भारत की विदेश नीति में पड़ोस हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। इसके बावजूद पड़ोसियों के साथ भारत के संबंध बहुत सुखद नहीं रहे हैं। दक्षिण एशिया में भारत की जिस तरह से रणनीतिक जगह सिकुड़ती जा रही है, उससे लगता है कि भारत को पड़ोसी देशों के प्रति अपनी नीतियों पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है।
वर्ष 2014 में जब नरेंद्र मोदी की अगुआई में एनडीए सरकार ने सत्ता संभाली थी, तो उसने 'पड़ोस पहले' की नीति की बात की थी। इससे लगा कि अगले कुछ वर्षों के भीतर दक्षिण एशिया में भारत की सशक्त विदेश नीति देखने को मिलेगी। दरअसल पहले पड़ोस की नीति का नजारा शुरुआत में ही तब दिखा था, जब मोदी सरकार ने अपने शपथग्रहण समारोह में दक्षिण एशिया के राष्ट्र प्रमुखों को आमंत्रित किया था। इसके बाद खुद मोदी ने अधिकांश पड़ोसी देशों की यात्रा की, सिवाय मालदीव के जोकि उस वक्त राजनीतिक उथल पुथल के दौर से गुजर रहा था। उनकी कुछ यात्राओं ने भारी उत्साह भी पैदा किया, लेकिन दुर्भाग्य से अभी तक दक्षिण एशिया के पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंधों में कोई बड़ा गुणात्मक परिवर्तन नहीं आया है, और न ही भारत दक्षिण एशिया में चीन की बढ़ती पहलकदमी पर अंकुश लगाने में सफल हुआ है। यह सारी परिस्थितियां बताती हैं कि भारत को किस तरह से पड़ोस की जटिल चुनौतियां से जूझना है।
नरेंद्र मोदी जब नेपाल गए तो, यह विगत सत्तरह वर्षों में किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली नेपाल यात्रा थी। उनकी इस यात्रा से दोनों देशों के बीच काफी सौजन्यता नजर आई और यह उम्मीद की गई कि भारत-नेपाल के द्विपक्षीय संबंधों में एनडीए सरकार के दौरान और मजबूत होंगे। मगर जल्द ही नेपाल की अंदरूनी राजनीति के बदलते समीकरणों और वहां की राजनीति के प्रबुद्ध वर्ग द्वारा मधेशियों को दरकिनार किए जाने से द्विपक्षीय संबंध खराब होने लगे। यह वाकई हैरत में डालने वाला घटनाक्रम था, क्योंकि खासतौर से खुद नेपाली ही कहते रहे हैं कि उनके राजनीतिक भारत के प्रभाव में हैं। स्वाभाविक रूप से यह पूरा सच नहीं है और वास्तविकता यह है कि हाल के समय में नेपाल पर, भारत के अलावा भी उस जैसा या कुछ हद तक उससे अधिक, दूसरी ताकतों का प्रभाव बढ़ा है।
श्रीलंका में सिरिसेना सरकार के गठन को कुछ हद तक भारत के लिए रणनीतिक रूप से अनुकूल माना गया था। यह धारणा इसलिए बनी, क्योंकि उसकी पूर्ववर्ती राजपक्षे सरकार की चीन से करीबी काफी बढ़ गई थी। लेकिन अंततः चीन ने न केवल अपने हितों को सुरक्षित कर लिया, बल्कि उसने वहां अपने हितों का विस्तार किया है। हंबनटोटा बंदरगाह के निर्माण के लिए दिए गए श्रीलंका को दिए गए कर्ज को हिस्सेदारी में बदलकर चीन ने वहां अपनी उपस्थिति को स्थायी बना लिया है। इसके अलावा कोलंबो में पोर्ट सिटी प्रोजेक्ट में भी चीन की मजबूत हिस्सेदारी है। यह स्थिति तब है, जब कोलंबो बंदरगाह से होने वाला दो तिहाई कारोबार भारत पर निर्भर है। साफ है कि भारत इस स्थिति का लाभ नहीं उठा पा रहा है।
अक्सर यह कहा जाता है कि बांग्लादेश के साथ भारत के रिश्ते आज सबसे बेहतर हैं। मगर चीन ने इस रिश्ते में कई तरह से सेंध लगाने की कोशिश की है। कुछ समय पूर्व शी जिनपिंग ने बांग्लादेश यात्रा के दौरान वहां भारी निवेश की पेशकश की थी। चीन की सरकार ने बांग्लादेश में 24 अरब डॉलर का निवेश करने की घोषणा की और चीन के निजी क्षेत्र ने भी वहां 13 अरब डॉलर के निवेश की बात की थी। ध्यान देने वाली बात यह है कि चीन-बांग्लादेश के बीच सैन्य सहयोग उन सौदों में शामिल नहीं था, जिसकी घोषणा जिनपिंग की यात्रा के दौरान की गई थी। बांग्लादेश द्वारा चीन से दो पनडुब्बियों की खरीद से बंगाल की खाड़ी के समुद्रीय सुरक्षा पर्यावरण प्रभावित हो सकता है।
जहां तक पाकिस्तान की बात है, तो एनडीए सरकार की 'पड़ोस पहले' की नीति की घोषणा के बावजूद यह किसी को उम्मीद नहीं थी कि इस देश के साथ रिश्तों में कोई बड़ा परिवर्तन आएगा। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की बेदखली से भारत-पाकिस्तान के संबंध और जटिल ही होने हैं। दोकलम के मुद्दे पर चीन के साथ बदतर होते संबंधों के बीच पाकिस्तान की ओर से मिल रही सुरक्षा संबंधी चुनौतियां कम नहीं होनी है। दोकलम संकट के जरिये चीन भारत-भूटान की लंबे समय से चली आ रही मित्रता को टटोलने की कोशिश भी कर रहा है। लोकतंत्र के आने से भूटान का राजनीतिक पर्यावरण बदला है, लिहाजा चीन वहां के राजनीतिक वर्ग को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि उसे इसमें सफलता नहीं मिली है।
भारत के पड़ोसी उसे अपना बड़ा भाई बताते हैं। उनकी भारत विरोधी घरेलू राजनीति अक्सर उनकी तथाकथित भारत नीति के इर्द गिर्द घूमती है, ताकि वे भारत पर आरोप लगा सकें कि वह उन पर आधिपत्य जमाना चाहता है। वास्तव में इसके जरिये दक्षिण एशिया में चीन की बढ़ती उपस्थिति को जायज ठहराने की कोशिश की जाती है। पिछले कुछ दशकों में चीन की इस बढ़ती उपस्थिति के कारण दक्षिण एशिया के साथ ही हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा प्रदान करने वाले के तौर पर भारत की भूमिका प्रभावित हुई है।
स्पष्ट है कि भारत को अपनी पड़ोस संबंधी नीति पर फिर से विचार करना चाहिए। दक्षिण एशिया का बदलता राजनीतिक और सुरक्षा परिदृश्य भारत से कहीं अधिक सक्रियता वाली नीति की अपेक्षा करता है। इसकी कमी की वजह से ही मालदीव की राजनीतिक उथल पुथल खत्म नहीं हो रही है और श्रीलंका में चीन अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। नेपाल में भी ऐसा हो सकता है। गुजराल डॉक्ट्रिन जैसी नीतियों की दरकार है, जिसे कमजोरी नहीं माननी चाहिए।
- लेखक, इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज ऐंड एनालिसिस से संबद्ध हैं।