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संविधान मे नहीं है अनुच्छेद 35ए

Thu, 24 Aug 2017 06:13 PM IST
सुधांशु रंजन
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सुधांशु रंजन
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संविधान की किसी पुस्तक में अनुच्छेद 35 ए नहीं है। राष्ट्रपति द्वारा जारी-संविधान (जम्मू एवं कश्मीर पर लागू) आदेश, 1954-के जरिये इसे संविधान में जोड़ा गया।  यह बहस का विषय है कि कैसे राष्ट्रपति द्वारा पारित आदेश संविधान का हिस्सा बन जाता है। संविधान के अनुच्छेद 368 द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के बिना संविधान में कोई संशोधन नहीं किया जा सकता।
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अनुच्छेद 35 ए जम्मू एवं कश्मीर विधानमंडल को अधिकार देता है कि वह राज्य के ‘स्थायी निवासी’ की परिभाषा तथा उन्हें विशेष अधिकार देने के बारे में तय करे। 14 मई, 1954 को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने अनुच्छेद 370 (1) के तहत  केंद्र सरकार की अनुशंसा एवं जम्मू-कश्मीर सरकार की संस्तुति पर इसे जारी किया। 1950 के पूर्व आदेश को अवक्रमित करते हुए इसने अनुच्छेद 368 सहित संविधान के विभिन्न प्रावधानों को जम्मू एवं कश्मीर में लागू किया। हालंकि इसमें शर्त थी कि कोई भी संविधान संशोधन जम्मू एवं कश्मीर में तब तक लागू नहीं होगा, जब तक राष्ट्रपति अनुच्छेद 370 (1) के अंतर्गत एक आदेश न पारित करें।

पर यह अनुच्छेद 368 को निष्प्रभावी नहीं करता। अनुच्छेद 370 (3) के अनुसार राष्ट्रपति अधिसूचना जारी कर घोषित कर सकतें हैं कि यह अनुच्छेद (370) अमुक तारीख से निष्प्रभावी हो जाएगा या इन अपवादों एवं संशोधनों के साथ लागू रहेगा। केवल जम्मू एवं कश्मीर की संविधान सभा की अनुशंसा पर ही राष्ट्रपति ऐसा करेंगे। अनुच्छेद 370 राष्ट्रपति को इसे निष्प्रभावी करने की शक्ति तो देता है, किंतु संविधान में एक नया अनुच्छेद जोड़ने की स्वतंत्रता नहीं। इसीलिए इस अनुच्छेद का शीर्षक ही है  : ‘जम्मू एवं कश्मीर के बारे में अस्थायी प्रावधान।’
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अनुच्छेद 35 ए कहता है कि जम्मू-कश्मीर में लागू किसी  भी कानून को, कि स्थायी निवासी कौन होगा और उसे क्या विशेषाधिकार प्राप्त होंगे, अन्य व्यक्तियों पर सरकारी नौकरियों तथा अचल संपत्ति अर्जित करने पर रोक होगी, इस आधार पर असंविधानिक नहीं माना जाएगा कि यह अन्य नागरिकों के संविधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। पर आज असंविधानिक बताकर इसकी आलोचना की जा रही है। स्थायी निवासी की परिभाषा है वह व्यक्ति, जो 14 मई 1954 को राज्य की प्रजा था या 10 वर्षों से राज्य में रह रहा है। यहां ‘प्रजा’ शब्द का इस्तेमाल हैरतअंगेज है। 1954 में भारत एक लोकतंत्र था और जम्मू-कश्मीर उसका अभिन्न अंग। फ‌िर ‘प्रजा’ शब्द का प्रयोग कैसे किया गया? क्या इसका भारत में विलय पूरा नहीं हुआ था?

महाराजा हरि सिंह ने विलय के समझौते पर दस्तखत किया, तभी जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा बना। पर शेख अब्दुल्ला ने चतुराई से केंद्र से कुछ रियायतें ले लीं। कर्ण सिंह ने आत्मकथा में लिखा है कि सदर-ए-रियासत बनने के बाद जब वह जम्मू पहुंचे, तो डोगराओं ने उन्हें काले झंडे दिखाए जबकि इसके पहले उन्होंने उनका स्वागत किया था। प्रजा परिषद ने शेख अब्दुल्ला के खिलाफ 14 नवंबर, 1952 को व्यापक आंदोलन शुरू किया और उन्हें लगा कि कर्ण सिंह ने उन्हें धोखा दिया है। उनका नारा था-‘एक विधान, एक निशान, एक प्रधान।' श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इसी से प्रभावित होकर नारा दिया था-‘एक देश में दो विधान, दो निशान, दो प्रधान, नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे।’ अच्छा है कि शीर्ष न्यायालय इस तथा कथित अनुच्छेद की सांविधानिकता पर अपना निर्णय देगा। 
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