आज हमारी तन्खाह दे देते... कुछ एडवांस भी। इतने मे पता नहीं ठेकेदार गुर्राया या उसका कुत्ता-पैसे पेड़ों पर नहीं लगते। सारा बिजनेस ठप्प हो गया है। लाखों का नुकसान हो गया और तुम्हें अपने कौड़ी की पड़ी।
हालात ठीक हो तो आ जाना...यह कहकर उसने एडवांस में दो-चार गालियां दी। कुत्ते को पुचकारते हुए बोला-खाने वाने की दिक्कत हो तो रात को बर्तन लेकर आ जाना, हमारा बहुत खाना बच जाता है।’’ ‘‘उमेश! तुम सबके खाने-पीने का मैं देखता हूं। जहां रह रहे हो, वहीं रहो। सरकार ने गारंटी दी है कि कोई मकान मालिक दो महीने तक किराया नहीं मांगेगा। ’’ ‘‘ दो महीने के बाद तो मांगेगा।
किराया माफ तो नहीं हुआ है। दो महीने कमाएंगे नहीं तो दो महीने का देंगे कहां से?’’ उसने मुझे निरुत्तर कर दिया। मैंने कहा-‘‘ पैसे मैं दे देता हूं। पर यह बताओं कि बस रेल सब बंद है। और तुम लोग कोई इतने तो क्या उतने भी वी आई पी नहीं हो कि तुम्हें एयरलिफ्ट कराया जाए।’’ ‘‘ साहेब! 11 नंबर की बस से आंनद विहार जाएंगे। वहां हमारे जैसे हजारों खड़े हैं। सरकार हमारी भीड़ देखकर डर गई है। उसे हम सब कोरोना एटम बम लग रहे हैं। वहां से सबके लिए बसें चलनी शुरु हो गई हैं। सबको डर है कि दिल्ली में हमसे कोरोना भयानक रूप से फैल सकता है।
समझदारों ने अपने को घरों में बंद कर लिया है और हमारे घर ही नहीं हैं तो... हम चले गए तो एक बड़ी जिम्मेदारी से दिल्ली बच जाएगी।’’ ‘‘पर आंनदविहार यहां से 22 किलोमीटर है। रास्ते में पुलिस ने रोका तो... न जाने दिया तो...?’’ ‘‘रोका होता तो इत्ते लोग हाई वे पर पैदल चल पाते? हमारी पुलिस बड़ी उदार है साहेब! उसकी उदारता के कारण ही तो हजारों आंनद विहार पहुंचे हैं। साहेब! समय बीत रहा है, जाऊं? आपके पास पैसा नहीं है तो रहने दें... मैं ऐसे ही चला जाता हूं।’’ मै उसे ऐसे कैसे जाने देता। मैंने कहा -‘‘तू सोसयटी के गेट पर पहुंचकर फोन कर देना।’’