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गरीबों को नकदी दें

पी. चिदंबरम
Updated Sun, 12 Apr 2020 12:52 AM IST
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Lockdown - फोटो : PTI

चीन में कोरोना वायरस के पहले पॉजिटिव मामले की शिनाख्त 30 दिसंबर, 2019 को हुई थी। वायरस के पूरे वुहान शहर में फैलने, और उसके बाद हुबेई प्रांत में फैलने और फिर चीन के अन्य प्रांतों तथा दूसरे देशों में फैलने के साथ ही पूरी दुनिया में भय व्याप्त हो गया। 27 जनवरी, 2020 तक 27 देश से इससे प्रभावित हो चुके थे।

12 फरवरी, 2020 को राहुल गांधी ने ट्वीट किया
'कोरोना वायरस हमारे लोगों और हमारी अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत गंभीर चेतावनी है। मेरी समझ से सरकार इसे गंभीरता से नहीं ले रही है। समय पर कार्रवाई करना महत्वपूर्ण है।'



12 फरवरी तक केंद्र सरकार ने सिर्फ दो महत्वपूर्ण कदम उठाए
1. 17 जनवरी को कुछ निश्चित देशों की यात्रा न करने के संबंध में पहला सुझाव जारी किया गया और 2. तीन फरवरी, को कुछ निश्चित देशों से आने वाले यात्रियों के लिए जारी किए गए ई-वीजा निलंबित किए गए।

श्री गांधी सही थे
जैसा कि उम्मीद थी, ट्रोल सक्रिय हो गए। किन्हीं सरल पटेल ने लिखा, 'ओ होशियार। क्या तुमने ताजा खबर चेक की।' किसी पूजा ने लिखा, 'हे भगवान, आपमें समझ भी है। मजाक करना बंद करो और जाकर फिर से पोगो देखो...। ' मैं हैरत में हूं कि सरल पटेल और सुश्री पूजा कहां छिप गए हैं। तीन मार्च को श्री गांधी ने ट्वीट किया और इस संकट से निपटने के लिए मजबूत संसाधनों के साथ कार्य योजना पेश करने की मांग की।

केंद्र सरकार ने 14 मार्च से कार्रवाई करना शुरू किया और कुछ निश्चित देशों से आने वाले यात्रियों को क्वारंटीन किया गया, पड़ोसी देशों की सीमाएं बंद कर दी गईं, अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में बदलाव किए गए, घरेलू उड़ानों पर रोक लगा दी गई और अंत में 25 मार्च से प्रभावी होने वाले लॉकडाउन की घोषणा की गई। पीछे मुड़कर देखें, तो श्री गांधी सही थे; वह उन पहले लोगों में थे, जिन्होंने गंभीर संकट की चेतावनी दी थी।

कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब और तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों ने केंद्र सरकार से पहले पहल की और राज्यों में अपने स्तर पर लॉकडाउन का एलान किया। कोविड-19 से जंग जीतने के बाद भी यह बहस लंबे समय तक जारी रहेगी कि क्या केंद्र सरकार को मार्च के बजाय फरवरी में ही कड़े कदम उठाने चाहिए थे। 
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इस स्तंभ का उद्देश्य अतीत को कोसना नहीं है, बल्कि सरकार को साहसिक कदम उठाने के लिए उकसाना है, ताकि भारत वायरस के खिलाफ लड़ाई में, जिंदगियां बचाने में, आजीविकाओं को सुरक्षित रखने के वक्र में आगे रहे और नीचे जाती अर्थव्यवस्था को उबारकर पटरी पर ला सके।

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Lockdown - फोटो : PTI
चीन में कोरोना वायरस के पहले पॉजिटिव मामले की शिनाख्त 30 दिसंबर, 2019 को हुई थी। वायरस के पूरे वुहान शहर में फैलने, और उसके बाद हुबेई प्रांत में फैलने और फिर चीन के अन्य प्रांतों तथा दूसरे देशों में फैलने के साथ ही पूरी दुनिया में भय व्याप्त हो गया। 27 जनवरी, 2020 तक 27 देश से इससे प्रभावित हो चुके थे।

12 फरवरी, 2020 को राहुल गांधी ने ट्वीट किया
'कोरोना वायरस हमारे लोगों और हमारी अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत गंभीर चेतावनी है। मेरी समझ से सरकार इसे गंभीरता से नहीं ले रही है। समय पर कार्रवाई करना महत्वपूर्ण है।'

12 फरवरी तक केंद्र सरकार ने सिर्फ दो महत्वपूर्ण कदम उठाए
1. 17 जनवरी को कुछ निश्चित देशों की यात्रा न करने के संबंध में पहला सुझाव जारी किया गया और 2. तीन फरवरी, को कुछ निश्चित देशों से आने वाले यात्रियों के लिए जारी किए गए ई-वीजा निलंबित किए गए।

श्री गांधी सही थे
जैसा कि उम्मीद थी, ट्रोल सक्रिय हो गए। किन्हीं सरल पटेल ने लिखा, 'ओ होशियार। क्या तुमने ताजा खबर चेक की।' किसी पूजा ने लिखा, 'हे भगवान, आपमें समझ भी है। मजाक करना बंद करो और जाकर फिर से पोगो देखो...। ' मैं हैरत में हूं कि सरल पटेल और सुश्री पूजा कहां छिप गए हैं। तीन मार्च को श्री गांधी ने ट्वीट किया और इस संकट से निपटने के लिए मजबूत संसाधनों के साथ कार्य योजना पेश करने की मांग की।

केंद्र सरकार ने 14 मार्च से कार्रवाई करना शुरू किया और कुछ निश्चित देशों से आने वाले यात्रियों को क्वारंटीन किया गया, पड़ोसी देशों की सीमाएं बंद कर दी गईं, अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में बदलाव किए गए, घरेलू उड़ानों पर रोक लगा दी गई और अंत में 25 मार्च से प्रभावी होने वाले लॉकडाउन की घोषणा की गई। पीछे मुड़कर देखें, तो श्री गांधी सही थे; वह उन पहले लोगों में थे, जिन्होंने गंभीर संकट की चेतावनी दी थी।

कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब और तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों ने केंद्र सरकार से पहले पहल की और राज्यों में अपने स्तर पर लॉकडाउन का एलान किया। कोविड-19 से जंग जीतने के बाद भी यह बहस लंबे समय तक जारी रहेगी कि क्या केंद्र सरकार को मार्च के बजाय फरवरी में ही कड़े कदम उठाने चाहिए थे। 

इस स्तंभ का उद्देश्य अतीत को कोसना नहीं है, बल्कि सरकार को साहसिक कदम उठाने के लिए उकसाना है, ताकि भारत वायरस के खिलाफ लड़ाई में, जिंदगियां बचाने में, आजीविकाओं को सुरक्षित रखने के वक्र में आगे रहे और नीचे जाती अर्थव्यवस्था को उबारकर पटरी पर ला सके।

साहसिक कार्रवाई की जरूरत

इस बात पर व्यापक सहमति है कि सरकारों को इन प्रमुख क्षेत्रों में कार्य करना चाहिए :
  1. संक्रमण पर नियंत्रण और चिकित्सकीय उपचार।
  2. गरीबों और कमजोर लोगों को आजीविका संबंधी मदद।
  3. आवश्यक घरेलू आपूर्ति और सेवाओं का रख-रखाव।
  4. नीचे जाती अर्थव्यवस्था को उबारना और फिर से पटरी पर लाना।
क्रमांक एक को देखें, तो अनेक गलत शुरुआतों के बाद ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार एकजुट होकर काम कर रही है। उसने राज्यों पर लॉकडाउन का कड़ाई से पालन किए जाने के लिए दबाव बनाया है। महामारी विशेषज्ञों और विपक्षी नेताओं के दबाव में आखिरकार वह सघन न सही, जांच बढ़ाने और हाल ही में मंजूर किए गए एंटीबॉडी टेस्ट के लिए राजी हुई, जिससे नतीजे जल्द मिलेंगे।

स्वास्थ्य सुरक्षा सुविधाओं के साथ ही चिकित्सकीय और सुरक्षात्मक उपकरणों की खरीद बढ़ाई गई है, जिसमें राज्य सरकारों की नेतृत्वकारी भूमिका है। इसके बावजूद अभी बहुत दूर जाना है।

जहां तक क्रमांक दो की बात है, केंद्र सरकार इसमें बुरी तरह विफल रही है और उसने राज्य सरकारों को वित्तीय मदद की पेशकश नहीं की है। देश के संसाधनों पर पहला दावा गरीब और कमजोर का होता है।

केंद्र सरकार की 25 मार्च को घोषित वित्तीय योजना में बुरी तरह से अनेक तबकों की उपेक्षा की गई और प्रवासी मजदूरों को शहर और कस्बे छोड़कर अपने गांव लौटने को मजबूर करने के लिए यह एक बड़ा कारक थी। यह दुखद है कि उनमें से अनेक लोग अपने साथ वायरस भी ले गए।

गरीबों का पहला दावा

राज्य सरकारों द्वारा कुछ नकद दिए जाने के बावजूद अधिकांश गरीब आजीविका से वंचित हैं। हमें गरीबों को 'रिमोनेटाइज' (जिसे नोट वापसी कह सकते हैं) करने की जरूरत है, इससे उनके हाथों में नकदी आएगी। इसका लक्ष्य भारत के 26 करोड़ परिवारों में से पचास फीसदी यानी करीब 13 करोड़ परिवारों को लाभ पहुंचाना है।

शहरी गरीबों के लिए शुरुआत तेल विपणन कंपनियों की उज्ज्वला सूची से करें। जनधन (पहले का शून्य बैलेंस) खातों को देखें। इसके साथ ही जन आरोग्य आयुष्मान भारत योजनाओं से पंजीबद्ध लोगों को भी देखें। आधार का इस्तेमाल कर दोहराव को रोकें। राज्य सरकारों को गरीबी की रेखा के नीचे (बीपीएल) की अपनी सूची से प्रति परीक्षण करने और अंतिम सूची तैयार करने के लिए अधिकृत करें।

ग्रामीण गरीबों के लिए 2019 के मनरेगा की भुगतान सूची से की जा सकती है। जनधन (पहले के शून्य बैलेंस) खातों को देखें। उज्ज्वला सूची से भी मिलान करें। आधार का उपयोग कर दोहराव को रोकें। राज्य सरकारों को गरीबी की रेखा के नीचे (बीपीएल) की अपनी सूची से प्रति परीक्षण करने और अंतिम सूची तैयार करने के लिए अधिकृत करें।

आदिवासी क्षेत्रों में सारे परिवारों को कवर करें। मैं समझता हूं कि राज्यवार सूचियां (13 करोड़ परिवारों की) तैयार करना संभव है, इसमें कुछ सौ कम या ज्यादा हो सकते हैं। कुछ मामलों में दोहराव (यानी दो बार लाभ उठाए जा सकते हैं) हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय आपात स्थिति में इससे फर्क नहीं पड़ता। सूचना प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से राज्य सरकारें यह काम पांच दिन में कर सकती हैं।

14 अप्रैल को प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय टेलीविजन के समक्ष प्रस्तुत होकर एलान करना चाहिए कि प्रत्येक चिह्नित गरीब परिवार के बैंक खाते में पहली किस्त के रूप में तीन दिन के भीतर पांच हजार रुपये पहुंच जाएंगे और यदि लाभार्थी परिवार का कोई बैंक खाता नहीं है, तो यह धन उसके दरवाजे तक पहुंच जाएगा।

इसकी अधिकतम लागत 65 हजार करोड़ रुपये होगी, इसे आसानी से वहन किया जा सकता है, यह पूरी तरह से व्यावहारिक है, वित्तीय रूप से लाभदायक है, आर्थिक रूप से उचित और सामाजिक रूप से आवश्यक है।

इसके बाद, यदि लॉकडाउन को बढ़ाया भी जाता है, तो गरीब मुश्किलों का सामना करने में सक्षम होंगे। इससे क्रमांक तीन और चार का समाधान हो जाएगा। सबसे पहले क्रमांक एक से शुरू करें। आइए, हमारी घोषणाओं पर खरा उतरें कि गरीबों का राष्ट्र के संसाधनों पर पहला दावा है।
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