महामारी कांड का अविरल पाठ चल रहा है। जगह-जगह सन्नाटा पसरा है, मानो मृत्यु का फुल ड्रेस रिहर्सल चल रहा हो। लोग मर कम रहे हैं, पर असमय मरने से बचा लिए जाने के उपक्रम में मारधाड़ अधिक हो रही हैं। दूसरी ओर सीनियर सिटिजन कोरोना वायरस से इतना सहम गए हैं कि बार-बार एक दूसरे से पूछे चले जा रहे हैं कि यार बता, उम्र के अलावा भी हमें कोई बीमारी है? युवा तो युवा, हमउम्र रूपसियां भी कह रही हैं, आप लोग तो कमरे में दुबके रहो। कोरोना की न कोई खबर पढ़ो और न टीवी पर इस तरह की कोई सूचना देखो या सुनो।
कहते हैं कि वायरस के बारे में सुनने या सुनाने से भी बड़े-बुजुर्ग संक्रमित हो जाते हैं। बांग्लादेश युद्ध में हिस्सा ले चुके वार वैटरन जंगबहादुर ने वाया ई-मेल इस बारे में अपने सिविलियन मित्र चिरोंजी लाल ठक्कर से लेटेस्ट रिपोर्ट मांगी, तो उसने बताया, मुझे क्या पता सर जी, मैं तो आप अंडर एज हूं। वह तो बीजी ने दाखिले के समय पैदाइश का बरस बढ़ाकर लिखा दिया था कि उनके गबदू पुत्तर को किसी की नजर न लगे।
चारों ओर तरह-तरह की रिसर्च चल रही है, लेकिन फिलवक्त इस महामारी का कोई इलाज नहीं। इधर राष्ट्रीय स्तर पर जब खेल जैसे सभी खेल स्थगित हैं, कतिपय मरीज डॉक्टर, नर्स, वार्ड बॉय और पुलिस के साथ छुपम-छुपाई खेलते हुए भावुकता में सराबोर हुए जाते हैं। वे सोच रहे हैं कि इस कदीमी लुकाछिपी के जरिये वे इस बार महाकाल को भी धता बता देंगे।
वैसे भी मौत का एक दिन मुअय्यन होने की बात कहकर और उसका अंतर्संबंध नींद से जोड़कर हम नाना प्रकार की दुश्चिंताओं को सदियों से बरगलाते आए हैं। हंसते-हंसाते आनंद से गुजर जाना हमारे समय का महज मुहावरा या अस्सी के दशक की फिल्मी कहानी नहीं, असल जिंदगी का संप्रति सर्वमान्य फसलफा है। निठल्लेपन से भरे वक्त में घर के छज्जों पर तैनात तमाम टीनएजर्स के हाथ स्मार्टफोन के स्क्रीन के इर्द-गिर्द अकुला रहे हैं कि कुछ अनहोनी दिखे, तो उसे कैप्चर कर व्हाट्सएप ग्रुप में चस्पा कर दें। उनके भीतर का शरलॉक होम्स आतिशी शीशा लिए जर्रे-जर्रे पर गहरी नजर रखे हुए है।
जब खामोशियां लगभग सांय-सांय कर रही थीं, तभी कुछ ऐसा घटित हुआ कि कुछ चौंक गए, तो कुछ चिहुंक उठे। सक्रिय कैमरों ने देखा कि सूनी सड़क पर तेज गति से जाते एक साइकिल सवार ने, जिसके कैरियर में एलपीजी सिलेंडर फंसा था, हवा में नोट उड़ाने शुरू कर दिए। देखते ही देखते इलाके के समस्त कैमरे झटपट ऐक्टिव हुए। वायरस भरे नोटों की लाइव षड्यंत्र गाथाएं दिक्-दिगंत में उड़ चलीं।
भारी-भरकम आवाज में ऑडियो के साथ सनसनी भी लाइव हुई। अजब घबराहट वातावरण में व्याप्त हो गई। हवा के झोंके के साथ इधर-उधर लुढ़कते नीले-पीले करेंसी नोट ऐसे लग रहे थे, जैसे टाइम बम की झपझपाती रंग-बिरंगी बत्तियां। जितने कान, उतने विवरण। जितनी जोड़ी आंखें, उससे अधिक अनदेखी चलायमान तस्वीरें। हर किसी के पास अदद चश्मदीद का सारगर्भित मौलिक बयान।
तभी सबने देखा कि वह साइकिल सवार वापस चला आया, जो थोड़ी देर पहले रहस्यमय नोट बिखेर रहा था। उसने नोटों को सड़क किनारे पड़ा देखा, तो तसल्ली की इतनी गहरी सांस ली कि उसके असर को लगभग 500 मीटर दूर लोगों ने इस तरह महसूस किया, जैसे बाइक की पिछली सीट पर सवार मैडम जी गोलगप्पे की रेहड़ी को देख अक्सर सघन श्वसन क्रिया को अंजाम देती हैं।
वह झटपट साइकिल से कूद पड़ा और वह लुढ़कती, इससे पहले उसे स्टैंड पर टिका दिया। उसे अपने खोए हुए नोट मिले, तो उन्हें उठा आंखों से लगाया। यदि सामान्य दिन होते, तो वह उनको इस तरह गले से लगा लेता, जैसे पुराने समय में अविभावक मेले में गुम हुए बच्चे मिल जाने पर उन्हें आलिंगन में भर लिया करते थे।
उसने नोटों पर लगी धूल को मुंह की फूंक से उड़ाने के लिए अपना मास्क सरकाया। अरे, यह तो जनार्दन है। अनेक लोग उसे देखते ही पहचान गए। उसने अचकचा कर अपनी ओर टकटकी लगाए और घूरती हुई कई जोड़ी आंखें देखीं, तो फिस्स से फीकी हंसी हंस दिया। तब शायद कौतूहल प्रिय तमाम लोगों ने मन ही मन कहा, धत्त तेरे की। और वे जल्द ही बीती ताहि बिसार के फूल, पत्ती, तितली, भंवरा और बांकी उम्र वाली नयनाभिराम छवियों की शेयरिंग में तल्लीन हो गए। (लेखक वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं।)