मेयबाउट 2 स्वास्थ्य के लिए अच्छी जगह नहीं है। मध्य अफ्रीकी देश गैबोन के उत्तर में आइविंडो नदी के दक्षिणी तट पर ग्रेट मिंकबे के जंगल में स्थित इस गांव में रहने वाले डेढ़ सौ या उससे ज्यादा लोग अक्सर मलेरिया, डेंगू, पीला बुखार और नींद की बीमारी से जूझते रहते हैं।
ज्यादातर ग्रामीण इन बीमारियों को गंभीरता से नहीं लेते। लेकिन जनवरी, 1996 में इबोला नामक एक घातक वायरस ने 37 संक्रमित ग्रामीणों में से 21 की जान ले ली। इनमें वे लोग भी शामिल थे, जो पास के जंगल से एक चिंपांजी को ले गए थे और उसे काटकर खाया था। वर्ष 2004 में मैंने मेयबाउट 2 की यात्रा की, ताकि यह पता चले कि उष्णकटिबंधीय वर्षावनों जैसे जैव विविधता के प्रमुख केंद्रों और अफ्रीकी और एशियाई शहरों के जंगली जानवरों के मांस बाजारों से मनुष्यों में नई जानलेवा बीमारियां क्यों पैदा हो रही हैं।
उस गांव में, जहां 90 फीसदी संक्रमित लोगों की मौत हो गई थी, जाकर मैंने पाया कि बचे हुए लोग वायरस के लौट आने की आशंकाओं से बुरी तरह डरे हुए थे। ग्रामीणों ने मुझे बताया कि उस दिन गांव के लड़के कुत्तों के साथ जंगल गए थे। कुत्तों ने एक चिंपांजी को मार डाला था। चिंपाजी को काटने, पकाने और खाने वाले लोगों को कुछ ही घंटे में तेज बुखार आया। कुछ लोग तुरंत मर गए। कुछ को नाव से अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के बाद नेस्टो बेमेट्सिक जैसे कुछ लोग बच गए। नेस्टो ने मुझसे कहा, 'हम जंगल से प्यार करते थे, लेकिन अब इससे डरने लगे हैं।'
मात्र एक या दो दशक पहले यह माना गया था कि उष्णकटिबंधीय जंगलों और प्राकृतिक वन्यजीवों से भरे प्राकृतिक वातावरण ने वायरसों और रोगाणुओं को पनाह देकर मनुष्यों के लिए खतरा पैदा कर दिया है, जो कि मनुष्यों में इबोला, एचआईवी और डेंगू जैसी नई बीमारियों का कारण बनते हैं। लेकिन आज कई शोधकर्ता मानते हैं कि वास्तव में मनुष्यों द्वारा जैव विविधता के विनाश के कारण नए वायरस पैदा होते हैं। तो क्या सड़क निर्माण, खनन, शिकार और वनों की कटाई जैसी मानवीय गतिविधियों ने ही 1990 के दशक में इबोला महामारी को जन्म दिया था और आज यह कोविड-19 के नए खतरे को सामने ला रहा है?
न्यूयॉर्क टाइम्स में हाल ही में छपे लेख, 'स्पिलओवर : एनिमल इंफेक्शन ऐंड द नेक्स्ट पैनडेमिक' के लेखक डेविड क्वामैन कहते हैं, 'हम वर्षावनों और दूसरे जंगली भूदृश्यों पर हमला बोलते हैं, जहां वनस्पतियों और जानवरों की अनेक प्रजातियां रहती हैं, और जहां अनेक अनजान वायरसों की भी मौजूदगी है। हम पेड़ काटते हैं, जानवरों को मारते या उन्हें पिंजरे में डालकर बाजारों में भेजते हैं।
हम पारिस्थितिक तंत्र को बाधित करते हैं, और वायरस को उनके प्राकृतिक मेजबान से अलग करते हैं। जब ऐसा होता है, तो उन्हें एक नए मेजबान की आवश्यकता होती है। और हम अक्सर ऐसा कर रहे हैं।' रोगजनक विषाणु जानवरों से मनुष्यों में फैल रहे हैं, और उनमें से कई अब तेजी से नई जगहों पर फैलने में सक्षम हैं। अमेरिका के रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र (सीडीसी) का अनुमान है कि तीन-चौथाई 'नए या उभरते रोग' हैं, जो जानवरों में पैदा होकर मनुष्यों को संक्रमित करते हैं।
यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन में पारिस्थितिकी और जैव विविधता पीठ की प्रमुख केट जोन्स उभरते पशु जनित संक्रामक रोगों को वैश्विक स्वास्थ्य, सुरक्षा और अर्थव्यवस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण खतरा मानती हैं। 2008 में जोन्स और शोधकर्ताओं की एक टीम ने 335 बीमारियों की पहचान की, जो 1960 से 2004 के बीच उभरीं। इनमें से कम से कम 60 फीसदी बीमारियां जानवरों से आई थीं। वह कहती हैं कि ये संक्रामक रोग पर्यावरणीय परिवर्तन और मानव व्यवहार से जुड़े हैं।
एमोरी विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर थॉमस गिलेस्पी कहते हैं, मैं कोरोना वायरस प्रकोप के बारे में बिल्कुल हैरान नहीं हूं। अधिकांश रोगाणुओं की खोज होना शेष है। अभी हम बहुत कम रोगाणुओं को जान पाए हैं। ऐसे में, हम क्या कर सकते हैं? जोन्स का कहना है कि हमें वैश्विक जैव विविधता के बारे में सोचना होगा और विकासशील देशों में स्वास्थ्य देखभाल में वृद्धि करनी होगी। (-जॉन विडाल, पर्यावरण संपादक, ईएनसीआईए डॉट कॉम)