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उपासना स्थल कानून: कभी इसकी भावना और सीमा को लेकर रही व्यापक स्वीकृति, लेकिन अब इस विवाद का अंत कहां होगा!

पी. चिदंबरम
Updated Sun, 08 Dec 2024 06:09 AM IST

सार

‘प्लेसेज ऑफ वर्शिप’ कानून का उद्देश्य, उसकी भावना और सीमा को लेकर व्यापक स्वीकृति थी। मेरी राय में इस कानून ने अपना उद्देश्य प्राप्त किया, लेकिन क्या इस कानून के उद्देश्यों को समझना अब हमारे लिए मुश्किल हो गया है?
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

एक ऐसा ही कानून था, प्लेसेज ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रावधान) एक्ट, 1991। मेरे विचार में यह छोटा भी था और इसमें केवल 8 धाराएं थीं। इसका बेहद संक्षिप्त उद्देश्य था, स्वतंत्रता प्राप्ति के समय जो पूजा स्थल जिस रूप में मौजूद था, उसका उसी रूप में संरक्षण। यह स्पष्ट था। इसमें पूर्वाग्रह वाली कोई बात नहीं थी।


मैं सभी से आग्रह करूंगा कि वे इस कानून की धारा 3 और धारा 4(1) को पढ़ें, जो इस प्रकार हैं-


3- पूजा स्थलों का रूपांतरण निषेध : कोई भी व्यक्ति किसी धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी भी भाग के पूजा स्थल को किसी दूसरे संप्रदाय या किसी अन्य धार्मिक संप्रदाय के पूजा स्थल में रूपांतरित नहीं करेगा।


4- कुछ पूजा स्थलों के धार्मिक रूप का उद्घोषण और अदालतों आदि के अधिकार क्षेत्र का निषेध : (1) यह घोषित किया जाता है कि 15 अगस्त, 1947 को जो पूजा स्थल का धार्मिक रूप था, वह उसी रूप में बना रहेगा, जैसा वह उस दिन था।

सिर्फ राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद जैसे पूजा स्थल को विवाद के कारण अपवाद माना गया था।


कानून के उद्देश्य, भावना और सीमा को लेकर व्यापक स्वीकृति थी। मेरी राय में इस कानून ने अपना उद्देश्य प्राप्त किया, क्योंकि करीब 30 सालों तक पूजा स्थलों से संबंधित मुद्दों पर शांति और स्थिरता बनी रही। लोग इस बात को स्वीकार करते थे कि मंदिर, मंदिर रहेगा, मस्जिद, मस्जिद रहेगी, चर्च, चर्च रहेगा, गुरुद्वारा, गुरुद्वारा रहेगा, एक उपासना घर, उपासना घर ही रहेगा। अन्य सभी पूजा स्थल उसी रूप में रहेंगे, जैसे वे 15 अगस्त, 1947 को थे।


उदासीन उपेक्षा

दुर्भाग्यवश, कानून के क्रियान्वयन को लेकर अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। पीआरआईएसएम (एक संसदीय अनुसंधान सुविधा) के जरिए किए गए प्रश्नों का उत्तर सरकार ने तीन बार सामान्य तरीके से दिया था। सरकार के अनुसार, इस कानून के तहत किसी भी गिरफ्तारी या अभियोजन का कोई विवरण नहीं था। इस कानून के कामकाज को लेकर यही कहा जा सकता है कि केंद्र में रही सरकारों ने इस कानून के प्रति उदासीनता दिखाई।

इसके बाद मामला अदालत में गया। 28 अक्तूबर, 2020 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई। याचिकाकर्ता ने अनुरोध किया कि कानून की धाराएं 2, 3 और 4 असंवैधानिक और अमान्य घोषित की जाएं, क्योंकि ये 'आक्रमणकारियों' द्वारा बनाए गए पूजा स्थलों को मान्यता देती हैं। ध्यान देने वाली बात है कि धाराएं 3 और 4 कानून की जड़ हैं। ऐसे में इन धाराओं के बिना इस कानून का कोई अस्तित्व ही नहीं बचता। इन प्रावधानों को सर्वोच्च न्यायालय में इस आधार पर चुनौती दी गई कि ये भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21, 25, 26 और 29 का उल्लंघन करते हैं। इसके अलावा याचिकाकर्ता का यह भी कहना था कि ये 'पूजा स्थल' आक्रमणकारियों द्वारा अवैध रूप से बनाए गए थे। याचिका में याचिकाकर्ता ने इस बात को बिल्कुल नहीं छिपाया कि वह किसके मुद्दे का समर्थन कर रहा है और कौन से समुदाय को लक्षित कर रहा है। उसने साफ तौर पर बताया कि उसका उद्देश्य ‘हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख’ समुदायों के पूजा स्थलों को कानूनी प्रक्रिया द्वारा पुनः स्थापित करना था। यह याचिका 2020 से लंबित है।
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ज्ञानवापी विवाद

सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में एक विशेष अपील पर विचार किया, जो अंजुमन इंतजामिया मस्जिद, वाराणसी द्वारा दायर की गई थी। इस अपील में 3 अगस्त, 2023 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी गई थी। जिला न्यायाधीश ने ज्ञानवापी मस्जिद के क्षेत्र का पुरातात्विक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था। उच्च न्यायालय ने इस अपील को खारिज कर दिया, जिसके बाद याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट गए। सुप्रीम कोर्ट ने 4 अगस्त, 2023 के आदेश में कहा, "हम उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण से असहमत नहीं हो सकते, विशेष रूप से तब, जब हम संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग कर रहे हैं, साथ ही भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल की इस दलील को रिकॉर्ड भी किया गया कि यह पूरी प्रक्रिया एएसआई द्वारा बिना किसी आक्रामक विधि के पूरी की जाएगी।"


अदालत ने यह जानने की आवश्यकता बिल्कुल महसूस नहीं की कि आखिरकार उन याचिकाकर्ताओं का उद्देश्य क्या था, जिन्होंने 2022 के नागरिक मुकदमे में यह प्रार्थना की थी कि वे ज्ञानवापी मस्जिद के परिसर में कथित रूप से मौजूद देवताओं की पूजा करने का अधिकार रखते हैं। यदि अदालत द्वारा उन्हें पूजा करने की अनुमति दी जाती तो यह मस्जिद को पूरी तरह तो नहीं, पर आंशिक रूप से मंदिर में बदलने जैसा होता, जो 1991 के कानून की स्पष्ट धाराओं के विपरीत था।


प्रतिक्रिया की शृंखला

क्या यहां याचिकाकर्ताओं के उद्देश्य और मुकदमे में अनुमति देने के परिणामों को समझना मुश्किल है? मेरी राय में तो सुप्रीम कोर्ट को अपनी संवैधानिक शक्तियों का उपयोग करते हुए मुकदमे को यह कहते हुए खारिज कर देना चाहिए था कि 30 वर्षों तक सम्मानित कानून को हर हाल में बरकरार रखा जाना चाहिए। ज्ञानवापी के आदेश के बाद मथुरा में ईदगाह मस्जिद, दिल्ली के कुतुब परिसर, संभल, अजमेर और राजस्थान में दरगाह से जुड़े विवाद उठाए गए हैं। आखिर यह विवाद कहां खत्म होगा?

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