पिछले दिनों में इंसान ने तरक्की तो बहुत की, लेकिन बड़ों के पास बैठना बंद कर दिया, उनकी बातें सुनना बंद कर दीं। इस विषाणु के बहाने सबके हृदय में एक अमृत बह रहा है, वह यह कि संकट काल में हर जाति, हर पंथ के लोग इकट्ठा हो गए हैं। सभी एक सुर में हो गए हैं, यही इस देश की मजबूती है, विशेषता है।
आपत्ति काल, विपदा काल में तो भारत अलग रूप ले लेता है और सबके भीतर शिवत्व जगाता है। अब लोग जिंदगी को जीना सीखेंगे। जो घर में नहीं रहते थे, वे घर में रहना जानेंगे। यह परमात्मा का एक बहुत बड़ा सबक है कि मशीनों से दूर रहो, वरना मशीनी राक्षस आपको कहीं का नहीं छोड़ेगा।
छोटे-छोटे नगर में भी महानगर बनने की होड़ मच गई थी। ऑर्डर देकर भोजन मंगाने की जो परंपरा घर-घर पहुंच गई थी, वह खत्म होगी। बाहर के खाने के नाम पर विषाणु खाए जा रहे थे। विपत्ति काल में घर वाले ही साथ देते हैं, इसलिए लोग घर में बड़ों के साथ रहें, उन्हें चुटकुले सुनाएं, उनसे चुटकुलें सुनें, खाना,चटनी, अचार बनाना सीखें, दादी-नानी के नुस्खे जानें, गमलों में लौकी, करेला, बैंगन, टमाटर, मिर्च उगाना सीखें। इसमें किसी रॉकेट साइंस की जरूरत नहीं है, बस केवल अपना मन जोड़ना है।
प्रत्येक कृत्य और सत्य में परमात्मा भी साथ देते हैं। 21 दिनों के लॉकडाउन में मेरी तो लगभग एक एलबम पूरी हो जाएगी। 3-4 गाने तैयार हो चुके हैं। इसका मुख्य गीत कोरोना पर ही है- 'मैं ही मेरा रक्षक हूं... अब जागा अहसास है।
' यह मानव कह रहा है कि मैं अपना संयम, कर्तव्य भूल गया था, जिसका खामियाजा प्रत्येक व्यक्ति, पूरी मानव जाति, विश्व और इस धरातल को भुगतना पड़ रहा है। घरों में जो चिड़िया आती हैं, वे यह संदेश देती हैं कि बहुत दिन से हम लॉकडाउन थीं। अब हम खुली हवा में सांस लेने आई हैं। यह घर, दुनिया हमारी भी है और आपकी भी है। तो समस्त जीव-जंतुओं का जो आशीर्वाद मिल रहा है, वह इसका एक सकारात्मक पहलू है।
मैं एक-एक हफ्ते तक भूखा रहा, लेकिन हमेशा परमात्मा को समर्पित रहा। ये आपकी परीक्षा, तप के भी दिन हो सकते हैं, इसलिए हर हाल में परमात्मा को शुक्राना… धन्यवाद भेजना चाहिए, क्योंकि उन्होंने ही हमें आंख, कान, नाक, शरीर, अवयव, अंग जैसी कीमती चीजें दी हैं।
इस पूर्णता का अहसास तब होता है, जब किसी अपूर्णता का झटका लगता है। तो जो लोग असहाय है, जिनका रोज का दिहाड़ी का काम है, उनके लिए भारत सरकार, राज्य सरकारें, सामाजिक संस्थाएं, धनवान, धर्म स्थल- सभी इकट्ठे होकर कार्य करें। अगर एक संस्था या व्यक्ति 10 परिवारों का भी ध्यान रखे, तो एक साल गुजर सकता है, 21 दिन बहुत छोटी चीज हैं।
घर में शांति से बैठकर शास्त्रीय संगीत, सुगम संगीत, बाहुबली के ऊर्जावान गाने सुनें। इनमें भारतीयता, आध्यात्मिकता है। फूहड़ गाने न सुनें। मनोरजन तो संगीत का मुखौटा है, लेकिन असल में मनोरंजन के पीछे आत्ममंथन, आत्मावलोकन छुपा होता है। तो घर-परिवार में संस्कारों के गाने सुनें, जिनमें ईश्वर तत्व समाहित हो- 'जब ज्ञान की गंगा में नहाय लिया, तो मन में मैल जरा न रहा।'