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कोरोना: अब गांव की बारी, बता रहे हैं केसी त्यागी

के. सी. त्यागी
Updated Thu, 08 Oct 2020 02:21 AM IST
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कोरोना वायरस (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : पीटीआई

अनलॉक पांच और त्योहारी सीजन में महामारी की रफ्तार बढ़ने के संकेत प्राप्त हो रहे हैं। पिछले तीन माह में ग्रामीण आबादी वाले 405 जिलों में संक्रमण के फैलाव का व्यापक असर होता दिख रहा है। एसबीआई की इकोरैप रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल में संक्रमण के 10 से कम मामले वाले कुल 458 जिले थे, जिसमें 415 ग्रामीण बहुल आबादी वाले जिले थे। अब कुल 11 जिले ही ऐसे बचे हैं, जिसमें कोरोनो के 10 से कम मामले आए हैं। इन 11 जिलों से 10 ग्रामीण बहुल आबादी वाले हैं।



रोटी, कपड़ा, मकान के बाद समूचे विश्व में स्वास्थ्य एवं शिक्षा प्राथमिकताओं की सूची में सर्वोच्च होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत की स्वास्थ्य सेवाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की है और इसमें आमूलचूल परिवर्तनों पर जोर दिया है। ग्रामीण क्षेत्र में इन सेवाओं का दायरा खतरनाक दौर में है।


एक सर्वे के मुताबिक, 12,25,381 स्वास्थ्य कर्मी शहरी क्षेत्रों में उपलब्ध हैं। वहीं ग्रामीण क्षेत्र में इनकी संख्या मात्र 8,44,159 है, जो दर्शाता है कि 1:45 के अनुपात में उपलब्धता है। ग्रामीण अंचलों में लगभग 72 प्रतिशत आबादी रहती है, वहां सिर्फ 40.8 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मी कार्यरत हैं।


इसके विपरीत 27.8 प्रतिशत शहरी आबादी के लिए 59.2 प्रतिशत तक उपलब्धता है। ग्रामीण भारत के सामने कोरोना को हराने के लिए यह फर्क काफी मायने रखता है। भारत सरकार की 'नेशनल हेल्थ प्रोफाइल', जो ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं पर आधारित है, के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 21,403 सरकारी अस्पतालों में 2,65,275 बेड हैं, जबकि शहरी क्षेत्र के 4,375 अस्पतालों में 4,48,711 बेड हैं।


देश में वैसे, तो हर 1,700 मरीजों पर एक बेड है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में 3,100 मरीजों पर एक बेड है। सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की 77 प्रतिशत (लगभग 15 करोड़) आबादी गांवों में रहती है, उसके लिए 4,442 अस्पताल और 39,104 बेड हैं। वहां लगभग 3,900 मरीज पर एक बेड की व्यवस्था है। तमिलनाडु इस क्षेत्र में थोड़ा बेहतर स्थिति में है, जहां ग्रामीण क्षेत्र में 40,179 बेड हैं और कुल 690 सरकारी अस्पताल हैं।


रूरल हेल्थ स्टडीज के आंकड़ों के अनुसार, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में 2,600 की आबादी पर महज एक एलोपैथिक डॉक्टर है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा-निर्देश के अनुसार 1,000 लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए। पूरे देश में 10,000 की आबादी पर सात डॉक्टर हैं।


चीन में प्रति एक हजार की आबादी पर 17 से ज्यादा डॉक्टर हैं। 32 करोड़ की आबादी वाले अमेरिका में दस हजार लोगों पर 25 से ज्यादा डॉक्टर हैं। छह करोड़ की आबादी वाले इटली में दस हजार पर 37 डॉक्टर उपलब्ध हैं। भारत में सबसे खराब स्थिति वाले राज्यों में पं. बंगाल है, जहां 6.2 करोड़ आबादी गांवों में रहती है, वहां 70,000 लोगों पर एक डॉक्टर है।
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संसद में स्वास्थ्य कल्याण मंत्रालय ने स्वीकार किया है कि भारत में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में 34,417 डॉक्टरों की आवश्यकता है जबकि मात्र 25,567 डॉक्टर ही तैनात हैं। इसी रपट के अनुसार, लगभग 72,045 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में शौचालय तक उपलब्ध नहीं है। लगभग 823 स्वास्थ्य केंद्र तो ऐसे हैं, जहां बिजली भी उपलब्ध नहीं है। सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवा की खस्ता हालत होने से निजी क्षेत्रों को फलने-फूलने का पूरा अवसर मिलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी स्वीकार किया है कि भारत में स्वास्थ्य संगठन के मद में होने वाले खर्च का 67.78 प्रतिशत लोगों की जेब से ही निकलता है।


15वें वित्त आयोग ने अपनी ताजा रपट में स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार पर जोर दिया है और नीति आयोग के सामने भी ब्लू प्रिंट तैयार किया है जिसमें आगामी वर्षों में स्वास्थ्य को राज्य के क्षेत्र से निकलकर केंद्र की विषय सूची में लाना शामिल है। भारत इस समय स्वास्थ्य सुरक्षा के तहत 194 देशों में 183वें स्थान पर है।


राज्य सरकारों को रिजर्व बैंक ने निर्देशित किया है कि समूचे बजट का लगभग आठ प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करना होगा, जो वर्तमान में 4.7 प्रतिशत है। वित्त आयोग की सिफारिशें अगर अमल में लाई जाती हैं, तो 2025 तक जीडीपी की 2.5 प्रतिशत राशि इस क्षेत्र में खर्च कर सबको सस्ती स्वास्थ्य सेवा का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। (लेखक पूर्व संसद सदस्य हैं।)

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